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इटली में होटल में ठहरें मुफ्त में.. शर्तें लागू*

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-दुर्गाप्रसाद अग्रवाल॥

विकट समय में एक अच्छी ख़बर. इटली में कुछ होटल आपको अपने यहां मुफ्त में ठहरने का ऑफर दे रहे हैं. लेकिन आप वहां जाने के लिए तैयारियां शुरु करें उससे पहले बारीक लिखावट वाली कुछ शर्तों को जान लेना आपके हित में होगा. पहली बात तो यह कि यह सुविधा इटली के सारे होटल नहीं दे रहे हैं. दूसरी बात यह कि इस सुविधा के साथ एक और ख़ास शर्त जुड़ी है. शर्त यह है कि होटल में ठहरने वाले युगल को नौ माह बाद अपने यहां शिशु जन्म का प्रमाण पत्र देना होगा. अगर वह सही पाया गया तो अभी जितने समय आप होटल में रुके हैं उतने ही समय फिर से निशुल्क रुक सकेंगे या अभी आपने जो भुगतान किया है वह आपको लौटा दिया जाएगा. और यह सुविधा इटली के एक शहर असीसी के होटल असोसिएशन द्वारा वहां के दस चुनिंदा होटलों में ठहरने पर ही देय होगी. यहीं यह भी बताता चलूं कि इटली में इन दिनों औसतन एक डबल बेड रूम का किराया करीब सौ यूरो होता है. भारत में फिलहाल एक यूरो करीब सत्तर रुपये का है. इससे आप होने वाली बचत का अनुमान लगा सकेंगे.

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असल में इटली इस समय अनेक बड़ी समस्याओं से जूझ रहा है. कहा जा रहा है कि वहां जन्म दर बहुत तेज़ी से घटती जा रही है. सन 1960 की तुलना में यह घट कर आधी ही रह गई है. माना जा रहा है कि एक राष्ट्र के रूप में इटली के एकीकरण के बाद से पिछले बरस वहां जन्म दर अपने न्यूनतम पर थी. औसतन इटली की स्त्रियां 1.39 शिशुओं को जन्म देती हैं जो यूरोपीय संघ के 1.58 वाले औसत से काफी कम है. यह अनुमान लगाया गया है कि अगर यही रुझान बना रहा तो अगले दस सालों में वहां सन 2010 की तुलना में लगभग साढे तीन लाख यानि चालीस प्रतिशत शिशु कम जन्म लेंगे. इस स्थिति को ‘जनसांख्यिक कयामत’ का नाम दिया गया है. और इसी सम्भावित कयामत का सामना करने के लिए असीसी शहर के होटल मालिकों ने हाल में यह ‘फर्टिलिटी रूम’ नामक अभियान शुरु किया है. इस अभियान के तहत दिये जाने वाले कमरों में मोमबत्तियां, पुष्प और संगीत जैसी रोमाण्टिक सुविधाएं भी प्रदान की जा रही हैं. होटल संगठन के एक प्रवक्ता का कहना है कि “किसी शिशु को जन्म देना प्रेम की गहनतम अभिव्यक्ति है और हमें जीवन की बहुत सारी कठिनाइयों के बावज़ूद इसको प्रोत्साहित करना चाहिए.” उन्होंने आपने इस अभियान के लिए नारा भी बनाया है: “कम टू असीसी. टुगेदर.”

 

लेकिन असीसी के होटल व्यवसाइयों का यह नेक इरादा बहुतों को पसंद नहीं भी आया है. कुछ को लग रहा है कि यह अभियान असीसी शहर की ऐतिहासिक और सांस्कृतिक छवि के अनुरूप नहीं है. यह नगर पोप फ्रांसिस की जन्मभूमि के रूप में भी जाना जाता है. लोगों की इस नापसंदगी ने स्थानीय प्रशासन को भी इस अभियान से दूरी बरतने को मज़बूर कर दिया और वहां के एक काउंसिलर को बाकायदा बयान ज़ारी कर कहना पड़ा कि वे इस बात का पता लगाएंगे कि कहीं यह अभियान असीसी की छवि को आहत तो नहीं कर रहा है. इसी संदर्भ में यह भी याद किया जा सकता है कि कुछ समय पहले इटली के स्वास्थ्य मंत्री महोदय को भी इसी समस्या का सामना करने के लिए 22 सितम्बर को ‘फर्टिलिटी दिवस’ मनाने के लिए ज़ारी किए गए पोस्टरों को वापस लेने को मज़बूर कर दिया था क्योंकि लोगों ने उन्हें असंवेदनशील और उन स्त्रियों के खिलाफ़ माना था जो किसी कारण गर्भ धारण कर पाने में असमर्थ हैं.

 

वैसे इटली में जन्म दर में यह गिरावट अकारण नहीं है. वहां की आर्थिक अनिश्चितता और अत्यधिक बेरोज़गारी इसके मूल में है. हालांकि यह बात भी सही है कि बेरोज़गारी के हालात अब कुछ सुधरने लगे हैं. फिर भी स्थिति काफी चिंताजनक बनी हुई है. इसी बेरोज़गारी के चलते अनेक यूरोपीय देशों की तरह यहां भी ‘नो चाइल्ड बेनेफिट’ योजना लागू है. कामकाजी महिलाओं पर यह खतरा भी मण्डराता रहता है कि अगर वे मां बन गईं तो उन्हें अपनी नौकरी से हाथ धोना पड़ सकता है. इटली में कामकाजी महिलाओं के लिए उनके शिशुओं की देखभाल की सुविधाएं भी बहुत कम हैं. ये ही कारण इस बात के भी मूल में है कि वहां स्त्रियां अपने मातृत्व को स्थगित करने लगी हैं और सन 2002 से 2012 के बीच चालीस बरस से अधिक की आयु में मां बनने वाली स्त्रियों की संख्या दुगुनी हो गई है. औसतन वहां स्त्रियां इकत्तीस बरस सात माह की आयु में पहली दफा मां बन रही हैं.
सारी दुनिया गहरी दिलचस्पी से इस बात को देख रही है कि विषम आर्थिक परिस्थितियों के बीच घटती जन्म दर की समस्या का सामना इटली जैसा परम्परा प्रेमी देश कैसे करता है!

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About Author

मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.

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