/नर्मदा यात्रा में हर मुद्दे पर बात हो नही तो यह पहल भी अधूरी ही साबित होगी..

नर्मदा यात्रा में हर मुद्दे पर बात हो नही तो यह पहल भी अधूरी ही साबित होगी..

-संजय रोकड़े॥
हमने विकास के लिए धीरे-धीरे नर्मदा को खतरे में डाल दिया। नर्मदा नदी में मिलने वाले गंदे नालों के पानी को ट्रीटमेंट प्लांट के जरिए साफ किया जाएगा। नर्मदा के दोनों तरफ फलदार पेड़ लगाए जाएंगे, ताकि नर्मदा का जलस्तर बढ़े और नदी का प्रवाह बना रहे। जिन किसानों के खेत नर्मदा के किनारे हैं और जो अपने खेतों में फलदार पेड़ लगाएंगे सरकार उन्हें 20 हजार रुपये प्रति हैक्टेयर की सहायता देंगी। मैं सभी संतों के सामने वादा करता हूं कि नर्मदा नदी के उदगम स्थल अमरकंटक को देश के सबसे खूबसूरत तीर्थ स्थल के तौर पर विकसित करूंगा लेकिन इसमें स्थानीय लोगों का साथ जरूर चाहिए।

ये बाते मुख्यमंत्री शिवराजसिंह चौहान ने नमामि देवी नर्मदे सेवा यात्रा के शुभारंभ अवसर पर कही। इस मौके पर उनने नर्मदा से माफी मांगते हुए कहा कि मानवीय स्वभाव के चलते हमने मां का जाने-अनजाने अच्छा-बुरा उपयोग किया है। अब मां नर्मदा प्रदूषित ना हो इसके लिए हर जगह किनारों पर मुक्तिधान भी बनाएं जाएंगें। हमारी कोशिश है कि नर्मदा के संरक्षण की कोशिश तभी शुरू कर दी जाए, जब इसमें प्रदूषण का ज्यादा खतरा नहीं हो। प्रदूषण बढऩे के बाद स्थिति को संभालना मुश्किल हो जाता है। वे नर्मदा में अवैध खनन पर दो टूक लहजे में बोले कि नर्मदा में अवैध खनन को पूरी तरह से रोका जाएगा, खनन करने वाला चाहे कितना भी बलशाली क्यों न हो। इस मौके पर वे नदी के संरक्षण को लेकर भी काफ संजीदा दिखे। इसके लिए कहा कि हम नदी के दोनों तरफ पेड़ लगाएंगे और नालों का पानी साफ किया जाएगा। इस साफ पानी को या तो खेतों में सिंचाई के तौर पर इस्तेमाल किया जाएगा, या फिर इसे साफ करके नर्मदा में डाला जाएगा।

इस अवसर पर शिवराज ने सभी लोगों से यात्रा में शिरकत करने का आव्हान करते हुए कहा कि मैं स्वयं इस यात्रा में सप्ताह में एक बार जरूर शिरकत करूंगा। हालांकि मुख्यमंत्री के तौर पर व्यस्तता रहती है पर भी कोशिश करूंगा। इसके साथ ही लोगों को नर्मदा के संरक्षण के लिए जागरुक करने की बात भी कही। वे इस मौके पर नर्मदा और स्वयं के रिश्ते का जिक्र करना भी नही भूले। बचपन की यादों को ताजा करते हुए कहा कि मैं बचपन में नर्मदा नदी में घंटों नहाया करता था।

काबिलेगौर हो कि अनूपपुर जिले के छोटे-से धार्मिक कस्बे से नर्मदा का उदगम होता है। यात्रा के शुभारंभ मौके पर पूरा माहौल नर्मदा मय हो गया था। यात्रा शुभारंभ के इस मौके पर छोटे- बडे अनेक संतों व हजारों की संख्या में मौजूद आमजनों के समक्ष शिवराज ने नर्मदा को साफ स्वच्छ रखने का भी प्रण लिया। बताते चले कि 11 दिसंबर को अमरकंटक से नदी की यात्रा नहीं, बल्कि नदी के लिए यात्रा शुरू की गई थी। हर तरफ नर्मदा को साफ रखने और उसे संवारने से जुडे बैनर-पोस्टर लगे थे। प्रदेश सरकार के कई मंत्री और प्रशासन का अमला यहां डेरा जमाए हुए था। खुद मुख्यमंत्री शिवराजसिंह चौहान एक दिन पहले ही आकर अमरकंटक में जम गए थे, ताकि बाहर से आने वाले आम-ओ-खास मेहमानों की आवभगत में कोई कमी न रह जाए।

मौके का फायदा उठाते हुए मुख्यमंत्री ने सुबह के वक्त ही सारे प्रमुख मंदिरों के दर्शन भी किए। यात्रा के इस मंच पर शिवराज के अलावा राष्ट्र संत स्वामी अवधेशानंद गिरीजी महाराज, स्वामी चिदानंद, गुजरात के मुख्यमंत्री विजय रूपाणी, आरएसएस के नेता भैयाजी जोशी विशेष तौर से मौजूद थे। सामाजिक कार्यकर्ताओं के प्रतिनिधि के तौर पर राजेंद्रसिंह भी मंच पर थे। मंच के सामने पंडाल में आदिवासी समाज के श्रोताओं की अच्छी- खासी भीड़ थी। बीजेपी का पारंपरिक वोटर भी खासी तादात में था। हालाकि मंच पर कुछ पल के लिए अफरा-तफरी जरूर मच गई थी क्योंकि राजनेताओं ने संतों को नजर अंदाज कर मंच को फोटो खिचवाने के अड्डे में जो तब्दील कर दिया था। यह हरकत स्वंय शिवराजसिंह की मौजूदगी में हो रही थी। इस माहौल को देख कर स्वामी अवधेशानंद गिरीजी महाराज को अच्छा नही लगा, लेकिन वे चाह कर भी अपनी बात को आयोजनकर्ताओं के सामने नही रख पाए, खैर।
नर्मदा यात्रा के इस मंच पर राजेंद्र सिंह की मौजूदगी सबके दिलों दिमाग में सवाल खड़ा कर रही थी। स्वाभाविक भी था क्योंकि राजेन्द्रसिंह को भाजपा से विपरीत विचारधारा का जो माना जाता है। हालाकि, जब वे वहां मौजूद थे तो बोलने का मौका भी देना ही था। मामला पानी व नदी से जुड़ा जो था। राजेंद्र सिंह ने भी बहुत कुछ कहा। लेकिन जो भी कहा खरा-खरा कहा। वे बोले कि नर्मदा यात्रा को लेकर मुख्यमंत्री की कथनी-करनी एक नहीं हुई तो लोगों के साथ ही शिवराज सिंह को भी नुक्सान होगा। वोटरों में छवि तो खराब होगी ही लेकिन साख पर भी विपरीत असर पड़ेगा। अगर यह योजना ठेकेदारों को लाभ पहुंचाने के लिए है तो इससे किसी भी प्रकार के फायदे की अपेक्षा नही की जा सकती है, गर ऐसा नही है और सीएम इसे लेकर गंभीर हैं तो फायदा जरूर होगा। यह भी एक कटु सत्य है किशब्दों को हकीकत में उतारने के लिए सीएम को भागीरथ प्रयास करने होगे। इसके साथ ही राजेंद्र सिंह ने मुख्यमंत्री का ध्यान नदी संरक्षण के पूराने मामले में दिलाते हुए कहा कि कई साल पहले आपके अफसर 113 छोटी नदियों को संवारने की योजना लेकर मुझसे मिले थे। बात काफी आगे तक बढ़ी थी, लेकिन बाद में पता नहीं चला कि काम कहां तक पहुंचा। उम्मीद है, इस बार ऐसा नही होगा, लक्ष्य प्राप्ति का पूरा ध्यान रखा जाएगा।

हालाकि चौहान ने इस यात्रा में नदी की सेवा का जो खाका खींचा है, उसका सार कुछ इस तरह से है कि नर्मदा ग्लेशियर से निकलने वाली नदी नहीं है। इसका मुख्य स्रोत सतपुड़ा और विंध्याचल के घने जंगलों से रिसकर आने वाला पानी ही है, इसलिए नदी के दोनों तरफ एक-एक किमी दूर तक वृक्षारोपण कर तटों की सफाई के लिए जनमानस को प्रेरित किया जाएगा।

बहरहाल नर्मदा को लेकर प्रदेश में शिवराज की शुरुआत को तो अच्छी पहल माना जा रहा है, लेकिन अंजाम की राह तक पहुंचने में शंका ही जाहिर की जा रही है। यात्रा 3,000 किमी का सफर पूरा करने के बाद अमरकंटक में ही 11 मई को पूर्ण होगी। नर्मदा यात्रा में प्रदेश के सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यम राज्यमंत्री संजय पाठक की महत्वपूर्ण भूमिका को लेकर भी लोग काफी सशंकित है। इस यात्रा के दौरान शिवराज जिस इलाके में अवैध खनन को रोकने की बात कह रहे थे, उसके सूत्रधार उनके मंत्रिमंडल के सहयोगी और प्रदेश में खनन के सबसे बड़े खिलाड़ी संजय पाठक ही है। हालाकि शिवराज ने जनता से वादा किया है कि नर्मदा नदी में अवैध खनन को पूरी तरह से रोका जाएगा चाहे खनन करने वाला कितना भी बलशाली क्यों न हो। यहां ये जानना भी जरूरी है कि पाठक पहले कांग्रेस के नेता थे और पिछला विधानसभा चुनाव कांग्रेस के टिकट पर ही जीते थे,लेकिन बाद में वे बीजेपी में आ गए और 2014 का उपचुनाव बीजेपी के टिकट से जीतकर मंत्री बन गए है। बेशक नर्मदा की यह यात्रा एक पूरी सभ्यता को पालने-पोसने के पुराने अफसाने जैसी है लेकिन जिस तरह से इस यात्रा का स्वरूप बनाया गया है उसे देखते हुए तो यही लगता है कि नर्मदा का राजनीतिकरण करने का प्रयास किया जा रहा है। नर्मदा के किनारे से उजाड़े गए लोगों के विस्थापन की बात को यात्रा में जगह नही दी जा रही है। प्रदेश सरकार तो बस लगातार नदी के दोहन पर केन्द्रित है। नदी में न्यूनतम जल प्रवाहित करने के प्रावधानों का पालन तक नहीं कर रही है। पाइपलाइन डालकर नर्मदा को लगातार खाली करने की नीतियां बनाई जा रही है। हाइड्रो प्रोजेक्ट के निर्माण को लेकर भी हर समय आमादा रहती है। नर्मदा की छाती पर बांध पर बांध बनाए जा रही है। अवैध खनन को रोकने के भी कोई ईमानदार और कारगर प्रयास नही किए जा रहे है। इस मौके पर यहां उस बात का जिक्र करना भी लाजिमी होगा कि पिछले दिनों जब नर्मदा नदी को लेकर ग्रीन ट्रिब्यूनल में सुनवाई हो रही थी तब राज्य सरकार के एक अफसर ने कहा था कि नर्मदा सेवा यात्रा के दौरान सरकार लोगों को नदी किनारे फलदार पेड़ लगाने के लिए भी प्रेरित करेगी। इस पर ट्रिब्यूनल के एक विशेषज्ञ सदस्य ने पूछा कि फलों के पेड़ से भी कहीं भूमि का कटाव रुकता है?
इस तरह के सवाल भी नर्मदा संरक्षण के इरादे पर सवाल खड़ा करते है। इन सवालों के हल के बिना नर्मदा यात्रा के उद्देश्य पर विश्वास करना बेमानी ही साबित होगा। इन सबके इतर शिवराजसिंह का वह बयान भी यात्रा की सफलता को लेकर भयभीत करता है- जब वे नमामि नर्मदे यात्रा के लिए बनाई गई वेबसाइट के लोकार्पण के मौके पर बोल गए कि-नर्मदा में प्रदूषण के लिए भैंसे जिम्मेदार है। वे बोले कि नर्मदा के किनारे रहने वाले लोग अपनी भैंसों को सुबह खुला छोड़ देते है और भैंस सीधे नर्मदा में चली जाती है। फिर दिन भर उसमें गोते लगाती है और उसी दौरान गंदगी भी फैलाती है। हालाकि शिवराज के इस बयान का चौतरफा विरोध हुआ था। कांगे्रस ने इसकी तीखी निंदा करते हुए कहा कि नर्मदा का सबसे ज्यादा शोषण और दोहन तो शिव सरकार के राज में ही हुआ है। खैर। यात्रा अपने उद्देश्य में किस हद तक सफलता पाती है यह तो आयोजकों की नियत और नीति पर निर्भर करता है लेकिन इस वक्त तो इतना भर कहा जा सकता है कि इस यात्रा के दौरान अभी तक जिन मुद्दों को शामिल नही किया गया है उन पर भी बात करनी होगी, नही तो फिर एक बार नर्मदा को बचाने व उसे संरक्षित करने की यह पहल अधूरी ही साबित होगी।

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.