/रवीश कुमार के दिखाये गये फैक्ट्स को कोई गलत साबित करे..

रवीश कुमार के दिखाये गये फैक्ट्स को कोई गलत साबित करे..

वामपंथ की कोई बच्चेदानी नही होती है..

-प्रशांत टण्डन॥

रवीश कुमार में मामले में कतई विचलित नही हूँ. विचलित तब हो सकता हूँ जब रवीश वो सब छोड़ देंगे जो वो कर रहे हैं. ये आर पार की लड़ाई का दौर है. अन्याय और शोषण के खिलाफ आवाज़े तेज़ हुई हैं. रवीश कुमार या उन जैसे तमाम लोग जो पत्रकार नही भी हैं सिर्फ इन आवाज़ो को दूसरों को भी सुना रहे हैं. आगे बढ़ा रहे हैं. ये काम रवीश कुमार बहुत से लोगो से बेहतर कर पा रहे है क्योंकि उनके पास एनडीटीवी का प्लेटफार्म. मुझे ये भी नही लगता कि जो वो कर रहे हैं वो एनडीटीवी की संपादकीय नीति का हिस्सा हैं क्योकि इसी चैनल में बाकी जो कुछ चलता है वो वैसा नही है. एनडीटीवी ने सिर्फ ये किया है अभी तक रवीश कुमार को वो सब करने दिया, जो हमने देखा है. अगर पूरे इस जातिवादी मीडिया की हालत देखे तो ये भी काबिले तारीफ़ है.

परसों पता चला कि रवीश कुमार जन्म से पांडे हैं. सरनेम ना लिखने से जाति छुपती नही है. मैंने ऐसे कई जातिवादियो को देखा है. रवीश छुपा ले गये – ये भी बड़ी बात है.

ये तो दोहरी बगावत है – इसे कैसे माफ किया जा सकता है. उन पर फेसबुक पर जो मुकदमा कायम हुआ उसमे पहला आरोप यही आयत हुआ है.

दूसरा आरोप उन पर ये लगा कि वो सेक्यूलर हैं और सर्वहारा के प्रतिनिधि हैं. ये आरोप भी बनता है. बड़ा अपराध है आज के दौर में. एक ऐसे दौर में जहॉ हिंदुत्व की आड़ में जातिवादि समाज को ज़िंदा रखने की कवायद चल रही हो और जिसके कान में पिघला शीशा डाला गया या अंगूठा काटा गया वो ब्राहम्णवाद की जड़े खोद रहा हो और वो भी सिर्फ कलम के रास्ते और कोई रवीश कुमार इन लोगो का साथ दे तो सूली पर चढ़ाने लायक काम तो किया ही है.

तीसरा आरोप है कि उनके भाई एक गभीर अपराध के मुकदमे में हैं. इसकी मेरिट में जाये बगैर सिर्फ ये कहना है कि उनपर कानून के मुताबिक कार्यवाही हो. अब रवीश कुमार की पत्रकारिता इसमे कहॉ से आ गई. अगर मान लें कि रवीश के भाई पर दोष साबित भी हो जाये तो क्या रवीश कुमार के पत्रकारिता अधिकार खत्म हो जाते हैं. उन्हे वो नही करने दिया जायेगा जो वो कर रहे हैं?

मुझे अभी भी इंतज़ार है कि रवीश कुमार के दिखाये गये फैक्ट्स को कोई गलत साबित करे, उन्होने किसी से पैसा लेकर या कोई दूसरा फायदा लेकर कोई रिपोर्ट दिखाई हो या पत्रकारिता के मानदंडो की अनदेखी की हो तब ज़रूर मामला बनता है सीधे उनपर और तब उनसे जवाब की अपेक्षा रहेगी.
इंडिया टीवी के पूर्व सम्पादकीय निदेशक प्रशांत टण्डन की फेसबुक वॉल से..

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.