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परपीड़ा में खुशी एक बीमारी है इसका ईलाज कीजिये..

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-प्रशांत टंडन॥

अगर मेरा किसी से कोई कानूनी विवाद चल रहा हो और फ़िर एक दिन खबर मिले कि एक कार एक्सीडेंट में उसकी मौत हो गई. मैं अगर इस खबर को सुन कर केवल खुश ही नहीं होता हूं बल्कि सबके सामने खुशी जाहिर भी करता हूं तो मैं मानसिक रोगी हूं और मुझे फ़ौरन ईलाज की ज़रूरत है.

सोचिये कि क्या मैं ऐसा बर्ताव तब भी करता जब मेरा कानूनी पक्ष मज़बूत होता और मेरी लड़ाई सच पर आधारित होती. शायद नही. तब मैं उस व्यक्ति की मौत पर दुख जाहिर कर रहा होता. यानि परपीड़ा में खुशी किसी छिपी हुई असुरक्षा से पैदा होती है.

मनोविज्ञान परपीड़ा सुख (Sadistic Personality Disorder ) को मानसिक बीमारी मानता है. इसे DSM (Diagnostic and Statistical Manual of Mental Disorders) के नाम से जाना जाता है. (Sadism involves gaining pleasure from seeing others undergo discomfort or pain. The opponent-process theory explains the way in which individuals not only display, but also take enjoyment in committing sadistic acts.)

क्या कोई समाज बड़े पैमाने पर इस बीमारी का शिकार हो सकता है, वो कौन सी असुरक्षा है या दूसरे कारण हो सकते है ये ज़रूर एक शोध का विषय है.

हाल फिलहाल मुझे तीन जगह इस बीमारी के लक्षण दिखाई दिये और ये भी अजब संयोग है कि तीनो लक्षण बीजेपी या मोदी को ताकत देते दिखाई देते हैं. ये भी गहरी चिंता का विषय है कि ये लक्षण जिस वर्ग में दिखाई दिये वो समाज में राय बनाने में अहम भूमिका निभाता है. शक होना लाज़िमी है कि कही ये किसी प्रोजेक्ट के तहत तो नही हो रहा है.

पहला लक्षण:
नोटबंदी के दौरान मोदी ने अपने भाषणो में उन लोगो का मज़ाक उड़ाया जिनके यहॉ शादी ब्याह में कैश की कमी से अड़चन आई, कुछ मनगड़ंत कहानियां बनाई कि पैसे वालो की नींद उड़ी हुई है. जबकि ऐसा था नही. फ़िर भी समाज के एक वर्ग ने इसे सच माना, देश और उसके अपने जीवन पर नोटबंदी के तमाम बुरे प्रभाव को उसने किनारे रख कर उस झूठ में खुश हो गया कि पैसे वाले लुट गये.

दूसरा लक्षण:
उत्तर प्रदेश चुनाव के नतीजे अप्रत्याशित रूप से बीजेपी के पक्ष में गये. 325 सीट किसी के गले नही उतरी. खुद बीजेपी के लोग हैरान थे. समाजवादी पार्टी और बीएसपी के सामने अस्तित्व का संकट खड़ा हो गया. उसी दिन यानि 11 मार्च को ही मायावती ने बड़े पैमाने पर ईवीएम से छेड़छाड़ के गंभीर सवाल खड़े किये, अखिलेश यादव जो मायावती के राजनीतिक प्रतिद्वंदी हैं उन्होने भी इसका समर्थन किया. अगले ही दिन दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल भी ईवीएम के खिलाफ़ सुबूतो के साथ उतर गये. यानि दो पूर्व मुख्यमंत्री और एक मुख्यमंत्री और तीनो अपनी पार्टियों के सबसे बड़े नेता आरोप लगा रहे है कि बीजेपी ने चुनाव में बेईमानी की है और एक तबका (लेफ़्ट लिबरल) जो बीजेपी के विरोध में सबसे मुखर है, छोटी छोटी बाते लेकर उड़ जाता है – बीजेपी खिलाफ़ राय बनाने में कोई कसर नही छोड़ता है वो इसमें चुप रहा. क्यों. क्या वो इस पर खुश हो रहा है कि ईवीएम से सही “पहचान की राजनीति” करने वाली पार्टियां निबट गई. ठीक ही हुआ.

तीसरा लक्षण:
उत्तर प्रदेश में मीट बंदी पर एक वर्ग खुश नज़र आरहा है क्योंकि उसे लग रहा है मीट के धंधे में लगे मुसलमान को इस बैन से नुकसान होगा. ये जग जाहिर है कि मीट मछली की खपत में हिंदू बाकी सबसे कहीं आगे हैं. मंगलवार और नवरात्रों में कवाब की दुकानो में सन्नाटा देखा जा सकता है. इसके व्यापार में भी सिर्फ़ मुसलमान नही हैं. कत्लखाने वैध हैं या नही पर इनके लिये जानवर की सप्लाई किसान से ही होती है. पशुपालन का काम ज्यादातर हिंदू ही करते है. उनके जानवरो का खरीददार नही होगा तो उन्हे ही आर्थिक नुकसान होगा. इसके बाद भी अगर ये लोग खुश हैं तो कहीं कुछ असमान्य है. ‎

कुछ साल पहले नाउमी क्लाइन की एक किताब पढ़ी थी – द शॉक डॉक्ट्रिन – द राइज़ ऑफ डिज़ास्टर कैपिटलिज़्म (The Shock Doctrine – The Rise of Disaster Capitalism by Naomi Klein).

इस किताब में क्लाइन ने समझाया है कि किस तरह बाज़ारवाद को बढ़ाने के लिये आवाम को बड़े झटकों (shock therapy) की रणनीति के ज़रिये असल मुद्दों से भटका कर उनका शोषण किया जाता है. बाज़ारवादी अर्थशास्त्री मिल्टन फ़्रीडमैन ( Neoliberal Economist – Milton Friedman) इस शॉक डॉक्ट्रिन के जनक थे.

किताब में CIA के एक प्रोजेक्ट का भी ज़िक्र है कि कैसे झटके देकर किसी के सोचने समझने के विवेक को बदला जा सकता है.

कहीं ऐसा तो नही कि भारत के समाज को भी एक के बाद एक झटके देकर उसकी सोचने समझने की शक्ति कम खत्म की जा रही है. उसे अपने ही नुकसान नही दिखाई दे रहे हैं और दूसरों की बर्बादी उसे खुशी दे रही है.

जब दूसरो की बर्बादी पर आप खुश हों तो एक बार ये ज़रूर सोचियेगा कि फायदा किसे हो रहा है. इस बीमारी से लड़ने में मदद मिलेगी.

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About Author

मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.

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