/सैनिक की जान बचाना देशभक्ति है – उसे मरने देना नही..

सैनिक की जान बचाना देशभक्ति है – उसे मरने देना नही..

-प्रशांत टण्डन॥

ऐसा लगता है कि सरकार, मीडिया और सोशल मीडिया में बहुत से लोग इस बात का इंतज़ार करते रहते है कि कब किसी सैनिक की जान जाये और उन्हे अपनी देशभक्ति साबित करने का मौका मिल जाये.

किसी भी भारतीय नागरिक की जान कीमती है. सेना और सुरक्षा बलो में काम कर रहे भारतियों की भी. हम सब अपने करीबी लोगो की मौत देखते है कभी न कभी. किसी के घर का जवान बेटा, बच्चों का पिता, भाई या बेटा असमय मौत का शिकार होता है तो उसके परिवार की सामने अंधेरा छा जाता है. कोई भी सम्मान या मुआवजा जीवन की भरपाई नही कर सकता है.

22 सिख बटालियन के नायब सूबेदार परमजीत सिंह और बीएसएफ के हेड कांस्टेबल प्रेम सागर की मौत और सेना के मुताबिक पाकिस्तानी सेना द्वारा उनका सर धड़ से अलग करने की घटना कई सवाल खड़े करती है. खबरो के मुताबिक कृष्णा घाटी में मार्च के महीने ही से भारत और पाकिस्तान के बीच गोलीबारी चल रही थी. सेना के प्रवक्ता के मुताबिक पिछली 17 अप्रेल को ही भारत की तरफ से गोलीबारी में पाकिस्तान का बड़ा नुकसान हुआ था और पाकिस्तान जवाबी कार्यवाही के मौके की तलाश में था.

# कल यानि पहली मई को कृष्णा घाटी के ही इलाके में भारत की दो चैकियों के बीच बीएसएफ और सेना की साझी गश्त रखी गई. करीब 800 मीटर की इस गश्त में बीएसएफ के 10 और सेना जवान बताये जा रहे है.

# अधिकारियों को इस बात की सूचना भी रही होगी कि पाकिस्तानी सेना प्रमुख इसी इलाके में दौरे पर है. फिर ये कैसे हो गया कि भारत की सीमा के 200 मीटर अंदर ये हमला हो गया. तैयारी क्यों नही थी.

# हमला सुबह 8:25 पर हुआ यानि काफी उजाले के वक़्त. ये कैसे हुआ कि ये दो जवान बाकी टीम से अलग हो गये?

# इतनी संवेदनशील पोस्ट के ऑपरेशन में इनके पास कम्यूनिकेश के साधन रहे होंगे. क्या इन्हे इतना भी वक्त नही मिला कि टीम के बाकी लोगो को सुचित कर पाते?

# इनके सर को शारीर से अलग किया गया – मतलब इन्हे घायल या इनकी हत्या कर पाकिस्तानी सेना ने अपने कब्जे में लिया होगा. ये सब LoC के 200 मीटर अंदर हो रहा था. कोई सेंसर, सर्वीलेंस, बैकअप नही था इतने संवेदनशील ऑपरेशन में.

कहीं कोई बड़ी लापरवाही हुई है और इस ऑपरेशन से जुड़े अधिकारियों से जवाब तलब होना चाहिये.

हम राष्ट्रपति, सरकार, संसद, सुप्रीम कोर्ट, मीडिया सब पर सवाल खड़े करते है लेकिन सुरक्षा एजेंसियों का नाम आते ही भावुक हो जाते हैं भले ही उनसे बड़ी चूक हुई हो या किसी लापरवाही से उनके अपने ही लोगो की जान गई हो.

नीचे पंकज चतुर्वेदी जी भी कुछ महत्वपूर्ण सवाल उठा रहे हैं. जवानो की लगातर हो रही मौतों में भावुकता नही विवेक से काम लेने ज़रूरत है.
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पंकज चतुर्वेदी जी की पोस्ट:

पनामा लिंक केस में नवाज शरीफ में जांच के आदेश सुप्रीम कोर्ट ने दिए।पाकिस्तानी सेना ने चार दिन पहले जांच पर रोक लगा दी। उसके अगले दिन सज्जन जिंदल नवाज शरीफ से मिलने गए। दो घंटे गुफ्तगू हुई। जिंदल वही है जो मोदीजी और शरीफ के बीच निजी मुलाक़ात की कड़ी रहे हैं। उनके कई कारखाने पाकिस्तान में हैं।
उसके अगले दिन पाकिस्तानी सेना का प्रधान बाजवा सीमा पर रात बिताता है। अगले ही दिन सीमा पर गोलीबारी होती है। आश्चर्यजनो तरीके से सेना और बी एस एफ के जवानों को मारा जाता है। उनके शरीर को क्षत विक्षत करता है। ध्यान दें सेना और बी एस एफ कभी साथ में गश्त नही करते।
सब कुछ को अलग अलग देखें। एक साथ देखें। कुछ दबा छुपा महसूस होगा। शिकार हो रहे हैं हमारे बेमिसाल शानदार जांबाज जवान।

वरिष्ठ पत्रकार और एक्टिविस्ट प्रशांत टण्डन की फेसबुक वाल से

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.