/एक शहीद के बेटे की चिट्ठी: मरते हैं पिता, बचते हैं देश..

एक शहीद के बेटे की चिट्ठी: मरते हैं पिता, बचते हैं देश..

प्रदीप अवस्थी॥

मेरे पिता चले गए… कुछ दिन पहले सुकमा में कुछ पिता, भाई, बेटे चले गए और ये लिखना शुरू करने से पहले कश्मीर में दो और जवान चले गए. आगे भी जाते रहेंगे.
यकीन मानिए. ये बात सुनने में खराब लग सकती है लेकिन ये हकीकत है. साल 2007 का नवंबर महीना था. गुवाहाटी के सीआरपीएफ ग्रुप सेंटर से गुवाहाटी स्टेशन जाते हुए मेरे पिता और उनके साथियों पर घात लगाकर हमला किया गया जिसमें सब मारे गए. हमला उल्फा वालों ने किया था. मेरे पिता सीआरपीएफ में थे.
घटना सुबह 10 बजे हुई थी. उन्होंने सर्विस पूरी होने से एक साल पहले रिटायरमेंट ले ली थी. वे लौट रहे थे. 31 अक्टूबर को पार्टी दी थी अपनी बटालियन के लोगों को. उनके साथ जो लोग थे, वे उन्हें विदा करने स्टेशन तक जा रहे थे.
रास्ते में हाफलोंग नाम का एक पहाड़ी इलाका पड़ता है. वहां उन सबको मार दिया गया. तब मैं 21 साल का था. गाजियाबाद के कॉलेज में पढ़ाई कर रहा था. घर पर फोन आया होगा. मेरे पास रात साढ़े आठ बजे फोन आया. बस इतना बताया गया कि पापा नहीं रहे. पूरी रात मैं सो नहीं पाया और इस बात का ठीक-ठीक मतलब समझने की कोशिश करता रहा. बहुत रोया.
अगली दोपहर घर पहुंचकर मां की गोद में सिर रखकर जाने कितनी देर रोता रहा. पिता ने पूरी जिंदगी घर से दूर बिता दी. वे हमेशा के लिए लौट रहे थे लेकिन घर लौटा उनका शव वो भी घटना के तीन दिन बाद.

मैं अक्सर सोचने की कोशिश करता रहा कि क्या हुआ होगा उस दिन वहां पर. उनको चार गोलियां लगी थीं. एक माथे पर, एक सीने पर बाईं तरफ, एक पेट पर और एक दाईं जांघ में. उनका शरीर फूलकर भारी हो गया था. ये पहला शव था जो मैंने अपने जीवन में देखा था.
आस-पास लोग बातें कर रहे थे कि ऐसे हमलों में शरीर के अंग भी काटकर ले जाते हैं. ये उनके साथ नहीं हुआ था. उनकी पैंट की चोर जेब में 20,000 रुपये थे. हजार-हजार के 20 नोट जो खून से सन गए थे.
मैं तेरह दिन घर पर रुका रहा फिर लौट आया. उसके बाद से उनके सपने आते रहे जिनमें वे घायल हालत में घर लौटते थे. इतने साल बीतने पर वे सपने भी आने बंद हो गए. उनके न होने से बहुत कुछ अधूरा छूट गया.
वो 2007 का साल था और ये है साल 2017. क्या कुछ भी बदला है? मैं बदला लेना चाहता था लेकिन किससे लेता. क्या बदला लेता और कैसे?
ये एक व्यवस्था है जिसने कभी दो अनजान लोगों को तो कभी दो अनजान गुटों को एक दूसरे का दुश्मन बनाकर आमने सामने खड़ा कर दिया है और उनके हाथों में जानलेवा हथियार भी हैं.
इतने सालों में मेरा गुस्सा बेबसी में बदलकर शांत हो चुका है. यही सवाल मन में उठता रहा कि देश के लोगों के मरने से उनके घर उजड़ने से कौन सा देश बच रहा है?
यदि छाती पीटने वाली अंध देशभक्ति से बाहर आकर सोचें तो मुझे नहीं लगता कि कोई भी इंसान दो देशों के बीच इस तरह युद्ध की बात कर पाएगा जैसे सातवीं-आठवीं क्लास के दो लड़कों की लड़ाई हो.
असली हथियारों से असली के जीते जागते लोग मारे जाते हैं. इसलिए जब तक बचा जा सकता है बचा ही जाना चाहिए. हमारे सवाल सरकारों की तरफ होने चाहिए. आप पर भरोसा करके चुनते हैं हम तो राजनीतिक हल क्यों नहीं निकलता इन संघर्षों का?
हम इन खबरों से भी कैसे मुंह मोड़ें जो आए दिन आती हैं बस्तर से..छत्तीसगढ़ से जहां सुरक्षा बल आदिवासियों को प्रताड़ित करते हैं. बलात्कार किया जाता है उनकी औरतों का. हम कैसे न बात करें कि कभी सोनी सोरी की योनि में पत्थर डाल दिए जाते हैं तो कभी उसका चेहरा बिगाड़ दिया जाता है.

इनपर होते अत्याचारों की खबर पढ़ते हुए गलत क्यों नहीं लगता? इनके मरने पर क्यों नहीं लगता कि देश का नागरिक मरा है. हम इस पर भी क्यों न यकीन करें कि सरकारें चाहती ही नहीं कि इन मुद्दों का कोई हल निकले.
आखिरकार असम में उल्फा के लीडर्स को भी सत्ता में शामिल होने का मौका मिला. जो करोड़ों रुपये इस लड़ाई के नाम पर खर्च होते हैं वो किसकी जेब में जाते हैं. आखिर हम कैसे सवाल न करें.
वहीं दूसरी तरफ ये बर्बर हिंसा है जो अभी सुकमा में देखने को मिली. शोषण सत्ता करती है और जवाब में मारे उसके नुमाइंदे जाते हैं. कोई दस मारता है तो कोई जवाब में बीस मारता है.
ये कैसी व्यवस्था है जिसमें अपने घर वालों का पेट भरने के लिए नौकरी करते सैनिक या सुरक्षा बल यूं ही मार दिए जाते हैं और हम हर बार नमन और गर्व से काम चला लेते हैं.
हम पूछते क्यों नहीं सरकारों से कि बताइए आप कब कोई हल ढूंढ पाएंगे? क्या कभी शांति स्थापित हो पाएगी इन इलाकों में? अपनी पूंजीवादी व्यवस्था को बरकरार रखने के लिए जो शोषण जरूरत बन गया है उसे आप रोकेंगे? किसे सही कहें, किसे गलत?
जब भी हमारे जवानों के मरने की खबर आती है तब मुझे मेरे पिता याद आते हैं. याद आती है बेबसी कि यूं ही उजड़ गये और कितने घर.

– प्रदीप अवस्थीमेरे पिता चले गए… कुछ दिन पहले सुकमा में कुछ पिता, भाई, बेटे चले गए और ये लिखना शुरू करने से पहले कश्मीर में दो और जवान चले गए. आगे भी जाते रहेंगे.
यकीन मानिए. ये बात सुनने में खराब लग सकती है लेकिन ये हकीकत है. साल 2007 का नवंबर महीना था. गुवाहाटी के सीआरपीएफ ग्रुप सेंटर से गुवाहाटी स्टेशन जाते हुए मेरे पिता और उनके साथियों पर घात लगाकर हमला किया गया जिसमें सब मारे गए. हमला उल्फा वालों ने किया था. मेरे पिता सीआरपीएफ में थे.
घटना सुबह 10 बजे हुई थी. उन्होंने सर्विस पूरी होने से एक साल पहले रिटायरमेंट ले ली थी. वे लौट रहे थे. 31 अक्टूबर को पार्टी दी थी अपनी बटालियन के लोगों को. उनके साथ जो लोग थे, वे उन्हें विदा करने स्टेशन तक जा रहे थे.
रास्ते में हाफलोंग नाम का एक पहाड़ी इलाका पड़ता है. वहां उन सबको मार दिया गया. तब मैं 21 साल का था. गाजियाबाद के कॉलेज में पढ़ाई कर रहा था. घर पर फोन आया होगा. मेरे पास रात साढ़े आठ बजे फोन आया. बस इतना बताया गया कि पापा नहीं रहे. पूरी रात मैं सो नहीं पाया और इस बात का ठीक-ठीक मतलब समझने की कोशिश करता रहा. बहुत रोया.
अगली दोपहर घर पहुंचकर मां की गोद में सिर रखकर जाने कितनी देर रोता रहा. पिता ने पूरी जिंदगी घर से दूर बिता दी. वे हमेशा के लिए लौट रहे थे लेकिन घर लौटा उनका शव वो भी घटना के तीन दिन बाद.

मैं अक्सर सोचने की कोशिश करता रहा कि क्या हुआ होगा उस दिन वहां पर. उनको चार गोलियां लगी थीं. एक माथे पर, एक सीने पर बाईं तरफ, एक पेट पर और एक दाईं जांघ में. उनका शरीर फूलकर भारी हो गया था. ये पहला शव था जो मैंने अपने जीवन में देखा था.
आस-पास लोग बातें कर रहे थे कि ऐसे हमलों में शरीर के अंग भी काटकर ले जाते हैं. ये उनके साथ नहीं हुआ था. उनकी पैंट की चोर जेब में 20,000 रुपये थे. हजार-हजार के 20 नोट जो खून से सन गए थे.
मैं तेरह दिन घर पर रुका रहा फिर लौट आया. उसके बाद से उनके सपने आते रहे जिनमें वे घायल हालत में घर लौटते थे. इतने साल बीतने पर वे सपने भी आने बंद हो गए. उनके न होने से बहुत कुछ अधूरा छूट गया.
वो 2007 का साल था और ये है साल 2017. क्या कुछ भी बदला है? मैं बदला लेना चाहता था लेकिन किससे लेता. क्या बदला लेता और कैसे?
ये एक व्यवस्था है जिसने कभी दो अनजान लोगों को तो कभी दो अनजान गुटों को एक दूसरे का दुश्मन बनाकर आमने सामने खड़ा कर दिया है और उनके हाथों में जानलेवा हथियार भी हैं.
इतने सालों में मेरा गुस्सा बेबसी में बदलकर शांत हो चुका है. यही सवाल मन में उठता रहा कि देश के लोगों के मरने से उनके घर उजड़ने से कौन सा देश बच रहा है?
यदि छाती पीटने वाली अंध देशभक्ति से बाहर आकर सोचें तो मुझे नहीं लगता कि कोई भी इंसान दो देशों के बीच इस तरह युद्ध की बात कर पाएगा जैसे सातवीं-आठवीं क्लास के दो लड़कों की लड़ाई हो.
असली हथियारों से असली के जीते जागते लोग मारे जाते हैं. इसलिए जब तक बचा जा सकता है बचा ही जाना चाहिए. हमारे सवाल सरकारों की तरफ होने चाहिए. आप पर भरोसा करके चुनते हैं हम तो राजनीतिक हल क्यों नहीं निकलता इन संघर्षों का?
हम इन खबरों से भी कैसे मुंह मोड़ें जो आए दिन आती हैं बस्तर से..छत्तीसगढ़ से जहां सुरक्षा बल आदिवासियों को प्रताड़ित करते हैं. बलात्कार किया जाता है उनकी औरतों का. हम कैसे न बात करें कि कभी सोनी सोरी की योनि में पत्थर डाल दिए जाते हैं तो कभी उसका चेहरा बिगाड़ दिया जाता है.

इनपर होते अत्याचारों की खबर पढ़ते हुए गलत क्यों नहीं लगता? इनके मरने पर क्यों नहीं लगता कि देश का नागरिक मरा है. हम इस पर भी क्यों न यकीन करें कि सरकारें चाहती ही नहीं कि इन मुद्दों का कोई हल निकले.
आखिरकार असम में उल्फा के लीडर्स को भी सत्ता में शामिल होने का मौका मिला. जो करोड़ों रुपये इस लड़ाई के नाम पर खर्च होते हैं वो किसकी जेब में जाते हैं. आखिर हम कैसे सवाल न करें.
वहीं दूसरी तरफ ये बर्बर हिंसा है जो अभी सुकमा में देखने को मिली. शोषण सत्ता करती है और जवाब में मारे उसके नुमाइंदे जाते हैं. कोई दस मारता है तो कोई जवाब में बीस मारता है.
ये कैसी व्यवस्था है जिसमें अपने घर वालों का पेट भरने के लिए नौकरी करते सैनिक या सुरक्षा बल यूं ही मार दिए जाते हैं और हम हर बार नमन और गर्व से काम चला लेते हैं.
हम पूछते क्यों नहीं सरकारों से कि बताइए आप कब कोई हल ढूंढ पाएंगे? क्या कभी शांति स्थापित हो पाएगी इन इलाकों में? अपनी पूंजीवादी व्यवस्था को बरकरार रखने के लिए जो शोषण जरूरत बन गया है उसे आप रोकेंगे? किसे सही कहें, किसे गलत?
जब भी हमारे जवानों के मरने की खबर आती है तब मुझे मेरे पिता याद आते हैं. याद आती है बेबसी कि यूं ही उजड़ गये और कितने घर.

(लेखक के पिता सीआरपीएफ में थे और 2007 में हुए एक उग्रवादी हमले में शहीद हो गए थे)

फर्स्ट पोस्ट से साभार

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.