/पार्टनर ये भी तो बता दीजिए कि जो आरोप लगे हैं आईसीआईसीआई बैंक के 48 करोड़ रुपये के फ्राड करने का, उस पर आपका क्या मत है.?

पार्टनर ये भी तो बता दीजिए कि जो आरोप लगे हैं आईसीआईसीआई बैंक के 48 करोड़ रुपये के फ्राड करने का, उस पर आपका क्या मत है.?

-यशवंत सिंह॥

हां ठीक है कि ये लोकतंत्र पर हमला है, अभिव्यक्ति की आजादी पर प्रहार है, मीडिया का गला घोंटने की कोशिश है.. लेकिन पार्टनर ये भी तो बता दीजिए कि जो आरोप लगे हैं आईसीआईसीआई बैंक के 48 करोड़ रुपये के फ्राड करने का, उस पर आपका क्या मत है.

ये भी तो बता दीजिए कि आईआरएस अधिकारी एसके श्रीवास्तव ने चिदंबरम और प्रणय राय द्वारा मिल जुल कर 2जी स्कैम के पैसे के गोलमाल का जो खुलासा किया, उस पर आपका स्टैंड क्या है.

मुझे भी आपसे प्यार था. मैं भी भाजपा विरोधी रहा हूं और हूं. लेकिन आप जो कामरेड होने के नाम पर पैसों का गबन कर रहे हैं, स्कैम में सहयोगी बन रहे हैं, उसका कैसे समर्थन कर सकता हूं.

हां ये सही है कि जी न्यूज वाले चोर हैं, रजत शर्मा भाजपाई है, ऐसे ही अन्य भी जो हैं, वो सब आपके विरोधी हैं, लेकिन आप अपने ब्रांड के नाम पर जो घपले-घोटाले किए हैं और किए जा रहे हैं, उस पर आपको खुल कर सफाई देनी चाहिए, लेकिन आपने ऐसा नहीं किया, क्यों?

चिदंबरम और उनके बेटे के यहां जब इनकम टैक्स का छापा पड़ा था, तभी मुझे पता चल गया कि अब आपकी बारी है. पर आपने तब भी अपना स्टैंड क्लीयर नहीं किया, आपने आईसीआईसीआई बैंक के साथ किए गए फ्राड घोटाले के बारे में अपनी साइट या अपने चैनल पर कुछ नहीं लिखा दिखाया.

दुनिया को पारदर्शिता और लोकतंत्र सिखाने वाले प्रणय राय एंड कंपनी, आप लोग खुद को सरकार विरोधी होने का लाभ भले ले लो, जो कि लेना भी चाहिए, यही राजनीति है, यही तरीका है आजकल का, लेकिन सच यह है कि आपसे हम लोग यानि खासकर भड़ास वाले जमाने से पूछ रहे हैं कि जो काला धन सफेद किया है, तत्कालीन मनमोहन सरकार के मंत्री चिदंबरम के साथ मिलकर, जो आरोप आप पर आईआरएस अधिकरी संजय श्रीवास्तव ने लगाए, जो नोटिस तमाम सरकारी एजेंसीज ने समय समय पर आपको भेजी, उस पर आपकी सफाई क्या है?

एनडीटीवी और प्रणय राय के ऐसे तमाम फ्राड को लेकर आपने अपने यहां कुछ नहीं लिखा और न दिखाया, केवल गोलमोल सफाई देते रहे, जैसे आज दिया है. आपने इन मुद्दों पर अपने चैनल पर प्राइम टाइम डिबेट में न तो निधि राजदान को आगे किया और न रवीश कुमार को. ये लोग दुनिया भर के ढेर सारे मुद्दों पर बहस करते रहे, केवल एनडीटीवी-प्रणय राय के फ्राड को छोड़कर. आपको इन मुद्दों पर भी खुलकर लिखना दिखाना चाहिए था क्योंकि मीडिया तो सबकी और अपनी भी आलोचना करने के लिए जाना माना जाता है. पर आप ऐसा नहीं करेंगे न करने वाले हैं क्योंकि आप एड़ा बनकर पेड़ा खा रहे थे.

आप विचारधारा और पार्टीबाजी के आधार पर खुद को शहीद दिखाकर लाभ लेना चाह रहे थे और ले रहे हैं और लेंगे भी.

पर हम जैसे लोग जो मीडिया को बहुत नजदीक से देख रहे हैं, और जानते हैं कि यहां सिर्फ और सिर्फ लूट और कालाबाजारी है, सरोकार विचार संवेदना जैसी बातें सिर्फ दिखाने कहने वाली चीजें होती हैं, वो ये ठीक से समझते मानते हैं कि आप को ही नहीं, बल्कि इस समय के सारे कथित मुख्य धारा और संपूर्ण कारपोरेट मीडिया के मालिकों को सरेआम सूली पर चढ़ा देना चाहिए. वजह ये कि असल जीवन में आप सब लोग उतने ही बड़े चोट्टे हैं, जितने किसी दूसरे फील्ड के चोट्टे. आप थोड़े कम ज्यादा चोट्टे हो सकते हैं और लेकिन हैं चोट्टे ही.

आपको यह जानना चाहिए कि जिस लोकतंत्र की दुहाई देकर आप बार बार अपना बचाव कर रहे हैं, उसी लोकतंत्र ने जिन्हें चुनकर भेजा है, वो आपसे अपना हिसाब ले रहे हैं, लेकिन उन्हीं चीजों का, जो आपने गलत किया है और उनके हाथों में एक्शन लेने के लिए सौंप दिया है. ये घपले घोटाले आजकल के नहीं, बरसों पुराने है. आपने इन्हें साधने, पटाने की भी कोशिश की लेकिन सफल नहीं हो पाए. आपकी ढेर सारी फाइलें पीएमओ में पड़ी हैं जो आपकी काली कहानी बांय बांय करके बता रही हैं.

जो आपने काला किया है, जो आपने फ्राड किया है, वो आपका ही है. ऐसे लोग भुगतते तो जरूर हैं, कोई देर तो कोई सबेर. कोई इस सरकार के आने पर तो कोई उस सरकार के आने पर. अब तो घपले घोटाले भी पार्टियां के संरक्षण में होता है इसलिए पार्टियां बदलते ही घपले घोटालेबाजों के चेहरे भी बदलने लगते हैं.

मेरी संवेदना आपके साथ है क्योंकि आप फिलहाल पीड़ित हैं और हम लोग पीड़ितों के साथ रहते हैं, भले ही वो चोर हो. लेकिन आप पर अत्याचार के खिलाफ जो मोर्चा निकलेगा, उसमें मैं कतई शरीक नहीं हूंगा. मेरी सदिच्छा आपके साथ कतई नहीं है क्योंकि आपके फ्राड हैं. मीडिया के चोरों को मैं नजदीक से जानता हूं, इसलिए आपके साथ तो कतई नहीं खड़ा रहूंगा.

माफ करिएगा, बड़े लोग, खासकर मीडिया के, अपनी चोरी और फ्राड को बड़े आराम से वैचारिक ताने बाने के जरिए ढंक तोप लेते हैं. मैं ऐसे लोगों को अब कतई सपोर्ट नहीं करता. मुझे न तो आपका साथ चाहिए और न आपके लोगों का. हां, ये भी जानता हूं कि आप आत्ममुग्ध लोग पीड़ित पत्रकारों का न कभी साथ दिए न देंगे. खुद आपके यहां के दर्जनों लोग बिना वजह निकाले गए और प्रताड़ित जीवन जीने को मजबूर किए गए. आप अपनी समृ्द्धि, संबंध और साम्राज्य में मस्त रहे. इसलिए आपको एक्सपोज होते हुए देखकर, आप पर एक्शन होते हुए देखकर, मुझे दिल से आनंद आ रहा है.

ऐसे दौर में जब राजनीति पूरी तरह भ्रष्टतम हो गई है, ऐसे दौर में जब राजनीति सिर्फ अपनी जनता का खून पीने का माध्यम बन गई है, मैं किसी को नहीं कहूंगा कि वह राजनीति या मीडिया जनित उत्तेजना का हिस्सा बने, किसी मोर्चे या मार्च का हिस्सा बने. ये सब आपका टाइम और धन वेस्ट करने का तरीका है.

फिलहाल तो आज का दिन मेरे लिए चीयर्स वाला है… आपके यहां छापा पड़ा, चाहें जिस बहाने से भी, मुझे सुकून पहुंचा है. मुझे खुशी है कि आज आईआरएस अफसर एसके श्रीवास्तव भी खुश होंगे जिन्हें आप लोगों ने पागलखाने भिजवाकर अपने फ्राड चोट्टई को ढंकने की कोशिश की थी.

भड़ास के आठवें स्थापना दिवस पर जब आईआरएस अधिकारी एसके श्रीवास्तव ने एनडीटीवी के प्रणय राय और तत्कालीन वित्त व गृह मंत्री चिदंबरम द्वारा अपने घोटाले चोरकटई को ढंकने के लिए उन्हें जेल भिजवाने की कथा सुनाई तो मेरी ही नहीं, वहां मौजूद सारे लोगों के रोएं खड़े हो गए और एक झुरझुरी तैर गई शरीर में.

ये दौर मान्य संस्थाओं को नष्ट किए जाने का है, तो आपको भी नष्ट होना है क्योंकि आप महा चोरकट लोग हो. हां, सुपर चोरकटों से कुछ कम, कुछ बाएं, कुछ नीचे. तो आप लोग अपनी लड़ाई लड़ें. आपका अंजाम देखना मुझे अच्छा लगेगा.

वेब पत्रकार यशवंत सिंह भड़ासी की फेसबुक वॉल से..

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.