/इस्तीफे की राजनीति: ये तो होना ही था..

इस्तीफे की राजनीति: ये तो होना ही था..

-बब्बन सिंह॥

आज जो हुआ यह पहले से तय था। जब व्यक्तिगत टशन में आकर नीतीश कुमार ने नरेंद्र मोदी के विरोध में भाजपा के साथ अपना गठबंधन छोड़ बिहार की वोट की राजनीति में एक अस्वाभाविक व चिर प्रतिद्वन्दी लालू के साथ महागठबंधन किया था। लेकिन नोटबंदी की एक बड़े वर्ग में स्वीकार्यता और उत्तर प्रदेश में भाजपा गठबंधन की जबरदस्त सफलता ने नीतीश के व्यक्तिगत अहम को वास्तविकता के धरातल पर ला पटका था और वे ऐसे ही किसी घडी का इंतज़ार कर रहे थे जब वे लालू महागठबंधन का साथ छोड़ फिर से पुराने सहयोगी भाजपा का फिर से हाथ थाम  लें।

उधर, बिहार विधानसभा में जबरदस्त हार ने भाजपा को भी नीतीश कुमार की बिहार की राजनीति में अहमियत से भली-भांति परिचित करा दिया था। साफ-सुथरी राजनीति के पैरोकार और बिहार के सामाजिक समीकरण में संख्या बल में कमजोर व पिछड़ी जाति कुर्मी वर्ग से आने वाले बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने गए 20 महीनों में समझ लिया था कि अब लालू व उनकी पार्टी के साथ काम करना उनके बस की बात नहीं। दूसरी ओर, लालू और देश में सेक्युलर राजनीति के सत्ता की केन्द्र विन्दु कांग्रेस ने अभी तक इस सच्चाई को स्वीकार नहीं किया है कि देश में राजनीति की दिशा अब बदल गई है। पहले दिल्ली में केजरीवाल का उद्भव व 2014 में केंद्र में नरेंद्र मोदी सरकार के आगमन ने भारतीय राजनीति में एक बड़े बदलाव का संकेत दिया। शायद यही कारण है कि केंद्र की सत्ता में आने के बाद स्वच्छता की राजनीति के नाम पर नोटबंदी और उत्तर प्रदेश चुनाव में भारी सफलता हासिल करनेवाले नरेंद्र मोदी व अमित शाह की टोली ने देश के सामाजिक-आर्थिक विकास में बगैर किसी क्रांतिकारी बदलाव के बावजूद एक बड़े वर्ग के बीच अपनी स्वीकार्यता बना ली है। अपने पुराने ठसक में लालू और कांग्रेस ने इसे नजरअंदाज किया लेकिन राजनीति के सावधान खिलाडी नीतीश कुमार इसे बड़े गौर से देख रहे थे।

जेपी आंदोलन और सोशल इंजीनियरिंग दौर के गहरे साझीदार नीतीश और लालू के रास्ते नब्बे के दशक में ही अलग हो गए थे जब लालू यादव ने बिहार के वोटबैंक में मजबूत अपनी जाति और सेक्युलर राजनीति के अहम वोट बैंक मुस्लिम समुदाय तथा अपने परिवार तक ही राजनीति को सीमित कर दिया था। सत्ता की राजनीति में थोड़ी देर से सफलता प्राप्त करने वाले नीतीश ने तब समझ लिया था कि अगर बिहार की सियासी सत्ता में कोई जगह बनानी है तो लालू से अलग होना ही होगा। फिर उन्होंने अटल-आडवाणी के भाजपा और जेपी आंदोलन के दौर के अपने पुराने सीनियर व मृदुल साथी सुशील कुमार मोदी का हाथ थाम लिया था।

सामंती ठसक व मिजाज वाले राजनेता के रूप में नीतीश कुमार के लिए राजनीति में अपने से सीनियर लोगों को स्वीकारना स्वाभाविक बात थी पर उस दौर में सीमित हैसियत वाले नरेंद्र मोदी को बाद के दौर में एक वरिष्ठ राजनेता के रूप में स्वीकारना और बात थी। गुजरात की राजनीति के जानकारों को छोड़ शायद ही कोई उस दौर के मोदी के आज के कद का आकलन कर पाया हो। नब्बे के दौर के अंतिम वर्षों में जिसने भी अटल मंत्रिमंडल के एक महत्वपूर्ण सदस्य और रेल मंत्री के रूप में नीतीश को सेंट्रल हाल या रेल भवन में देखा हो वो इस वाकया को भली-भांति समझ सकता है। तब के दिल्ली के नरेंद्र मोदी अशोका रोड स्थित भाजपा कार्यालय तक सीमित थे या कुछ खास महफ़िलों के ही सितारे थे। यही कारण था कि सॉफ्ट सांप्रदायिक गठजोड़ के दौर के भाजपा के तब के साथी नीतीश ने गुजरात के सांप्रदायिक दंगों की कड़ी भर्त्सना की और जब भाजपा की गोवा बैठक के बाद नरेंद्र मोदी का देश की राजनीति में तेजी से उभर हुआ तो खुला विरोध किया। वे व्यक्तिगत अहम में इस बात को भूल गए कि राजनीति में समय अहम होता है व्यक्ति नहीं।

नीतीश ने तब भाजपा के के सबसे मजबूत स्तंभ और उस समय के मोदी के मेंटर आडवाणी पर दांव लगाया था पर आज उनकी दशा से हम सभी परिचित हैं। समय की गति नहीं पढ़ने के कारण महात्मा गांधी के आगमन से पूर्व 1915 में कांग्रेस-मुस्लिम लीग गठबंधन में अहम भूमिका निभाने वाले मुहम्मद अली जिन्ना 1920 के बाद के कांग्रेस में अपने लिए कोई जगह नहीं तलाश पाए और आजीवन गांधी विरोध का तमगा लगाए देश का विभाजन तक करा दिया। लेकिन नीतीश ने इतिहास से सबक लिया है और अब देश के भविष्य की राजनीति में नरेंद्र मोदी की अहमियत को पहचान वापस अपने स्वाभाविक साझेदार भाजपा के साथ गठबंधन बना बिहार की राजनीति में 5 -10 साल के लिए अपना भविष्य सुरक्षित कर लिया है। दूसरी ओर देश में स्वच्छ और साफ़-सुथरी राजनीति के एक अहम पैरोकार को अपनी तरह कर मोदी और भाजपा ने अगले संसदीय चुनाव में अपनी स्थिति और मजबूत कर ली है।

महागठबंधन टूटने का सबसे बड़ा असर लालू और उनके कुनबे पर पड़ने जा रहा है। नीतीश के साथ छोड़ने के कारण मोदी सरकार के लिए लालू के कुनबे को घेरना और आसान हो गया है। शायद इसका असर लालू के वोट बैंक पर भी पड़े। हो सकता है कि अगले संसदीय चुनाव में नीतीश और भाजपा मिल कर गैर यादव और गैर मुस्लिम जाति समूहों का उत्तर प्रदेश जैसा एक ऐसा वोट बैंक तैयार करें जो संसद और विधानसभा में लालू के बल को और सीमित कर दें।

उधर, इस घटना का प्रभाव देश की उदारवादी और सेक्युलर राजनीति के लिए दुखद है। कांग्रेस और उसकी सहायक पार्टियां अगर राजनीति की वर्तमान गति को अब भी नहीं पकड़ पाती तो कोई आश्चर्य की बात नहीं कि लोगों को 2024 तक भाजपा व संघ की तमाम अंडरग्राउंड अजेंडों का सामना करना पड़े जो अबतक सामने नहीं आ पाया है।

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.