/इतनी लचर और निराधार नहीं है वायर की खबर..

इतनी लचर और निराधार नहीं है वायर की खबर..

इंडियन रिन्यूएबल एनर्जी डेवलपमेंट एजेंसी की तरफ से कौन बोलेगा मंत्री जी?

-संजय कुमार सिंह॥

वायर की खबर में एक महत्वपूर्ण बात जय शाह के अलावा, सार्वजनिक क्षेत्र के उद्यम- इंडियन रिन्यूएबल एनर्जी डेवलपमेंट एजेंसी (आईआरईडीए) से 10.35 करोड़ का कर्ज लेने या देने की है। इसकी वेबसाइट के मुताबिक यह एक मिनी रत्न कंपनी है। यह कंपनी नई और अक्षय ऊर्जा मंत्रालय के तहत काम करती है। जिस समय यह कर्ज मंजूर किया गया, उस समय पीयूष गोयल इसके मंत्री थे। इस कंपनी ने जय शाह की पार्टनरशिप वाली कंपनी को मार्च, 2016 में कर्ज दिया है।

खबर में कहा गया है, “शाह के वकील का कहना है कि ‘2.1 मेगावाट के पवन ऊर्जा संयंत्र को स्थापित करने के लिए आईआरईडीए से लिया गया कर्ज उस समय इंडस्ट्री मानकों के हिसाब से उपकरणों की कीमत (करीब 14.3 करोड़) पर आधारित है। इसकी बाकायदा समीक्षा की गई थी और साधारण व्यापार के तहत इसे उपलब्ध कराया गया था। 30-06-17 को कुल बकाया कर्ज 8.52 करोड़ है और ब्याज और कर्ज की पुनर्अदायगी नियमित तौर पर की जा रही है।”

इसी खबर में आगे कहा गया है, “जो बात स्पष्ट नहीं होती, वह है वह मानक, जिसके आधार पर एक पार्टनरशिप, जिसका मुख्य कारोबार, शाह के वकील के मुताबिक, ‘स्टॉकों और शेयरों की ट्रेडिंग, आयात-निर्यात गतिविधियां और डिस्ट्रीब्यूशन और मार्केटिंग कंसल्टेंसी सर्विसेज है, 2.1 मेगावाट की पवन ऊर्जा परियोजना के लिए आवदेन करने का फैसला किया और उसे इसके लिए कर्ज भी मिल गया, जबकि उसके पास बुनियादी ढांचा या बिजली क्षेत्र का कोई पूर्व अनुभव नहीं था। कर्ज देने की नीति के बारे में जानकारी लेने के लिए ‘द वायर’ ने आईआरईडीए से भी संपर्क साधा है और इसका जवाब आने पर इसे रिपोर्ट में शामिल किया जाएगा।”

दि वायर ने यह जवाब अभी तक साझा नहीं किया है। इसलिए मानकर चल रहा हूं कि कंपनी ने कोई जवाब नहीं दिया है। मेरा सवाल यहीं है, जय शाह का मामला तो चलो अदालत में है पर सार्वजनिक क्षेत्र के उद्यम- इंडियन रिन्यूएबल एनर्जी डेवलपमेंट एजेंसी ने किसी को कर्ज किन शर्तों पर दिए यह जानने और पूछने का हक क्या आम आदमी को नहीं है? वह भी तब जब कंपनी पहली नजर में इस क्षेत्र में काम करने वाली नहीं है और उसे इस क्षेत्र का अनुभव हो ऐसा कुछ नजर नहीं आ रहा है। पीयूष गोयल अगर शाह का बचाव और खबर की निन्दा नहीं कर रहे होते तो यह माना जा सकता था कि उन्हें यह सब मालूम ही नहीं है। पर जब वे जय शाह का बचाव कर रहे हैं तो उस कंपनी का बचाव क्यों नहीं कर रहे हैं जो उनके या उनके मंत्रालय के अधीन थी?

यह भी मान लूं कि पीयूष गोयल कंपनी का बचाव करें या उसकी ओर से बोलें तो यह अपना बचाव करना लग सकता है। तब क्या मौजूदा मंत्री श्री आरके सिंह को इस संबंध में स्पष्टीकरण नहीं देना चाहिए। या कंपनी से पूछताछ नहीं करनी चाहिए। इतनी चर्चित खबर में मंत्रालय का नाम है, उसके कर्ज देने की नीति पर सवाल है – तब भी जवाब देने की जरूरत ही नहीं है? जैसा कि ऊपर लिख चुका हूं, मूल खबर में ही कहा गया है कि कंपनी का जवाब छापा जाएगा और अभी तक जवाब नहीं है मतलब कुछ तो गड़बड़ है। भक्तों को नहीं दिख रहा। भक्त के रूप में आपको भी नहीं दिखेगा पर आप मंत्री भी तो हैं। मंत्री के रूप में आपकी जवाबदेही का क्या हुआ?

वायर की खबर में एक और मामला महत्वपूर्ण है। और ऐसा नहीं होता तो इतने लोग बचाव में क्यों लगते। अवमानना का मामला क्यों दर्ज कराया जाता जबकि एक बयान या ट्वीट से बात स्पष्ट हो सकती थी। खबर के एक हिस्से में कोऑपरेटिव बैंकों से वित्तीय सहायता की भी चर्चा है। मैं इस मामले में विस्तार से नहीं जाउंगा सिर्फ याद दिलाउंगा कि नोटबंदी के समय गुजरात के कोऑपरेटिव बैंकों से अमित शाह के संबंधों की चर्चा भी थी। एक सज्जन ने अपने 8000 करोड़ रुपए के कालेधन की घोषणा की थी पर फिर धन नहीं दिया।

वे लापता रहे और उन्हें टेलीविजन स्टूडियो से गिरफ्तार कर लिया गया था। उसके बाद से इस मामले की कोई चर्चा नहीं है। अब जब एक बार फिर शाह परिवार से कोऑपरेटिव बैंकों के संबंधों की चर्चा चली थी (या आरोप लगे थे) तो क्या यह बेहतर नहीं होता कि इस मामले में स्पष्टीकरण दिया जाता या निष्पक्ष जांच कराई जाती ताकि यह साबित हो जाता कि सब कुछ ठीक है। इसकी बजाय कि मानहानि के मुकदमे से मामले की चर्चा पर जबरदस्ती रोक लगाई जाए।

मैं टेलीविजन नहीं के बराबर देखता हूं। इसलिए पता नहीं है कि अमित शाह के बेटे जय शाह से संबंधित वायर की खबर को टेलीविजन पर कैसे दिखाया गया। अखबारों में तो खबर की चर्चा न के बराबर है। सोशल मीडिया पर भक्त पत्रकार कह रहे हैं कि खबर बदनाम करने की कोशिश है और कुछ भक्तों ने तो बाकायदा उन वायर सेवाओं के लिंक भेजे हैं जो बताते हैं कि वायर की स्टोरी कैसे खबर ही नहीं है। आदि। इसके बावजूद जय शाह ने एलान किया है कि, “अगर कोई भी इस बताये गये लेख में लगाये गए इल्ज़ामों को दोबारा प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से प्रकाशित/प्रसारित करता है तो वह व्यक्ति/संस्थान भी इसी अपराध/ सिविल लायबिलिटी का दोषी होगा।”

इसलिए, मैंने वायर की इस खबर के अक्षय उर्जा मंत्रालय से संबंधित हिस्से की चर्चा कर रहा हूं। इस उम्मीद में कि भारत सरकार ने भी सवाल उठाने पर अवमानना का मुकदमा करने का कोई नियम नहीं बनाया होगा और बनाया होता तो जय शाह की तरह एलान करती। ऊपर संदर्भ के लिए जय शाह की चर्चा करनी पड़ी है इसके लिए माफी चाहूंगा और उम्मीद करूंगा कि जय शाह देश की एक बहुत ही ताकतवर हस्ती के सुपुत्र हैं, कोई छुई मुई नहीं, नाम लेने भर को अवमानना नहीं मानेंगे।

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.