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भाजपा किस खौफ से सहमी सहमी सी है

By   /  October 25, 2017  /  1 Comment

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-ओम थानवी॥

अशोक गहलोत का ग़ुस्सा जायज़ है। लोकतंत्र में राजनीति करने वालों का मिलना भी क्या अपराध होता है? फिर पुलिस और ख़ुफ़िया ब्यूरो से इसकी जासूसी क्यों, कि राहुल गांधी, अशोक गहलोत, हार्दिक पटेल, जिग्नेश मेवानी आदि किससे मिल-मिला रहे हैं?

जासूसी का धंधा गुजरात में नया नहीं। पर भाजपा को इतने ख़र्च, केंद्र के ख़ज़ाने से निकली योजनाओं, जीएसटी की पलटी, नेताओं-कार्यकर्ताओं की फ़ौज़, प्रचार, कृतज्ञ मीडिया के सहयोग, चुनाव आयोग के समर्पण आदि के बाद आख़िर डर किस बात का है?

कहना न होगा भाजपा किसी अज्ञात भय से सहमी हुई है। हालाँकि कांग्रेस वहाँ मज़बूत विकल्प नहीं बन पाई है तो वजह पार्टी की अपनी कार्यशैली है। चुनाव आने पर ही उसमें जाग आती है। जबकि तैयारी पाँच साल चलनी चाहिए। अभी तो आलम यह है कि चुनाव की हलचल में भी लोग बाहर गुजरात के कांग्रेसी दिग्गजों के नाम तक नहीं जानते, केंद्र के प्रतिनिधि अशोक गहलोत ही पार्टी की पहचान हैं।

इतना कुछ झोंक देने के बाद भी भाजपा चुनाव से ख़ौफ़ खा रही है (देरी की और क्या वजह होगी) और जासूसी पर उतर आई है (जीतनेवाले को आने-जाने नेताओं की क्या फ़िक़्र) तो भाजपा की इस खदबद को समझना चाहिए – उतावले चैनल चाहे कुछ भी कहें।

भाजपा अगर जीतेगी तो अपने काम पर नहीं, कांग्रेस की नाकामी और चुनाव आयोग की कृपा से, जिसने चुनाव घोषणा टालकर अपनी साख को अपूर्व बट्टा लगाया है। जीतने/जिताने वाले को वरना तरह-तरह के इतने दंद-फंद की ज़रूरत कब होती है?

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  • Published: 4 weeks ago on October 25, 2017
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  • Last Modified: October 25, 2017 @ 8:38 am
  • Filed Under: राजनीति

About the author

मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक “मुखौटों के पीछे – असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष” में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.

1 Comment

  1. अशोक says:

    लगभग 20हजार से अधिक मोबइल ट्रेप किये जा रहे है जो सरकार से सबाल जबाब करे उनको सरकार और उसकी मशीनरी परेसान कर रही है मुझे लगता है कि फिर से पूरी कॉलोनी के वोट उड़ा दिए जाएंगे

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