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तो क्या राहुल गांधी और यशवंत सिन्हा को भी ऐसे ही उठा लेती पुलिस.?

By   /  October 27, 2017  /  No Comments

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-नदीम एस. अख्तरLL

वरिष्ठ पत्रकार विनोद वर्मा को जिस तरह छत्तीसगढ़ पुलिस ने आनन-फानन में उनके घर से गिरफ्तार किया, उसमें संदेह के कई घेरे हैं. हद तो तब हो गई, जब रायपुर में छत्तीसगढ़ पुलिस के एक आला अधिकारी ने प्रेस कॉन्फ्रेस करके बताया कि सीडी के मामले में प्रकाश बजाज नामक जिस आदमी ने एफआईआर करवाई है, उसमें पत्रकार विनोद वर्मा का नाम ही नहीं है.

तो फिर विनोद वर्मा की गिरफ्तारी क्यो हुई??!! पुलिस विनोद जी की गिरफ्तारी का एक बहुत ही बचकाना तर्क दे रही है. बीबीसी की खबर के मुताबिक पुलिस कह रही है कि दिल्ली में जो दुकानदार सीडी की 500 कॉपी बना रहा था, उसने पुलिस को बताया कि ये -ऑर्डर- विनोद वर्मा ने उसे दिया है. गजब है. एक दुकानदार की बात पर आंख मूंदकर पुलिस विश्वास कर लेती है और आगे-पीछे सोचे बिना एक सम्मानित पत्रकार को रातोंरात उनके घर से उठा लेती है. छत्तीसगढ़ पुलिस ने तो हमें त्रेतायुग और द्वापर युग के दर्शन करा दिए!!
फर्ज कीजिए कि अगर दुकानदार ने राहुल गांधी का नाम लिया होता तो ?? तब क्या इसी दैवीय आवेग में छ्तीसगढ़ पुलिस राहुल गांधी को हिरासत में लेने उनके घर पहुंच जाती?? या फिर उसने बीजेपी के ही यशवंत सिन्हा का नाम ले लिया होता तो? क्या उनको भी इसी तरह लाकर थाने में बिठाती और फिर कोर्ट से ट्रांजिट रिमांड लेकर छत्तीसगढ़ के लिए उड़ लेती??!!

दरअसल मामला इतना सीधा है नहीं, जितना बताया जा रहा है. एक खबर ये भी आई कि विनोद वर्मा छत्तीसगढ़ कांग्रेस के एक बड़े नेता के लिए सोशल मीडिया देखते हैं. मेरे एक साथी ने ये खबर कन्फर्म भी की लेकिन जिस तरह से विनोद वर्मा को गिरफ्तार करके ले जाया गया, वो भी बचाकानी दलीलों की बुनियाद पर, वो छत्तीसगढ़ सरकार और वहां की पुलिस पर बेहद गंभीर सवालिया निशान लगाते हैं.

विनोद वर्मा तो फिर भी पत्रकार हैं. तमिलनाडु में दुबारा सत्ता में आने के बाद जयललिता ने भूतपूर्व मुख्यमंत्री करुणानिधि को घसीटकर घर से उठवा लिया था. तब ये दृश्य पूरे देश ने टीवी पर देखा था. इंदिरा गांधी की इमरजेंसी और संजय गांधी का नसबंदी अभियान अभी भी लोगों के जेहन में ताजा हैं.

सो जिसको जो करना है, करे. मैं बस इतना याद दिलाऊंगा कि कल को अगर सत्ता बदली, कांग्रेस की सरकार बनी या उसकी अगुवाई में कोई गठबंधन सरकार आई तो -बदले की राजनीति- और कड़वी होगी. इंदिरा की इमरजेंसी के बाद कांग्रेस डरी रहती थी लेकिन मौजूदा दौर में उसने देख लिया कि खुलेआम क्या-क्या किया जा सकता है. और कांग्रेस के घाघों को हल्के में मत लीजिएगा. अन्ना को जेल भेजा जाना और रामदेव पर लाठीचार्ज याद है ना!! अबकी बार कांग्रेस सत्ता में आई तो खुलकर खेलेगी.

मौजूदा दौर ने उसको रास्ता दिखा दिया है. सो जो लोग आजकल हर ऐसी घटना को पार्टी-विचारधारा के चश्मे से देखने लगते हैं उनको आगाह करता हूं. अगर कांग्रेस अपनी पे उतर के अपने राज में ऐसा ही करने लगे तो फिर लोकतंत्र, फ्रीडम ऑफ स्पीच और तानाशाही का रोना मत रोइएगा. आज मेरी बारी, तो कल तेरी बारी. सबकी आएगी बारी, बारी-बारी.

सत्ता का एक ही चरित्र होता है. निर्मम और निरंकुश. सिर्फ चोले बदलते हैं.

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  • Published: 4 weeks ago on October 27, 2017
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  • Last Modified: October 27, 2017 @ 8:34 pm
  • Filed Under: राजनीति

About the author

मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक “मुखौटों के पीछे – असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष” में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.

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