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देश पर राज करने के लिए आपको खिचड़ी पकाने की कला आनी चाहिए..

By   /  November 2, 2017  /  No Comments

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-अभिषेक श्रीवास्तव||

परंपरागत ज्ञान है कि मनुष्‍य का कैरेक्‍टर उसके खानपान से समझ में आता है। शास्‍त्रों के मुताबिक खानपान का प्रभाव आदमी के व्‍यक्तित्‍व और चरित्र पर भी पड़ता है। चीन में तो लोग किसी के घर की नाली में बहता हुआ अन्‍न देखकर उसके सामाजिक रसूख का पता लगा लेते हैं। आधुनिक कॉरपोरेट दफ्तरों के बारे में यह बात आम है कि किसी दफ्तर का कैरेक्‍टर उसकी कैंटीन को देखकर समझ आ सकता है। पहली बार यह बात मुझे टाइम्‍स ऑफ इंडिया में समझ आई थी जहां नीचे वाली और ऊपर वाली कैंटीन का फ़र्क देखते ही समझ आ जाता था कि कौन सी हिंदीवालों की है और कौन अंग्रेज़ीवालों की। कहने का मतलब ये कि खानपान की प्राथमिकताएं आपकी भाषा और संस्‍कृति के रास्‍ते विचारधारा तक मार करती हैं। इस लिहाज से संघ के राष्‍ट्रवादी राज में खिचड़ी को राष्‍ट्रीय व्‍यंजन का दरजा देने की तैयारी के निहितार्थ गहरे हैं।

खिचड़ी वास्‍तव में इस देश का प्रतिनिधि व्‍यंजन है क्‍योंकि तकरीबन पूरे देश में यह अपने अलग-अलग संस्‍करणों में मौजूद है। दूसरे, जैसा कि नाम से ध्‍वनित होता है, इसमें आप जो चाहे डालिए, इसका मूल कैरेक्‍टर खिचड़ीनुमा ही रहता है। साथ में दही, पापड़, चटनी, घी, अचार जैसे पूरक तत्‍व इसके चरित्र को और पुष्‍ट ही करते हैं। इसमें कोई तत्‍व प्रधान या विशिष्‍ट नहीं होता। हर चीज़ गल के खिचड़ी का अंग बन जाती है। अंग्रेज़ी वाले भारतीय सभ्‍यता-संस्‍कृति को ‘मेल्टिंग पॉट’ कहते हैं। ज़ाहिर है, जब तमाम विरोधी चीज़ें एक हांडी में मेल्‍ट होती हैं, तो खिचड़ी ही पकती है। और कोई संभावना ही नहीं बचती।

समाजवाद, साम्‍यवाद, वर्णवाद, सामंतवाद, आधुनिकता, वैज्ञानिकता, नास्तिकता, आस्तिकता, द्वैतवाद, एकेश्‍वरवाद, अद्वैतवाद, राष्‍ट्रवाद, अंतरराष्‍ट्रीयतावाद, नस्‍लवाद… ये सब प्रवृत्तियां इस समाज का अभिन्‍न अंग रही हैं। बरसों से भारतीय समाज की हांडी में मेल्‍ट होते-होते सवा सौ साल पहले एक फाइनल प्रोडक्‍ट बना था जिसे नाम दिया गया कांग्रेस। कांग्रेस मने कोई पार्टी नहीं, इस देश का केंद्रीय विचार। डीएनए। जैसे खिचड़ी। सब कुछ थोड़ा-थोड़ा। कोई भी पक्ष प्रधान नहीं। अगर कांग्रेस सरकार में खिचड़ी को राष्‍ट्रीय व्‍यंजन करार दिया गया होता तो यह एक सहज बात होती। संघ के राज में ऐसा होना प्रॉब्‍लमेटिक है। देश के लिए नहीं, कांग्रेस और भाजपा के लिए।

खानपान देखकर चरित्र बताने वाली परंपरा के चश्‍मे से देखें तो यह भाजपा के कांग्रेसीकरण का पहला ठोस उदाहरण है। लंबी दौड़ में खिचड़ी के सेवन का असर संघ की विचारधारा पर भी पड़ेगा। दरअसल, इस खिचड़ीनुमा देश पर राज करने के लिए आपको खिचड़ी पकाने की कला आनी चाहिए। उसके लिए सबसे पहले अपने चरित्र को खिचड़ीनुमा बनाना अनिवार्य है। भाजपा धीरे-धीरे यह सीख रही है। संघ ऐसा होने नहीं देगा। दोनों में खिचड़ी पकेगी। यह स्‍वागतयोग्‍य है। दूसरे, राजकाज की विवशता के चलते भाजपा यदि कालांतर में कांग्रेस जैसी बन ही जाती है तो राहुल गांधी की क्‍या ज़रूरत रह जाएगी भला? इसलिए कांग्रेस को अब सीरियसली खिचड़े पर शिफ्ट होना चाहिए। खिचड़ा सुरक्षित है। भाजपा उसे कभी नहीं छुएगी।

{अभिषेक श्रीवास्तव मीडिया विजिल के कार्यकारी संपादक हैं ओर यह लेख उनकी फेसबुक वाल से लिया गया है}

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  • Published: 3 weeks ago on November 2, 2017
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  • Last Modified: November 2, 2017 @ 7:51 am
  • Filed Under: देश

About the author

मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक “मुखौटों के पीछे – असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष” में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.

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