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नियमों में छूट का फायदा नहीं, छोटे कारोबारियों को मार देगा जीएसटी..

By   /  November 7, 2017  /  No Comments

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-संजय कुमार सिंह||

मेरी फर्म का चालू खाता जिस बैंक में है उसमें जाना नहीं होता है। नेटबैंकिंग चका-चक चलता है। कई दिनों से मैसेज आ रहा है केवाईसी पूरा नहीं है। 2005 में खाता खुला था – केवाईसी पूरा नहीं है का कोई मतलब नहीं है। नेटपर पूरा करने की कोशिश की तो बताया कि जरूरत नहीं है। पर एसएमएस आया था। कल की किस्त पीस पोस्ट करने के बाद कुछ लोगों से बात हुई तो सोचा देख लूं नोटबंदी की बरसी और जीएसटी में छूट की घोषणा के महीने भर बाद क्या हाल है। सो बैंक चला गया। उससे पहले बता दूं कि मैं अपने घर से काम करता हूं कोई ऑफिस नहीं है और कोई ऐसा सरकारी कागज नहीं है जो यह बताये कि मेरी फर्म इस पते से संचालित होती है। ये पंगा पहले भी रहा है। मैंने कहा कि आप देख लो और खाता तो खुल गया हालांकि वो भी पटपड़गंज वाला खाता बंद करने से पहले खुल गया था और तब की बात अलग थी। मुझे धमकी मिलती रहती है कि खाता बंद हो जाएगा और मैं कई बार कह चुका हूं कि बंद कर दो।

ऐसे में जीएसटी के नियमों के बाद धमकी गंभीर हो गई है। पर मेरे मामले में छूट का क्या असर हुआ यही देखना था। पहले मुझसे कहा गया था कि सीए का सर्टिफिकेट मेरे मामले में चलेगा। हालांकि, मैंने असल में वह भी नहीं दिया है। बैंक वाले जानते हैं कि तस्करी नहीं करता इसलिए वो भी औपचारिकता ही निभाते हैं। मेरा तर्क यही है कि जब मैं सर्विस टैक्स में आता नहीं हूं, सेल्स टैक्स लगता नहीं है तो कोई भी सरकारी पंजीकरण क्यों कराऊं। रही वेरीफिकेशन की बात तो बैंक वाले चलकर देख लें। पर अब तो उन्हें कागज चाहिए। सबूत। बैंक में जिस क्लर्क से बात हुई उसने कहा इतना पुराना खाता है – नहीं – ठीक है। मैंने कहा धमकी आई है, बंद हो जाएगा। देख लो। उसने सीनियर से पूछा औऱ सीनियर के साथ कोई महिला ग्राहक वाली कुर्सी पर बैठी थी जो सीए के लेटरहेड पर कोई चिट्ठी लेकर आई थी। जाहिर है, किसी ग्राहक का काम कराने आई होगी। बैंक अधिकारी की जगह वही मुझे और बैंक कर्मचारी को नियम समझाने लगी।

उसका कहना था कि आप कोई भी काम करते हों, जीएसटी पंजीकरण तो होना ही चाहिए। मैंने कहा कि मेरे मामले में जीएसटी में 31 मार्च तक छूट दी गई है। छह अक्तूबर को बाकायदा। उसने कहा पुराना खाता है – सर्विस टैक्स होगा, लेबर के लिए पंजीकरण होगा। मैंने कहा पहले मुझे किसी पंजीकरण की कोई जरूरत नहीं था। एक जुलाई के बाद कोई काम नहीं आ रहा है और 31 मार्च तक छूट है। तो उसने कहा कि नहीं कोई कागज तो देना ही पड़ेगा। मैंने कहा सीए सर्टिफिकेट कहा गया था दे दूं। उसने कहा नहीं जीएसटी के बाद नहीं। जाहिर है उसे छूट का पता नहीं था और बैंक में किसी को कोई मतलब नहीं है। खाता वो अभी बंद कर नहीं सकते। मेरे पास ना काम है ना उस खाते में पैसा। उन्हें नियमों की जानकारी है नहीं। अपना काम कर रहे हैं। औपचारिकता निभाओ। मैं तो जानता हूं, समझ रहा हूं। निपट लूंगा। मेरा मामला सीए भी देख लेगा वकील भी चला जाएगा। पर आम आदमी। जो कम पढ़ा लिखा है। उसका क्या होगा? वो कैसे जिन्दा रहेगा? क्या सरकार छोटा-मोटा काम करके जिन्दा नहीं रहने देगी। गरीब काम नहीं करेगा तो भूखे मरेगा कि नहीं? मैं तो निपट लूंगा। खाता बंद होगा तो अदालत में निपट लूंगा। उधार मिल जाएगा। फ्लैट बेच दूंगा। पर जो ये सब नहीं कर सकता आत्महत्या करे ले? भक्तों बताओ कुछ। या यही मान लो कि नियमों में ढील किस्तों में छूट देने से कुछ नहीं होगा।

और हां, टैक्स चोरी। भक्त गण माने बैठे हैं कि जीएसटी से टैक्स चोरी रुक जाएगी और तमाम टैक्स चोर जीएसटी पंजीकरण कराने लगे हैं। एक दुकानदार धड़ा-धड़ कच्चा बिल बनाए जा रहा था। एक आदमी हाथ से बिल बना रहा था, एक नकद ले रहा था, एक कार्ड स्वाइप कर रहा था आदि आदि। एकदम फटाफट। वहां सीसीटीवी भी लगा था। मैं चौकन्ना हुआ। जानबूझ कर लाइन में पीछे हो गया। मामला समझ तो लूं। मेरे आगे किसी ने कच्चे बिल पर एतराज नहीं किया। मैंने देखा कि कुल राशि के बाद वह प्रतिशत निकाल कर कैलकुलेटर से हिसाब कर रहा था। पर ग्राहकों में कोई पक्के बिल की बात नहीं कर रहा था। थोड़ी देर में मामला समझ में आया – जो नकद भुगतान कर रहा था उसे छूट दी जा रही थी और कार्ड वालों से पूरे पैसे। अब यह दुकानदार अपनी कार्ड वाली बिक्री के अलावा नकद में से कितनी बिक्री खातों में दिखाएगा ये कौन तय करेगा? वही ना? कार्ड वाले में कोई विकल्प नहीं है। बाकी को वह छूट दे चुका है। ऊपर वाले की नजर में ईमानदारी से काम कर रहा है। और टैक्स? सरकार के साथ भक्तगण उम्मीद करते रहें।
#GSTkasach

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About the author

मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक “मुखौटों के पीछे – असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष” में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.

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