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जब देश का हर दूसरा व्यक्ति ब्रोकाइंटिस से पीड़ित होगा

By   /  November 10, 2017  /  No Comments

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शंभुनाथ शुक्ला।।

दिल्ली-एनसीआर के प्रदूषण का जायजा लेने के लिए आज सुबह साढ़े आठ बजे मैं घर से निकला. पैदल कोई डेढ़ किमी चलकर विक्रम टेम्पो पकड़ा और आनंद विहार तक गया. वहाँ धुंध, धूल और गाड़ियों के धुएँ के कारण ऐसा लग रहा था मानों नथुनों में कोई किनकिनाती हुई चीज घुस गयी हो. फिर वापस लौटा और उतनी ही दूर का विक्रम टेम्पो पकड़ कर पैदल घर आया.

यह समय चूँकि पीक आवर होता है. इसलिए टेम्पो में निर्धारित सात के बजाय पूरे 11 सवारियां ठुंसी थीं और ड्राईवर अलग. लड़कियाँ, महिलाएं और युवक तथा प्रौढ़ भी. सड़क पर निजी वाहनों की इतनी रेलमपेल थी कि गाड़ियाँ दौड़ नहीं सकिल रही थीं. धुआँ और धूल छोडती प्राइवेट माफियाओं की बसें, खनन माफियाओं के मिट्टी से लदे ट्रैक्टर भी चल रहे थे. साइकिल मार्ग पर कारें खड़ी थीं. और पैदल के लिए तो तिल भर जगह नहीं. आनंद विहार रोड पर एक मर्सडीज का मालिक आडी के मालिक से लड़ते हुए कह रहा था दिल्ली-एनसीआर के प्रदूषण का जायजा लेने के लिए आज सुबह साढ़े आठ बजे मैं घर से निकला. पैदल कोई डेढ़ किमी चलकर विक्रम टेम्पो पकड़ा और आनंद विहार तक गया.

वहाँ धुंध, धूल और गाड़ियों के धुएँ के कारण ऐसा लग रहा था मानों नथुनों में कोई किनकिनाती हुई चीज घुस गयी हो. फिर वापस लौटा और उतनी ही दूर का विक्रम टेम्पो पकड़ कर पैदल घर आया. यह समय चूँकि पीक आवर होता है. इसलिए टेम्पो में निर्धारित सात के बजाय पूरे 11 सवारियां ठुंसी थीं और ड्राईवर अलग. लड़कियाँ, महिलाएं और युवक तथा प्रौढ़ भी. सड़क पर निजी वाहनों की इतनी रेलमपेल थी कि गाड़ियाँ दौड़ नहीं सकिल रही थीं. धुआँ और धूल छोडती प्राइवेट माफियाओं की बसें, खनन माफियाओं के मिट्टी से लदे ट्रैक्टर भी चल रहे थे. साइकिल मार्ग पर कारें खड़ी थीं. और पैदल के लिए तो तिल भर जगह नहीं.

आनंद विहार रोड पर एक मर्सडीज का मालिक आडी के मालिक से लड़ते हुए कह रहा था किअबे तू पौवे जैसी अपनी कार लेकर मेरी स्काच नुमा गाड़ी को सटा रहा है. इससे जाम लग गया और इसी बीच एक लोकल माफिया का हाफबॉडी ट्रक आया और ढेर सारा धुआँ उगल दिया. सबने उसे ग्रहण किया. लोकल पुलिस का बन्दा नाक पर थूथन जैसी कोई चीज़ लगाए खड़ा था. पेड़ों पर मोटी-मोटी धूल की परत जमा थी. टेम्पो से उतरकर जैसे ही जैन मन्दिर वाली सड़क पर आया वहां सड़क के एक तरफ प्राइवेट मकानों में निर्माण कार्य चल रहा था तो दूसरी तरफ सरकारी. सड़क के दोनों तरफ धूल थी, पास की झुग्गियों में बसे लोग सुबह वहीँ मल विसर्जन करते हैं वहाँ पर मलय पवन नहीं गंदगी और बदबूदार हवा बह रही थी. पास की साहिबाबाद की फैक्ट्रियां धुआँ उड़ेल रही थीं और एसिड की वर्षा भी कर रही थीं.

अब ऐसे माहौल में राजनेताओं की मटरगश्ती देखिए! दिल्ली के सीएम श्री अरविन्द केजरीवाल फरमाते हैं कि पंजाब के किसान पराली जलाते हैं, यह उसका धुंआ है, इससे हमारी दिल्ली प्रदूषित हो रही है. पंजाब के मुख्यमंत्री श्री कैप्टन अमरिंदर सिंह जवाब देते हैं कि केजरीवाल अजीब इंसान है, उसे समझ ही नहीं है फिर भी टांग अड़ाए जा रहा है. उधर हमारे यूपी के सीएम योगी आदित्यनाथ बेखबर हैं क्योंकि उनकी गायों को प्रदूषण से परेशानी नहीं है और चूँकि गाय के नाम पर ही वे सरकार में आए इसलिए प्रदूषण के लिए वे भला क्या करें! खैर, अपुन को भी प्रदूषण से कोई परेशानी नहीं है. अपुन तो यूँ भी कानपुर के हैं जहां के लोग प्रदूषण रहित वातावरण में बेचैन होने लगते हैं. लेकिन मुझे लगा कि अगर ऐसा ही माहौल रहा तो या तो दस साल बाद हर तीसरा आदमी कैंसर पीड़ित होगा और हर दूसरा व्यक्ति ब्रोंकाइटिस से बेहाल खांस रहा होगा. टीबी का दौर फिर लौट आएगा और पीढ़ियाँ कोढ़ी होंगी. मेरे साथ ही मेरा मधुमेह तो विदा ले लेगा लेकिन दूसरी ऐसी बीमारियाँ पनपने लगेंगी कि इतिहास अपने को दोहराएगा. एसिड की वर्षा से महाप्रलय आएगी और शायद फिर से सृष्टि की शुरुआत हो. आदमी पहले बंदर की शक्ल में आए और हजारों-लाखों वर्ष बाद वह इंसान बने और फिर उसी तरह निपट जाए.

अभी भी समय है कि आदमी चेत जाए. अपने लोकतान्त्रिक अधिकारों के प्रति जागरूक हो. इन लोभी और दम्भी नेताओं के भरोसे न रहे. तब शायद यह प्रदूषण ख़त्म हो. आबादी पर नियंत्रण और शहरीकरण पर कंट्रोल तथा उपभोक्तावाद को खत्म करना ही इसका निदान  तू पौवे जैसी अपनी कार लेकर मेरी स्काच नुमा गाड़ी को सटा रहा है. इससे जाम लग गया और इसी बीच एक लोकल माफिया का हाफबॉडी ट्रक आया और ढेर सारा धुआँ उगल दिया. सबने उसे ग्रहण किया. लोकल पुलिस का बन्दा नाक पर थूथन जैसी कोई चीज़ लगाए खड़ा था. पेड़ों पर मोटी-मोटी धूल की परत जमा थी. टेम्पो से उतरकर जैसे ही जैन मन्दिर वाली सड़क पर आया वहां सड़क के एक तरफ प्राइवेट मकानों में निर्माण कार्य चल रहा था तो दूसरी तरफ सरकारी. सड़क के दोनों तरफ धूल थी, पास की झुग्गियों में बसे लोग सुबह वहीँ मल विसर्जन करते हैं वहाँ पर मलय पवन नहीं गंदगी और बदबूदार हवा बह रही थी. पास की साहिबाबाद की फैक्ट्रियां धुआँ उड़ेल रही थीं और एसिड की वर्षा भी कर रही थीं.

अब ऐसे माहौल में राजनेताओं की मटरगश्ती देखिए! दिल्ली के सीएम श्री अरविन्द केजरीवाल फरमाते हैं कि पंजाब के किसान पराली जलाते हैं, यह उसका धुंआ है, इससे हमारी दिल्ली प्रदूषित हो रही है. पंजाब के मुख्यमंत्री श्री कैप्टन अमरिंदर सिंह जवाब देते हैं कि केजरीवाल अजीब इंसान है, उसे समझ ही नहीं है फिर भी टांग अड़ाए जा रहा है. उधर हमारे यूपी के सीएम योगी आदित्यनाथ बेखबर हैं क्योंकि उनकी गायों को प्रदूषण से परेशानी नहीं है और चूँकि गाय के नाम पर ही वे सरकार में आए इसलिए प्रदूषण के लिए वे भला क्या करें! खैर, अपुन को भी प्रदूषण से कोई परेशानी नहीं है. अपुन तो यूँ भी कानपुर के हैं जहां के लोग प्रदूषण रहित वातावरण में बेचैन होने लगते हैं. लेकिन मुझे लगा कि अगर ऐसा ही माहौल रहा तो या तो दस साल बाद हर तीसरा आदमी कैंसर पीड़ित होगा और हर दूसरा व्यक्ति ब्रोंकाइटिस से बेहाल खांस रहा होगा. टीबी का दौर फिर लौट आएगा और पीढ़ियाँ कोढ़ी होंगी. मेरे साथ ही मेरा मधुमेह तो विदा ले लेगा लेकिन दूसरी ऐसी बीमारियाँ पनपने लगेंगी कि इतिहास अपने को दोहराएगा. एसिड की वर्षा से महाप्रलय आएगी और शायद फिर से सृष्टि की शुरुआत हो. आदमी पहले बंदर की शक्ल में आए और हजारों-लाखों वर्ष बाद वह इंसान बने और फिर उसी तरह निपट जाए.

अभी भी समय है कि आदमी चेत जाए. अपने लोकतान्त्रिक अधिकारों के प्रति जागरूक हो. इन लोभी और दम्भी नेताओं के भरोसे न रहे. तब शायद यह प्रदूषण ख़त्म हो. आबादी पर नियंत्रण और शहरीकरण पर कंट्रोल तथा उपभोक्तावाद को खत्म करना ही इसका निदान है.

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  • Published: 2 weeks ago on November 10, 2017
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  • Last Modified: November 10, 2017 @ 5:04 pm
  • Filed Under: देश

About the author

मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक “मुखौटों के पीछे – असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष” में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.

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