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एलपीजी पर सबसिडी छोड़ने, घटाने और जीएसटी लगाने का मामला

By   /  November 11, 2017  /  No Comments

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संजय कुमार सिंह।।

सबसे पहले तो सक्षम लोगों से सबसिडी छोड़ने की अपील की गई। लोगों ने छोड़ भी दी। और उसपर जीएसटी लगा दिया गया। इतना ही नहीं, सबसिडी भी कम कर दी गई। एलपीजी पर कुछ राज्यों में 2 से 4 प्रतिशत टैक्स (वैट) लगता था ज्यादातर राज्यों में इसपर टैक्स नहीं था। सक्षम लोगों ने जब आग्रह करने पर सबसिडी छोड़ दी और सबसिडी वाले सिलेंडर गरीब लोगों को दिए दिए ताकि चूल्हे के धुंए में खाना बनाने वाली महिलाओं (माताओं-बहनों) का स्वास्थ्य न खराब हो। तो इसपर टैक्स लगाने का कोई मतलब नहीं था लेकिन एक जुलाई से देशभर में जीएसटी लागू होने के बाद इसपर पांच प्रतिशत जीएसटी लगा दिया गया। वह भी सिर्फ सरकारी कंपनी के मामले में निजी कंपनियों का मामला अलग है। सभी राज्यों में नहीं है – उसपर आगे चर्चा करता हूं।

इकनॉमिक टाइम्स की एक खबर के मुताबिक, जीएसटी लागू होने के बाद इसकी कीमत में 12-15 रुपये की बढ़ोतरी हो गई थी। यह जुलाई की बात है। इससे पहले जून में ही एलपीजी की सब्सिडी में कुछ कटौती की गई थी। उदाहरण के तौर पर, अगर जून तक किसी को 119 रुपए की सब्सिडी मिलती थी तो उसे कम करके 107 रुपए कर दिया गया। यानी सात रुपए प्रति सिलेंडर की कटौती। इसपर 5 प्रतिशत जीएसटी का असर यह हुआ कि जुलाई में सबसिडी वाले सिलेंडर सीधे 30-32 रुपए महंगे हो गए।

इस तरह, महंगाई कम करने वाले जीएसटी ने सबसिडी छोड़ने वाले आम आदमी को आते ही 30-32 रुपए का झटका दिया तो कमर्शियल सिलेंडर पर इसे और ज्यादा होना ही था।

इकनॉमिक टाइम्स के ही मुताबिक, जीएसटी आने से पहले कमर्शियल एलपीजी सिलेंडर में सबसिडी के 69 रुपये तक कम हुए। पर राहत यह मिली कि पहले इसपर 22.5% टैक्स था, जो जीएसटी के 18% स्लैब में रखा गया। इससे कमर्शियल एलपीजी सिलेंडर की कीमत बढ़ी तो पर और बढ़ सकती थी।

दक्षिण भारत के कर्नाटक में सरकारी एलपीजी कंपनियों के साथ निजी कंपनियां भी हैं। निजी कंपनियों को सरकारी कंपनी के मुकाबले ज्यादा टैक्स देना होता है। घरेलू एलपीजी पर सरकारी कंपनियां पांच प्रतिशत जीएसटी के दायरे में हैं जबकि निजी कंपनियां 18% टैक्स के दायरे में हैं। इसका नतीजा यह है कि निजी कंपनियों के ग्राहकों को सरकारी एलपीजी कंपनी के ग्राहकों की तुलना में प्रति सिलेंडर कम से कम 100 रुपए ज्यादा देना होता है। ऐसे में निजी कंपनियों से कोई एलपीजी क्यों खरीदे?

कंफेडरेशन ऑफ इंडियन एलपीजी इंडस्ट्री के संयुक्त सचिव एमजी बालकृष्ण ने कहा, जीएसटी लागू होने के बाद के चार महीनों के दौरान भिन्न सरकारी अधिकारियों को अपना दुखड़ा सुनाया है पर किसी से कोई प्रतिक्रिया नहीं मिली है।

कर्नाटक में घरेलू एलपीजी सिलेंडर की सप्लाई करने वाली कम से कम 10 निजी कंपनियां हैं। एक ही उत्पाद पर दो विक्रेताओं के लिए दो टैक्स दर और वह भी 13 प्रतिशत का अंतर निश्चित रूप से विक्रेताओं के लिए भारी मुश्किलें खड़ी कर रहा है पर कोई सुनने-देखने वाला नहीं है। कहने की जरूरत नहीं है कि निजी एलपीजी कंपनियां ग्राहक खो रही हैं और कुछ कर भी नहीं सकती हैं। कर्नाटक एलपीजी बॉटलर्स एसोसिएशन के प्रेसिडेंट एसएन पार्थनाथ ने कहा, “अब तो यह हमारे अस्तित्व का मुद्दा बन गया है। (100 रुपए प्रति सिलेंडर के अंतर के कारण) आखिरकार लोग सरकारी कंपनियों की ग्राहकी लेंगे जबकि हमारे सैकड़ों वितरकों की आजीविका इसी पर निर्भर है।”

एक निजी बॉटलिंग कपनी के स्वामी नारायण गुप्ता ने कहा कि बेची जाने वाली 90 प्रतिशत एलपीजी घरेलू उपयोग के लिए होती है। ऐसे में सरकार अगर सभी एलपीजी गैस पर जीएसटी की दर पांच प्रतिशत ही रखे तो भी वह जीएसटी लागू होने से पहले की तुलना में बहुत ज्यादा पैसे प्राप्त करेगी। पर उनके पास कोई तरीका नहीं है। उन्हें उम्मीद है कि सरकार उनके मामले में जरूर ध्यान देगी।

उधर आम आदमी के स्वेच्छा से सबसिडी छोड़ने और गरीबों को सबसिडी वाली गैस देने की घोषणा के बाद अब सरकार ने तय किया है कि एलपीजी पर सबसिडी खत्म कर दी जाए। आईओसी ने कहा है कि दिल्ली में 14.2 किलोग्राम के सब्सिडी वाले एलपीजी सिलेंडर का दाम अब 488.68 रुपये होगा। अभी तक यह 487.18 रुपये है। इससे पहले एक सितंबर को एलपीजी की कीमत सात रुपये प्रति सिलेंडर बढ़ाई गई थी। पेट्रोलियम मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने 31 जुलाई को लोकसभा को सूचित किया था कि सरकार ने सार्वजनिक क्षेत्र की पेट्रोलियम कंपनियों को सब्सिडी वाले सिलेंडर का दाम हर महीने चार रुपये बढ़ाने को कहा है। इससे अगले साल मार्च तक सारी सब्सिडी समाप्त की जा सकेगी।

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  • Published: 2 weeks ago on November 11, 2017
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  • Last Modified: November 11, 2017 @ 8:50 am
  • Filed Under: देश

About the author

मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक “मुखौटों के पीछे – असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष” में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.

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