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राजस्थान के पत्रकार सरकार के समक्ष घुटने टेकने पर विवश हैं..

By   /  November 13, 2017  /  No Comments

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-मुकेश चौधरी॥

आज 13 नवंबर 2017 को 11:30 बजे पर प्रस्तावित पत्रकार मार्च स्थगित कर दिया गया है , विभिन्न पत्रकार संगठनों द्वारा रचित मार्च ने मार्च से पूर्व दम तोड़ दिया ; वही डॉक्टरों की सभी मांगे सरकार ने मान ली राजनीतिक – प्रशासनिक अमले ने डॉक्टरों के आगे घुटने टेकते हुए उन्हें काम पर लौटने को राजी कर लिया .

यह पत्रकार मार्च निकालने का विचार कहां से आया… और क्यों आया …और आखिर फिर क्यों रद्द कर दिया… पत्रकार जमात की अनदेखी यथा पत्रकार आवास योजना नायला लंबित…. वरिष्ठ पत्रकार पेंशन लंबित ….अधिस्वीकरण का सरलीकरण लंबित….. मेडिकल पॉलिसी की अवधि 1 माह पूर्व समाप्त फिर भी लंबित ….पत्रकार सुरक्षा कानून अता- पता ही नहीं और सबसे रोचक कि ज्ञापन की फ़ेहरिस्त  में फोटो जनर्लिस्ट – वीडियो जनर्लिस्ट के कीमती कैमरो को कोई स्थान नहीं जो आए दिन कवरेज के दौरान टूटते रहते हैं .

और भी बेहद शर्मनाक हमारे साथी वर्षों से मजीठिया वेज बोर्ड की लड़ाई लड़ रहे हैं अल्प संसाधनों के बावजूद सुप्रीम कोर्ट से जीत चुके हैं और राज्य सरकार से कहा जा चुका है कि पीड़ित पत्रकारों को उनका हक़ दिलाया जाए परंतु बात करना तो दूर ज्ञापन में उनका उल्लेख तक नहीं है .

अरे साथियों क्या ले आए वार्ता से ….मेरे निजी विचार से या तो पत्रकार मार्च का जिन्न बोतल से बाहर निकालना ही नहीं था अगर मजबूरी बस निकालना ही था तो अंजाम तक पहुंचाना लाजमी था.

हरियाणा जैसे छोटे राज्य में भी भाजपा सरकार है वहां पत्रकारों को month vise 10,000 पेंशन मिल रही है… 10 लाख का बीमा है जिसमें फोटो जनर्लिस्ट – वीडियो जनर्लिस्ट भी शामिल हैं …5 लाख कैश लेस मेडिकल पॉलिसी मिल रही है … डिजिटल मीडिया को मान्यता के साथ – साथ विज्ञापन भी दिए जा रहे हैं .
साथियों इतने छोटे से राज्य हरियाणा के पत्रकारों ने अपना हक छीन कर लिया है वही भौगोलिक दृष्टि से देश के सबसे बड़े सूबे राजस्थान के पत्रकार सरकार के समक्ष घुटने टेकने पर विवश है .
हे – राम….

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  • Published: 3 years ago on November 13, 2017
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  • Last Modified: November 13, 2017 @ 12:23 pm
  • Filed Under: मीडिया

About the author

मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.

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