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जीएसटी अधिसूचना से कई शिक्षा संस्थान “व्यवसाय” हो गए..

By   /  November 14, 2017  /  No Comments

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-संजय कुमार सिंह॥

शिक्षा को जीएसटी से बाहर रखा गया है और इस आधार पर शुरू से कहा जाता रहा है कि जीएसटी से शिक्षा महंगी नहीं होगी। पर शिक्षा क्षेत्र को सेवा मुहैया कराने वाले भिन्न क्षेत्र जीएसटी के दायरे में हैं। ऐसे में स्कूल फीस पर भले आपको जीएसटी न लगे पर स्कूल जो सेवाएं लेता है उसपर उसे जीएसटी देना है और अगर वह खर्चे स्कूल फीस से निकालता है तो वह फीस पर अलग से भले ना दिखे या दिखाया जाए – उसमें शामिल जरूर रहेगा। एजुकेशन प्रोमोशन सोसाइटी फॉर इंडिया ने कहा है कि कैम्पस में आउटसोर्स की जाने वाली कई सेवाओं पर जीएसटी लगता है और इसका शिक्षा क्षेत्र पर गंभीर प्रभाव पड़ता है। इन सेवाओं में परिवहन, सुरक्षा, हॉस्टल और मेस की फीस, कैनटीन, प्रशिक्षण, दुकानें और दाखिले से संबंधित सेवाएं शामिल हैं।

एजुकेशन प्रोमोशन सोसाइटी फॉर इंडिया ने इस संबंध में वित्ता मंत्री अरुण जेटली को सौंपे एक ज्ञापन में कहा है कि शिक्षा संस्थाओं द्वारा आउटसोर्स की जाने वाली सेवाओं पर जीएसटी लगना देश में उच्च शिक्षा की गुणवत्ता के लिए हानिकारक रहेगा। ज्ञापन में कहा गया है कि, “उच्च शिक्षा संस्थान आउटसोर्सिंग बंद करने को मजबूर होंगे और खुद ऐसे काम करेंगे जो आखिरकार उच्च गुणवत्ता वाली शिक्षा की उनकी डिलीवरी को प्रभावित करेगा क्योंकि उन्हें शिक्षा मुहैया कराने के अपने मूल मकसद से विचलित होना पड़ेगा।”

राजस्थान प्रदेश कांग्रेस कमेटी के शिक्षक प्रकोष्ठ के प्रदेश अध्यक्ष बाबूलाल जैन ने कहा है कि उच्च शिक्षा और कोचिंग इन्स्टीट्यूट पर 18 फीसदी जीएसटी लागू करने से उच्च शिक्षा प्राप्त करने वाले निम्न एवं मध्यम वर्ग के युवाओं के मंसूबे ध्वस्त हो जाएंगे। 25 वर्ष तक की आयु वर्ग के छात्रों की उच्च अध्ययन क्षेत्र में आसान पहुंच बनी रह सके इसके लिए सरकार को शिक्षा क्षेत्र में जीएसटी लागू करने के अपने निर्णय पर पुनर्विचार करना चाहिए। शिक्षक प्रकोष्ठ के प्रदेश अध्यक्ष ने कहा है कि देश की आधी आबादी 25 वर्ष से कम की है और जनगणना के आंकड़ो के अनुसार 10 फीसदी आबादी ही ग्रेज्यूएट है या इससे अधिक शिक्षित है। ऐसी स्थिति में सरकार को शिक्षा के महत्व को नजरअंदाज नहीं किया जाना चाहिए। 18 फीसदी जीएसटी. का परिणाम सीधे-सीधे फीस वृद्धि के रूप में निकलेगा जो बैकिंग, आईआईटी, प्रशासनिक सेवाओं तथा अन्य प्रतियोगिता परीक्षाओं की तैयारी में लगे निम्न एवं मध्यम वर्गीय छात्रों पर अतिरिक्त दबाव साबित होगा। इसमें कोई शक नहीं है कि प्रतियोगी परीक्षाओं में सफलता दिलाने में कोचिंग इन्स्टीट्यूट की भी भूमिका है।

एक तरफ अगर एनएसडीसी की स्किल डवलपमेन्ट की स्कीम जीएसटी से मुक्त है तो कोचिंग इन्स्टीट्यूट और उच्च शिक्षा को जीएसटी के दायरे में रखा जाना कैसे उचित हो सकता है। नोटबंदी तथा आर्थिक मंदी के चलते शिक्षा पर बढ़े आर्थिक बोझ को कम करने के बजाय जीएसटी और अधिक नकारात्मक प्रभाव डालेगा। बेरोजगारी के इस दौर में जीएसटी की शिक्षा पर दोहरी मार उचित नहीं है। गुणवतापूर्ण उच्च शिक्षा देश के विकास की रीढ़ है, सरकार का इसके साथ व्यवसाय की तरह व्यवहार करना निम्न एवं मध्यमवर्गीय युवाओं के साथ भारी अन्याय है जो असंतोष को भी भड़काएगा।

यह दिलचस्प है कि जीएसटी लागू होने से पहले ज्यादातर अखबार बता रहे थे कि शिक्षा भी जीएसटी के दायरे में होगी और लागू होने के बाद शिक्षा महंगी हो जाएगी। पर जीएसटी लागू होने से पहले की बैठक में स्वास्थ्य और शिक्षा जैसी “प्राइमरी सर्विसेज” (यानी प्राथमिक सेवाओ) को जीएसटी से छूट देने का फैसला लिया गया जबकि सर्विसेज को (5%, 12%, 18% और 28%) टैक्स स्लैब में शामिल करने का फैसला लिया गया। यानी शिक्षा को न्यूनतम पांच प्रकिशत टैक्स से भी मुक्त रखने का फैसला किया गया था।

बाद में जब दूसरी या कोचिंग जैसी शिक्षा को सेवा मान लिया गया तो सवाल उठता है कि जीएसटी अधिसूचना के बाद क्या देश भर के 2600 कॉलेज, विश्वविद्यालय तथा 30 हजार से अधिक अन्य शिक्षा संस्थान क्या किसी व्यवसाय में तब्दील हो गए हैं? केन्द्र सरकार को शिक्षा पर पड़ रहे इस अनावश्यक बोझ को समाप्त करने के विषय में तत्काल पुनर्विचार करना चाहिए।

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  • Published: 1 week ago on November 14, 2017
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  • Last Modified: November 14, 2017 @ 8:53 am
  • Filed Under: शिक्षा

About the author

मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक “मुखौटों के पीछे – असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष” में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.

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