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फ़ारूक़ अब्दुल्ला क्यों कर रहे हैं पाक से गलबहियाँ..

By   /  November 18, 2017  /  No Comments

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-नदीम एस. अख़्तर ॥

खबर है कि जम्मू कश्मीर वाले फारूक अब्दुल्ला धड़ाधड़ पाकिस्तान परस्त बयान दिए जा रहे हैं। इसका कारण है. दरअसल मौजूदा सीएम महबूबा मुफ्ती का चुनाव बाद वादा तोड़कर बीजेपी से हाथ मिलाना और फिर कश्मीर के बिगड़े हालात कश्मीरियों को चुभ रहे हैं। सो उनके इमोशन्स को भुनाने के लिए और फारूक अब्दुल्लाह ने घोड़े खोल दिये हैं। हिंदुस्तान से अदावत और पाकिस्तान से मुहब्बत उनकी इसी राजनीति का खेल है।

वैसे कश्मीर का अगला चुनाव फारूक ही जीत रहे हैं और महबूबा मुफ्ती बुरी तरह हार रही हैं। इसलिए फारूक को पाकिस्तान की झोली से वोट निकालने की ज़रूरत नहीं। महबूबा ने अपने वालिद की मौत के बाद पीडीपी को 360 डिग्री का यूटूर्न देकर जो सिक्सर मारा था और बीजेपी के साथ जिस तरह सरकार बनाई थी, वो कश्मीर घाटी में कभी भी किसी के गले नहीं उतरा।

सो कश्मीर के अगले विधान सभा चुनाव में घाटी में फारूक की पार्टी के लिए पूरा मैदान खाली है और महबूबा की पार्टी का सूपड़ा साफ है। हां, जम्मू में बीजेपी की उपस्थिति जरूर रहेगी, पर कितनी, इस पे बहस हो सकती है।

लब्बोलुबाब ये है कि कश्मीर के हालात और खराब हुए हैं और मौके का फायदा उठाकर अलगाववादियों ने घाटी में कश्मीरियों के अंदर हिंदुस्तान से नफरत की आग को और सुलगाया है. पाकिस्तान को तो जैसे मन मांगी मुराद मिल गई है. दो बिल्लियों की लड़ाई में बंदर का फायदा. बुरहान वानी और पैलेट गन जैसे मामलो ने आग में घी का काम किया है. पाकिस्तान तो पैलेट गन से जुड़ी फर्जी तस्वीर को भारत के खिलाफ राय बनाने के लिए अंतरराषट्रीय मंच तक पर साझा कर चुका है.

हालात खराब हैं और केंद्र सरकार को खुफिया रिपोर्ट में सारी जानकारी है. ऐसे में फारुक अब्दुल्ला का पाकिस्तान परस्त बयान मुझे नहीं चौंकाता. वो सार्वजनकि मंच पर रोने लगते हैं, कभी नाचने लगते हैं, कभी गाने लगते हैं और पता नहीं क्या-क्या करते हैं. रामविलास पासवान की तरह सत्ता के पुजारी हैं. एकदम राजनीतिक मौसम विज्ञानी.

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  • Published: 1 month ago on November 18, 2017
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  • Last Modified: November 18, 2017 @ 8:24 am
  • Filed Under: राजनीति

About the author

मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक “मुखौटों के पीछे – असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष” में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.

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