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वंदे मातरम् को संविधान सभा ने राष्ट्रगीत का दर्जा दिया था..

By   /  November 19, 2017  /  1 Comment

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-गुरदीप सिंह सप्पल॥

दयाल सिंह कालेज का नाम वन्दे मातरम् कालेज करेंगे। क्यों भई? ठीक है कि तुम अभी अभी नींद से जागे हो। ठीक है कि तुम्हारा देशप्रेम नया नया हिल्लोरें मार रहा है, ठीक वैसे ही जैसे कहते हैं कि नया नया मुल्ला ज़ोर ज़ोर से बाँग देता है।

तुम्हें राष्ट्रगीत से अपनी वफ़ादारी साबित करनी है, तो करो। ये क्यों भूल जाते हो कि वन्दे मातरम् को राष्ट्रगीत तुमने नहीं, उस वक़्त की संविधान सभा ने बनाया था। उस सभा में तुम्हारे कितने लोग थे, एक या दो? तुम्हारा तो कोई योगदान था नहीं वन्दे मातरम् को राष्ट्रगीत बनाने में। आज अचानक उठ कर सबको पाठ पढ़ाने चल दिए हो।

वन्दे मातरम् राष्ट्रगीत है। हमारा राष्ट्रगीत है। वो तुम्हारे फ़र्ज़ी महिमामंडन का मोहताज नहीं है। अगर उसके प्रति प्रेम दर्शाना ही तुम्हारी राजनीति है तो वो भी करो, लेकिन सलीक़े से तो करो। कोई नया कॉलेज या यूनिवर्सिटी ही खोल लो और दे दो उसे वन्दे मातरम् नाम। हमें भी बहुत अच्छा लगेगा।

और अगर पुराने नाम ही बदलने में तुम्हारी देश भक्ति का पैमाना सिद्ध होता है, तो फिर सिर्फ़ एक ही नाम क्यों बदल कर संतुष्ट हो गए? फिर तो हर शहर में, हर क़स्बे में कम से कम एक एक कॉलेज का नाम तो बदल दो। और कॉलेज ही क्यों, एक हॉस्पिटल, एक सरकारी बिल्डिंग, एक बस अड्डा, एक मंडी, एक बाज़ार, एक कालोनी, एक मोहल्ला, इन सब का भी नाम वन्दे मातरम् रखो, लगे तो सही कि तुम्हारा प्रेम कुछ ज़ोरदार है। उसकी कशिश राष्ट्र गीत के क़द से मेल तो खाती है। सिर्फ़ एक कॉलेज का नाम बदल कर बलाटाली ठीक नहीं है। ये तो symbolism हुआ, असली प्रेम इसमें नहीं झलकता।

राष्ट्रगीत सम्मानित है, उसे यूँ symbolism में मत गिराओ।

और हाँ, इस पोस्ट पर घटिया भाषा में comment करने से पहले याद रखना कि इसी वन्दे मातरम् में हमारी धरती को ‘सुमधुर भाषिणीम्’ कहा गया है – मधुर भाषा वाली । घटिया भाषा का इस्तेमाल करके ख़ुद को वन्देमातरम् का विरोधी मत घोषित करना।

(लेखक राज्यसभा टीवी के मुख्य कार्यकारी अधिकारी हैं अौर यह प्रतिक्रिया उन्होंने अपनी फ़ेसबुक वॉल पर पोस्ट की है.)

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  • Published: 4 weeks ago on November 19, 2017
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  • Last Modified: November 19, 2017 @ 3:09 pm
  • Filed Under: बहस

About the author

मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक “मुखौटों के पीछे – असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष” में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.

1 Comment

  1. Papinder singh says:

    Good sir

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