Loading...
You are here:  Home  >  दुनियां  >  देश  >  Current Article

डिजिटल इंडिया का नारा और जमीनी वास्तविकता..

By   /  December 11, 2017  /  No Comments

    Print       Email
इस खबर को अपने मित्रों से साझा करें..

संजय कुमार सिंह॥

मोदी सरकार ने सत्ता में आने के बाद अगस्त 2014 में डिजिटल इंडिया का फैसला कर लिया था, करीब एक साल की कथित तैयारी के बाद जुलाई 2015 में इसे धूमधाम से लांच किया गया था। योजना थी कि अगले चार साल में ढाई लाख पंचायत ब्राड बैंड से जोड़ दिए जाएंगे। गांव गांव में ब्राड बैंड का जाल बिछाया जाएगा। पता नहीं इस दिशा में क्या हुआ पर रिलायंस जियो की पेशकश के बाद मान लिया जाए कि सारे देश में ब्रॉडबैंड उपलब्ध है और वाई फाई सांय-सांय चल रहा है। पर इसके साथ तथ्य यह भी है कि देश में 37 फीसदी लोग पढ़े-लिखे नहीं हैं।

रिलायंस जियो और 4जी के बावजूद देश में सबके पास स्मार्ट फोन नहीं है, कंप्यूटर तो बहुत दूर। दूसरी ओर, डिजिटल लेन-देन के लिए एक अदद बैंक खाता होना चाहिए और खाता खोलने के लिए आदमी को थोड़ा पढ़ा-लिखा और समझदार होने के साथ उसके पास हजार से लेकर 10,000 रुपए नकद होने चाहिए। बैंक में खाता खोलने के लिए फॉर्म भरने से लेकर आवास प्रमाणपत्र, पहचान पत्र और सरकारी बैंकों में पहचानकर्ता की आवश्यकता होती है। इसके बावजूद कितने लोग खाता खोल पाएंगे और खोल लें तो चला पाएंगे यह अपने आप में स्पष्ट नहीं है। फिर भी सरकार डिजिटल लेन-देन को बढ़ावा देने की बात करती है।

इसके बावजूद, 21 साल से तीन बैंकों में चल चुका और चल रहा मेरा चालू खाता ब्लॉक कर दिया गया है। कारण यह है कि मेरी फर्म या एंटाइटी के होने का सबूत चाहिए (बैंक इसे खुद नहीं देखेगा उसे किसी सरकारी विभाग में पंजीकरण का प्रमाणपत्र चाहिए)। बैंक ने इसके लिए 12 और आठ दस्तावेजों के दो समूह में से एक-एक दस्तावेज मांगे हैं जो मेरे पास नहीं हैं क्योंकि मुझे इनकी जरूरत नहीं है। जो दस्तावेज मेरे पास हैं उन्हें बैंक नहीं मानता। इसलिए खाता ब्लॉक है। मेरी चिन्ता अपने खाते को लेकर नहीं है। मैं यह जानना चाहता हूं कि ऐसी हालत में गांव-गांव के डिजिटल कैसे हुए जा रहे हैं जबकि स्मार्ट फोन और स्वाइप मशीन रखना मुझे भी (मेरी कमाई और खर्चों के कारण) महंगा लगता है। और सरकार इन बुनियादी चीजों पर भी कोई छूट, सुविधा या कर्ज नहीं देती है।

निजी तौर पर मैंने महसूस किया है कि सरकार भले डिजिटल लेन-देन को बढ़ावा देने की बात करे पर स्थितियां नकद लेन-देन वाली हैं और डिजिटल लेन-देन के लिए मुश्किल हो रही हैं। इसके बावजूद पिछले साल जब नोटबंदी की घोषणा की गई तो अचानक कहा गया कि लोग डिजिटल लेन-देन करें। नकद से बचें। हालांकि बिना तैयारी के डिजिटल लेन-देन नहीं हो सकता है पर जो कर सकते हैं उनलोगों ने किया पर जो नहीं कर सकते थे वो परेशान हुए। सरकार को इसकी कितनी जानकारी है राम जाने पर सरकार को इससे मतलब नहीं रहा। उल्टे सरकार और उसके प्रचारकों ने गोदी मीडिया के जरिए यह फैलाना शुरू किया कि फलां गांव कैशलेस हो गया तो फलां गांव पहले से कैशलेस था और किसी को कोई परेशानी नहीं हुई। हालत यह थी कि नोटबंदी के दौरान यह अपेक्षा भी की जा रही थी कि सब्जी वाले क्रेडिट डेबिट कार्ड से पैसे लेंगे और भिखारी भी स्वाइप मशीन रखते हैं। आइए, कुछ पुरानी खबरें याद करें।

नवभारत टाइम्स की एक खबर के मुताबिक, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने आठ नवंबर (2016) को जब 500 और 1000 रुपये के पुराने नोटों को बंद किए जाने का एलान किया तो पूरे देश में कैश की मारामारी के हालात पैदा हो गए। महानगरों से लेकर गांवों तक 100 और उससे कम की करंसी के लिए लोग परेशान दिखे क्योंकि कुछ भी खरीदने के लिए इनकी जरूरत थी। लेकिन, देश के पहले डिजिटल गांव गुजरात के साबरकांठा जिले के अकोदरा में इसे लेकर कोई परेशान नहीं था। अहमदाबाद से 90 किलोमीटर दूर बसे इस गांव के हर शख्स के पास रूपे डेबिट कार्ड है। सब्जी खरीदने के लिए भी गांव के लोग मोबाइल बैंकिंग या कार्ड का इस्तेमाल करते हैं। खास बात यह है कि यह सुविधा इन लोगों को उनकी मातृभाषा गुजराती में उपलब्ध है।

13 दिसंबर 2016 के दैनिक जागरण की एक खबर के मुताबिक, ई-वॉलेट से डिजिटल हुआ कानपुर का पचोर गांव। इसमें कहा गया है, कानपुर के ग्रामीण अंचल से जुड़े चौबेपुर ब्लाक का पचोर गांव नोटबंदी के बाद डिजिटल बनकर जागरूकता की मिसाल पेश कर रहा है। गांव वाले रोजमर्रा की खरीदारी ई-वॉलेट व पेटीएम से कर अपने गांव को कैशलेस बना रहे हैं। यहां दवा से लेकर जनरल स्टोर तक ई-मनी से जुड़ चुके हैं। गांव की दवा दुकान हो या फिर जनरल स्टोर सब जगह ई-मनी का चलन शुरू हो चुका है। 7 फरवरी 2017 को दैनिक जागरण में ही खबर छपी थी, डिजिटल हुआ सुरखपुर, अब दूसरे गांव की बारी नोटबंदी के तीन माह पूरा होने से पहले ही (दिल्ली के पास) नजफगढ़ तहसील के सुरखपुर गांव को कैशलेस घोषित कर दिया गया। प्रशासन की कड़ी मेहनत के बाद गांव ने डिजिटल इंडिया की दिशा में पुख्ता कदम बढ़ा दिया है।

15 अक्तूबर 2017 को आजन्यूजइंडिया डॉट कॉम ने खबर दी थी, डिजिटल इंडिया हुआ फुस्स, देश का दूसरा गांव अब नहीं रहा कैशलेस। इसके मुताबिक, करीब 10 महीने पहले ही हैदराबाद से करीब 125 किमी दूर स्थित इब्राहिमपुर गांव के कैशलेस होने की घोषणा की गई थी। गांव के लोगों ने डिजिटल ट्रांजेकशन सीखने के लिए रात-रातभर गणित लगाई लेकिन व्यवस्था में कमी के चलते गांव में कार्ड से पेमेंट पूरी तरह फेल हो चुका है। दुकानदारों ने अपनी मशीनें भी बैंक में वापस कर दी हैं। मोदी के डिजिटल ड्रीम सिंबल रहे इस गांव ने अब दोबारा रुपये से लेन-देन की राह पकड़ ली है। कहने की जरूरत नहीं है कि बहुत से गांवों के कैशलेस होने का प्रचार किया गया था पर वो वापस नकद लेन-देन कर रहे हैं। पर सरकार गुजरात जीतने में व्यस्त है।

Facebook Comments

इस खबर को अपने मित्रों से साझा करें..
    Print       Email
  • Published: 7 months ago on December 11, 2017
  • By:
  • Last Modified: December 11, 2017 @ 11:58 am
  • Filed Under: देश

About the author

मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.

पाठक चाहे आलेखों से सहमत हों या असहमत, किसी भी लेख पर टिप्पणी करने को स्वतंत्र हैं. हम उन टिप्पणियों को बिना किसी भेद-भाव के निडरता से प्रकाशित भी करते हैं चाहे वह हमारी आलोचना ही क्यों न हो. आपसे अनुरोध है कि टिप्पणियों की भाषा संयत एवं शालीन रखें - मॉडरेटर

This site uses Akismet to reduce spam. Learn how your comment data is processed.

You might also like...

पुलिस में महिलाओं का कम होना अखिल भारतीय समस्या

Read More →
Page Reader Press Enter to Read Page Content Out Loud Press Enter to Pause or Restart Reading Page Content Out Loud Press Enter to Stop Reading Page Content Out Loud Screen Reader Support
%d bloggers like this: