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सुप्रीम कोर्ट को आख़िर आपत्ति क्यों.?

By   /  December 16, 2017  /  No Comments

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-ओम थानवी॥

भाजपा जीतेगी, सब एग्ज़िट पोल कहते हैं। सही ही होगा। मरज़ी माफ़िक़ चुनाव का समय ख़ुद तय करने की सुविधा पाकर, अरबों की चुनावकालीन ख़ैरात और इतना हिंदू-मुसलमान, भारत-पाक, रफ़ीक-पटेल, ऊँच-नीच, रोरो-फ़ैरी, सी-प्लेन के चमत्कारों के बाद भी भाजपा न जीते तो हैरानी होगी।

लेकिन सर्वोच्च अदालत को मतों की पर्चियाँ गिनवाने पर आपत्ति क्यों है? मशीन से मतदान हो मगर साथ में मत की पर्ची का छपा रेकार्ड रखने की व्यवस्था इसीलिए की गई थी कि कुछ लोग मशीन में गोलमाल की गुंजाइश देखते हैं।

ऐसे में चुनाव को हर तरह के झूठे-सच्चे संशय से दूर रखने की ग़रज़ से मशीन के साथ पर्चियों की गिनती करवा लेने में हर्ज़ क्या था? मशीन में चार वोट, उसकी चार ही पर्चियाँ। न शक, झगड़ा, न टंटा! पर्ची है, पर गिनेंगे नहीं। तो शंकाएँ तो वहीं की वहीं रहेंगी न? हारा हुआ भी कहेगा मैं तो जीत रहा था! जिस शंका को प्रमाण से निर्मूल किया जा सकता है, मतगणना में नहीं करेंगे तो कब करेंगे?

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  • Published: 6 months ago on December 16, 2017
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  • Last Modified: December 16, 2017 @ 11:50 am
  • Filed Under: बहस

About the author

मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.

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