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शुक्र है लौटा सिनेमा सऊदिया में..

By   /  December 19, 2017  /  No Comments

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-विष्णु खरे॥

अपने भारत महान में यह कल्पना कोई दूर की कौड़ी नहीं कि घर में भले ही किसी शाम दिया-बत्ती न हो,चूल्हा न जले,लेकिन पिक्चर देखने ज़रूर जाएँगे.टिकट न मिलने पर कुनबे में मातम छा जाता है,मियाँ-बीवी में सुबह तक बोलचाल बंद रहती है,दोस्तों में झूमा-झटकी हो जाती है.यह तो सोचा ही नहीं जा सकता कि किसी सामान्य दिन देश के सारे सिनेमा जबरन बंद हों और टीवी पर भी कोई फ़िल्म न आए.नरक और किसे कहेंगे ?
सऊदी अरब कितना ख़ुशनसीब है कि वह हिंदुस्तान नहीं है वरना जिस तरह पिछले पैंतीस बरसों से वहाँ के जितने-जैसे सिनेमाघर बंद पड़े थे उन्हें (न) देखते हुए तो हमारे-जैसे दक्षिणी एशियाई दर्शक वहाँ सैल्यूलॉइड क्रांति कभी की नाज़िल कर चुके होते.हम सभी जानते है कि सऊदी अरब पैग़म्बर मुहम्मद और इस्लाम की जन्मभूमि है और पवित्रतम मुस्लिम तीर्थ मक्का-मदीना वहीँ हैं. वह अरबो-इस्लामी आस्था,सभ्यता,इतिहास और संस्कृति का विश्व-केंद्र है.मुक़द्दस क़ुरान और हदीस की हिदायतों को पूरी जागरूक पारम्परीण सख्ती से समूचे निजी और सार्वजनिक जीवन में शब्दशः लागू करने के लिए ज़िम्मेदार आधिकारिक सुन्नी वहाबी संप्रदाय ने एक राजनीतिक उलट-फेर के अंतर्गत 1982 में दूसरी चीज़ों के अलावा सार्वजनिक फिल्मों पर भी उन्हें इस्लाम-विरोधी क़रार देकर रोक लगवा दी थी.एकाध विरल अपवाद को छोड़कर सिनेमा मुल्क से नेस्तनाबूद-जैसा हो गया.
लेकिन वक़्त आने पर हर शय का एक मसीहा औतार लेता है.ग़ैर-ज़रूरी और कठिन ब्यौरों में न जाते हुए यही बताया जा सकता है कि पिछले दिनों 83 वर्षीय सऊदी शाहंशाह सलमान बिन अब्दुलअज़ीज़ अल सऊद ने अपने 57 वर्षीय भतीजे मुहम्मद बिन नाएफ़ को सर्वोच्च दूसरे ओहदे से हटा दिया और अपने सबसे बड़े जीवित बेटे मुहम्मद बिन सलमान को ‘’वली अहद’’ घोषित कर के उसे अपने बाद सबसे ज़्यादा अधिकार सौंप दिए.युवराज सलमान अभी सिर्फ़ 32 वर्ष के हैं लेकिन उनके पिता ने उन्हें प्रथम उप-प्रधानमंत्री,आर्थिक और विकास मामलात परिषद् अध्यक्ष तथा रक्षा मंत्री नामजद किया है.वह विश्व में अपने जैसे ओहदे के युवतम अधिकारी हैं.किन्तु सबसे महत्वपूर्ण यह है वह अरब देशों में और प्रबुद्ध विश्व में आधुनिक सोच,रुझान और योजनाओं के नौजवान नेता और प्रणेता के रूप में देखे जा रहे हैं.उन्होंने ‘’संकल्पना 2030’’ (‘’Vision 2030’’) नामक एक महत्वाकांक्षी योजना बनाई है जिसके ज़रिये वह अपने देश और पूरे इस्लामी संसार के सम्पूर्ण आर्थिक,सामाजिक,राजनीतिक और सांस्कृतिक पुनर्जागरण का सपना देख रहे हैं.
सऊदी अरब में फ़िल्म और सिनेमा की पुनर्प्रतिष्ठा उनके इसी स्वप्न का हिस्सा है.वली अहद सलमान की शिक्षा-दीक्षा पश्चिम में नहीं,अपने ही वतन में हुई है.जब 1982 में उनके मुल्क में सिनेमा पर प्रतिबन्ध लगाया गया था तब वह ज़्यादा-से-ज़्यादा दुधमुंहे बच्चे रहे होंगे.उन्होंने फ़िल्म देखना कब-कहाँ शुरू किया,कैसी-कितनी फ़िल्में वह अब तक देख चुके हैं ,वह और उनकी राजकुमारी पत्नी अब भी सिनेमा देखते हैं या नहीं,क्या महल में कोई सिनेमाघर है – यह हम नहीं जानते.लेकिन हमारे पास हमारे लिए यह बहुत मानीखेज़ जानकारी है कि वह सऊदी अरब से ज़लावतन किए गए सिने-विश्व को लौटा ले आना चाहते हैं.
पिछले तीस वर्षों में दुनिया बहुत ज़्यादा बदली है और उसके साथ फ़िल्में भी.यह बदलाव रुकने वाला नहीं है.मनोरंजन के साथ-साथ सिनेमा लगातार एक बड़ी सामाजिक,राजनीतिक,आर्थिक और सांस्कृतिक ताक़त बनता जा रहा है. वह प्रतिष्ठा देता है.सऊदी शहज़ादे ने इसे पहचान लिया है.जो देश,सरकार,जाति,समाज,सेंसर या दीन-धर्म फ़िल्मों पर रोक लगाते हैं या उनके अभिनेता-निर्माता-निर्देशकों पर अन्याय और ज़ुल्म करते हैं,वह आज प्रबुद्ध विश्व में उचित ही जाहिल,अमानवीय और फाशिस्ट कहलाते हैं.यह इधर के भारत में तो हो ही रहा है,अरब देशों में कुछ ज़्यादा ही चलन में है.
दकियानूसियत हिन्दू हो या मुसलमान या किसी और धर्म या विचार की ,वह सभी इंसानी कद्रों की दुश्मन होती है.वली अहद सलमान का रास्ता शायद आसान न हो.सऊदी अरब में ही उनके कई विरोधी हो सकते है – ख़ुद उनके राजवंश में और कई तरह की कट्टरपंथी इस्लामी संस्थाओं के भेस में.इन प्रतिक्रियावादियों को बखूबी पता है कि सिनेमा को आज़ाद करना इतना मासूम नहीं है.फ़िल्में अपने साथ अश्लीलता या नंगापन ही नहीं लातीं,वह अपने साथ विचार लेकर भी लाती हैं जिनसे आदमी के दिलोदिमाग बदलते है,पूरा समाज बदलता है,ज़लज़ले आते हैं,क्रांतियाँ होती हैं.बेशक़ सऊदी अरब में दिखाए जाने वाले सिनेमा पर भी सेंसर लगेगा,फ़िल्में रोकी जाएँगी,विवाद होंगे.महिलाएँ पुरुषों से अलग फ़िल्में देखेंगी.हो सकता है कुछ फ़िल्में उन्हें सिनेमाघर में न देखने दी जाएँ.लेकिन इस सारी जद्दोजहद का बिस्मिल्लाह तो हो.
भारत के लिए यह एक सुनहरी मौक़ा है.अरब मुल्कों और हिंदुस्तान के बीच सदियों से सामाजिक-सांस्कृतिक समानताएँ चली आती हैं.हमारी फ़िल्में जबसे बनना शुरू हुई हैं मध्य-पूर्व में लोकप्रिय हैं.करोड़ों दर्शक दशकों से हमारे हीरो-हीरोइनों पर फ़िदा हैं.भारतीय फ़िल्म संगीत तो पुश्तों से अरबी ज़ुबानों पर है.हमारे संगीतकारों ने भी वहाँ से काफी-कुछ लिया है.यह विरसा मार्च 2018 से हमारी सऊदी पूँजी बनेगा.
अधिक महत्वपूर्ण यह है नए सऊदी सिनेमा को उसके पैरों पर खड़ा करने और बाद में उसे उसकी अस्मिता देने में भारतीय सिने-उद्योग,हमारे निर्माता-निदेशक और सभी तरह के तकनीकी जानकार,यहाँ तक कि स्पॉट-बॉय भी,सऊदी सिनेमा को काफ़ी प्रारंभिक सहारा और समर्थन दे सकते हैं.अभी ढाई करोड़ सऊदी दर्शकों के लिए 30,000 सीटों वाले सिनेमाघर और मल्टिप्लेक्स चाहिए.उनमें से कुछ हम क्यों नहीं बना सकते ? रियाद और जेद्दा हिंदुस्तान के किसी भी कोने से दूर नहीं हैं.रोज़ दसियों फ्लाइट हैं.लाखों भारतीय मिडिल ईस्ट में बरसों से अपने काम से नाम और दाम कमा ही रहे हैं.हाँ,यह आशंका ज़रूर है फ़िल्म का इतना बड़ा और अछूता बाज़ार देखकर ख़ुद को अरबों का जिगरी दोस्त कहने वाला हॉलीवुडी अमरीका भी उसमें कूद पड़ेगा – वह हरकत चालू भी हो चुकी है – और यूरोप का कुछ ग़रीब सिनेमा भी पीछे नहीं रहेगा.स्मृति ईरानी को नरेन्द्र मोदी से मिलकर सारे भारत के फ़िल्म-उद्योग की मदद से तुरंत एक सऊदी-सिने नीति तैयार करनी चाहिए जो अंततः एक दूरगामी सांस्कृतिक और आर्थिक पहल सिद्ध होगी.सच तो यह है कि सारी भारतीय फ़िल्म इंडस्ट्री को मिनिस्टर ईरानी और प्राइम-मिनिस्टर मोदी के ज़ेरे-साया वली अहद सलमान को सपरिवार हिंदुस्तान आने का दावतनामा फ़ौरन से पेश्तर भेज देना चाहिए.भारत को इस कल्पनाशील,साहसी,आधुनिक युवा वली अहद को सारा समर्थन देना चाहिए.यदि उसका चिंतन,कार्यविधि और रणनीति सऊदी अरब में सफल हुए तो उनसे विश्व में बहुत कुछ ऐसा बदलेगा जिसकी अभी कल्पना भी कठिन है.यह सही है कि सऊदी अरब और उसके सभी वर्तमान शासकों की सख्त आलोचना भी होती है लेकिन अगर सिनेमा के बहाने संसार बदलने की धुँधली संभावना भी दिखने लगे तो सऊदी अरब के इस भावी शहंशाह को पूरा मौक़ा दिया जाना चाहिए.कुछ नहीं तो अरबी-इस्लामी तहज़ीब पर वह नायाब देखना नसीब होगा जिससे अब तक दुनिया महरूम चली आती थी.

सौजन्य: आरम्भ

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  • Published: 2 years ago on December 19, 2017
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  • Last Modified: December 19, 2017 @ 8:12 am
  • Filed Under: मनोरंजन

About the author

मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.

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