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संक्रमणकाल से गुजरता देश..

By   /  December 21, 2017  /  No Comments

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-अरुण झा॥

दुनिया का कोई भी देश हो, उस देश की जनता हमेशा उस शासक की गुलाम ही होती है। शासन और शासक के नाम तरह-तरह के हो सकते हैं। कुछ लुभावने, तो कुछ डरावने भी। जैसे, लोकतंत्र, राजतंत्र, जंगलतंत्र, गुण्डातंत्र, तानाशाही-तंत्र आदि-आदि। इतिहास गवाह है राजतंत्र में राजा-महाराजा आपस में अपने ऐश्वर्य, शोहरत और वर्चस्व की खातिर कभी अपने ही परिवार तो कभी अपने  ही समाज के साथ लड़ते-मरते रहे हैं। छोटी-छोटीे रियासतों और कुनबों के लिए भी लड़ते-झगड़ते रहे हैं। इस लड़ाई में हमेशा जन-धन  की भारी क्षति होती रही है। उपनिवेशवाद और साम्राज्यवाद के कारण कितनी सभ्यताएँ उत्पन्न हुईं, वो सब हम जानते हैं। भले ही वे सब अब काल के गाल में समा चुकी हैं।

वर्चस्व के लिए लड़ने वाले समय-समय पर अपनी ताकत और जीत से बढ़े हुए मनोबल के कारण राज्य-विस्तार भी करते रहे हैं, लेकिन राष्ट्रधर्म  की भावना किन्हीं लड़ाकुओं के मन में कभी नहीं रही। उनमें जनता के हितों की सोच नहीं रही। वे निहायत व्यक्तिवादी ही रहे। इतिहास साक्षी है, नाम नहीं लूँगा उनका, उन शूरवीरों का, जिनके तथाकथित शौर्य-तो-शौर्य, उनकी कायरता को भी कुछ गुलाम मानसिकता वाले अतिवादियों न महिमामंडित किया और आज भी उनकी गाथाओं को गाने के लिए मजबूर कर रहे हैं। जो लोग अपने लिए मरे और अपने लिए जिए, उनको महिमा मंडित करना सामाजिक अपराध् है। लेकिन अपवाद स्वरूप कुछ वीर सपूतों और वीरांगानाओं ने देश और समाज की भलाई के लिए अपना सर्वस्व न्यौछावर भी किया है। मगर दुर्भाग्य और शर्मनाक है कि उनका आज कोई नामलेवा भी नहीं है।

आजादी की लड़ाई में जिन संस्थाओं और व्यक्तियों ने दुश्मनों के साथ मिल कर देश के साथ गद्दारी की, उन्हीं अतिवादी व्यक्ति और संस्थाओं के कारण फिलवक्त देश दहशत में है, और डरा हुआ है।

कालक्रम में भारत देश में भी भारी उथल-पुथल होती रही है। मौर्यकाल काल के पूर्व और पश्चात जो भी शासन व्यवस्था बनी, उस दौरान सभी ताकतवर आतताइयों ने अपने-अपने तरीके से लूट-खसोट और अपना वर्चस्व कायम करने के लिए जनता को गुलाम बनाया। ऐसे तमाम लोग जनता का भरपूर शोषण कर अपनी राजशाही चलाते रहे। इन सब के पास तरह-तरह के हथकंडे होते थे, जिस कारण बेचारी जनता हमेशा बेचारगी की चक्की में पीसती रही। दुर्भाग्य की बात है कि आज भी पिस रही है।

कहने को तो हम आजाद हो गये हैं लेकिन वस्तुतः हम आजाद नहीं हो पाये हैं। मुगलिया और ब्रिटिश व्यवस्था के अंश अभी भी हमारी शासन व्यवस्था का हिस्सा बनी हुई है। अदालती क्रियाकलापों में लेश मात्र का संशोधन तो दिखता है, बाकी काम पुराने ढर्रे पर ही चल रहा है। आजादी के स्वाद उन्हीं लोगों को पता है जो व्यवस्था को चला रहे हैं।

सत्ता के हस्तांतरण को आजादी मानने वाली भारतीय जनता भय, अनिश्चितता और मजबूरीवश अब राजनीतिक पार्टियों और पार्टी के आकाओं की मानसिक गुलामी में लग गई है। वोट तंत्र की व्यवस्था तो राजशाही को भी पीछे छोड़ चुकी है।

ब्रिटिश काल में अंग्रेज लोग भारतीयों की मानसिकता को समझते हुए ‘फुट डालो और राज करो’ के सिद्धान्त को अपना हथियार बना कर   भारत पर कब्जा कर चुके थे और कुछ भारतवंशी तथाकथित वीर सपूत अंग्रेजों की गुलामी करने में अग्रणी भूमिका निभाते देखे गए। वैसी ही स्थिति अब भी कायम है बल्कि अब उससे भी ज्यादा खतरनाक और शर्मशार सिद्धान्त उन्होंने गढ़ लिया गया है- नफरत, वैमनस्यता और फिरकापरस्ती की राजनीति का।

देश में मौजूद गंदी राजनीति देश को पुनः गुलामी की ओर ढकलने की व्यवस्था में जुट गई है। गंदी सोच की राजनीति लोकतंत्र को घालय करने लग गई है। वह दिन दूर नहीं जब लोकतंत्र बुरी तरह नफरत, फिरकापरस्त, वैमनस्यता की राजनीति की आग में भस्मीभूत हो जाने वाला है। वर्तमान लोकतंत्र से जनता का विश्वास उठने लगा है। अंतरराष्ट्रीय संस्था के सर्वे में भारत का लोकतंत्र नौवें स्थान पर आ गया है। ऐसी स्थिति में भारत के वर्तमान व्यवस्थापकों को शर्म से डूब मरना चाहिये।

जातिभेद, नस्लभेद धर्मभेद की राजनीति के कारण नागरिक व्यवस्था पूरी तरह चरमरा गई है। पार्टियाँ भी एक दूसरे पर कीचड़ उछालने की गंदी मानसिकता के कारण अनिश्चतता के दौर से गुजर रही है, जिस वजह से उनमें बुरी और अच्छी बातों का अंतर समाप्त हो गया है। देश की व्यवस्था के शीर्ष पर बैठे लोग आत्ममुग्धा के शिकार हो गए हैं। जनता के हित की जगह वे अपने मान-अपमान की चिंता में डूबे नजर आने लगे हैं। प्रतिद्वंद्वी पार्टी को कैसे नीचा दिखाया जाए, इसके लिये गाली का कौन-सा शब्द अच्छा होगा, उसे खोज-खोज कर एक दूसरे पर प्रहार करने में लग गए हैं। उनके भाषणों का स्तर निम्न-से-निम्नतम स्तर पर आ गया है।

शासन व्यवस्था कैसी हो, इस के लिए वर्तमान व्यवस्था बिना सोच-विचार और तैयारी के नकलची योजनाओं को जनता पर थोप-डालती है। जिसका खामियाजा देश की 95 प्रतिशत जनता भोगती है। गाँव-गिराम में एक पुरानी कहावत प्रचलित है- ‘‘खस्सी की जान जाये, खवैया के स्वाद।’’ ठीक इसी तरह जनता की हाड़तोड़ मेहनत की कमाई को विकास के नाम पर सरकार और सरकार के नुमाइन्दे हड़प कर जाते हैं। बड़े-बड़े पूंजीपति और सत्ता के दलाल व्यवस्था में घुसपैठिये के रूप में शामिल हैं। उन्हीं के इशारे पर आंशिक रूप से देश की शासन व्यवस्था चल रही है। कानून और पुलिस व्यवस्था तो जंगल राज्य से भी बदतर हो चली है। थानेदार जमींदार की भूमिका में आ गये हैं। इनके छोटे अधिकारियों में  नैतिकता नाम की कोई चीज नहीं रह गई है। जिस कारण अधिकांश अधिकरियो का चरित्र गुण्डों और मवाली से भी ज्यादा भ्रष्ट हो चुका है।  वही स्थिति कुछ लालची और कर्तव्यच्युत हुए लोगों के कारण निचली अदालतों की हो गयी है। नागरिक सुविधओं के महकमे तो सेठ-साहूकारों की भूमिका अदा करने में जुट गए हैं। राजनीति के छुटभैये नेता और उनके आका करोड़पति और अरबपति बनने की होड़ में लग गये हैं।

देश की गरीब जनता में हाहाकार और दहशत है। 98 प्रतिशत कारपोरेट मीडिया अपनी सल्तनत बचाने के लिए सत्ता की दलाली में लगी हुई है। वर्तमात व्यवस्था से जनता भयभीत, आशंकित और अनिश्चितता में जी रही है। इसी कारण इन व्यवस्थाओं से लोगों का विश्वास अब पूरी तरह चरमराने लगा है। देश में ‘जिसकी लाठी उसकी भैंस’ की व्यवथा उत्पन्न होती प्रतीत हो रही हैै। इस आसन्न संकट से कौन मसीहा देश को संभालेगा, यह एक प्रश्न सुरसा की तरह मुँह बाये खड़ा है।

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  • Published: 2 years ago on December 21, 2017
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  • Last Modified: December 21, 2017 @ 10:50 pm
  • Filed Under: देश

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