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आधार में लगी सेंध, महज़ 500 रूपये और 10 मिनट में एक अरब से ज्यादा लोगों के आधार का ब्यौरा होगा

By   /  January 4, 2018  /  No Comments

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-रचना खैरा॥

अभी पिछले नवंबर में ही यूआईडीएआई ने जोर देकर कहा था कि “आधार डाटा पूरी तरह सुरक्षित है और यूआईडीएआई में कोई डाटा लीक या गड़बड़ी नहीं हुई है।” आज दि ट्रिब्यून ने एक ऐसी सेवा “खरीदी” जिसकी पेशकश अनाम विक्रेता व्हाट्सऐप्प पर करते रहते हैं। इसके तहत भारत में अभी तक बने एक अरब से ज्यादा आधार कार्ड में से किसी का भी विवरण निर्बाध रूप से ऐक्सेस किया जा सकता

सिर्फ 500 रुपए जो पेटीएम के जरिए दिए गए और 10 मिनट में एक रैकेट चलाने वाले समूह के एक “एजेंट” ने इस संवाददाता के लिए “गेटवे” बना दिया और एक लॉगइन आईडी तथा पासवर्ड मिल गया। बस इससे आप पोर्टल पर कोई भी आधार नंबर डालिए और तुरंत उस व्यक्ति के तमाम विवरण प्राप्त कर लीजिए जो उसने यूआईडीएआई (यूनिक आईडेंटिफिकेशन अथॉरिटी ऑफ इंडिया) को दिया है। इसमें नाम, पता, पोस्टल कोड (पिन), फोटो, फोन नंबर और ईमेल सब शामिल है।

यही नहीं, ट्रिब्यून टीम ने 300 रुपए और दिए तो इसके बदलने में एजेंट ने वह “सॉफ्टवेयर” मुहैया कराया जिससे आधार कार्ड की छपाई संभव हो सकती है। इसके लिए सिर्फ किसी व्यक्ति का आधार नंबर डालना है। संपर्क किए जाने पर चंडीगढ़ में यूआईडीएआई के अधिकारी इस तरह डाटा ऐक्सेस किए जाने पर चकित थे औऱ माना कि यह सुरक्षा भेदने की यह एक अहम राष्ट्रीय घटना लगती है। इनलोगों ने तत्काल इस मुद्दे पर बेंगलुरु में यूआईडीएआई की तकनीकी टीम से इस बारे में चर्चा की।

चंडीगढ़ में यूआईडीएआई क्षेत्रीय केंद्र के एडिशनल डायरेक्टर जनरल संजय जिन्दल ने स्वीकार किया कि यह एक चूक है और ट्रिब्यून से कहा, “डायरेक्टर जनरल और मुझे छोड़कर पंजाब में कोई भी तीसरा व्यक्ति हमारे आधिकारिक पोर्टल का लॉग इन ऐक्सस नहीं रख सकता है। किसी और का ऐक्सेस होना अवैध है और यह एक बड़ी राष्ट्रीय सुरक्षा चूक है।”

एक लाख अवैध उपयोगकर्ता

दि ट्रिब्यून अख़बार की जांच में यह खुलासा हुआ है इस रैकेट की शुरुआत छह महीने पहले हुई होगी जब व्हाट्सऐप्प पर कुछ अनाम समूह बनाए गए थे। इन समूहों ने तीन लाख से ऊपर गांव स्तर के एंटरप्राइज ऑपरेटर को लक्ष्य किया था जिन्हें इलेक्ट्रॉनिक्स और सूचना तकनालाजी मंत्रालय ने देश भर में कॉमन सर्विस सेंटर स्कीम (सीएससीएस) के तहत काम पर रखा था और उन्हें यूआईडीएआई डाटा तक पहुंच की पेशकश की गई थी।

सीएससीएस ऑपरेटर को शुरू में देश भर में आधार कार्ड बनाने का काम सौंपा गया था। बाद में यह काम उनसे ले लिया गया तो वे बेकार हो गए थे। गए साल नवंबर में यह सेवा डाक घरों और निर्धारित बैंकों तक सीमित कर दी गई थी ताकि सुरक्षा के लिहाज से किसी खतरे से बचा जा सके।

एक लाख से ज्यादा वीएलई ने इसे शीघ्र पैसे कमाने का मौका माना और अब शक है कि इनलोगों ने यूआईडीएआई डाटा को अवैध रूप से ऐक्सेस कर लिया है ताकि आम आदमी को कुछ पैसे लेकर आधार कार्ड छपवाने से लेकर “आधार सेवाएं” मुहैया कराई जा सकें। हालांकि गलत हाथों में होने पर यह ऐक्सेस डाटा के भारी दुरुपयोग का मौका मुहैया करा सकता है।

ऐसा लगता है कि हैकर्स ने राजस्थान सरकार के वेबसाइट तक पहुंच बना ली है क्योंकि प्राप्त “सॉफ्टवेयर” से “aadhaar.rajasthan.gov.in” को ऐक्सेस किया जा सकता है। इसके जरिए आप किसी भी भारतीय नागरिक के आधार कार्ड को ऐक्सेस करके प्रिंट कर सकते हैं।

हालांकि, इस बात की पुष्टि नहीं हो सकी कि वह पोर्टल राजस्थान का ही था या सिर्फ भ्रमित करने के लिए ऐसा लिखा हुआ था।

संजय जिन्दल ने कहा कि इन सब बातों की पुष्टि यूआईडीएआई द्वारा तकनीकी जांच किए जाने से ही हो सकती है।

निजता जोखिम में
सिटिजन्स फोरम फॉर सिविल लिबर्टीज के नई दिल्ली आधार वाले संयोजक गोपाल कृष्णन ने कहा, “आधार डाटा के लीकेज से इस बात का खुलासा हो चुका है कि परियोजना गोपनीयता जांच में नाकाम रही है। हाल में संपन्न 11वें डब्ल्यूटीओ मिनिस्ट्रीयल कांफ्रेंस में भारत ने ई कामर्स पर अपनी स्थिति लिखकर दी थी। और ई-कामर्स पर अमेरिका तथा उसके सहयोगियों द्वारा मोल-भाव की मांग का विरोध किया था। इसके तहत अमेरिका नागरिकों का डाटा बेस मुफ्त में मांग रहा था। दि ट्रिब्यून के इस खुलासे का यह मतलब भी है कि प्रस्तावित डाटा सुरक्षा कानून का अब कोई मतलब नहीं होगा क्योंकि डाटा पहले ही लीक हो चुका है और सुरक्षा में सेंध लगाई जा चुकी है। राज्य सरकारों को चाहिए कि वे तुरंत इससे अलग हो जाएं और यूआईडीएआई के साथ हुए करार को रद्द कर दें।” श्री कृष्णन 2010 में आधार बिल की जांच करने वाली विशेष संसदीय टीम के समक्ष उपस्थिति हुए थे।

दोपहर बाद 12:30 बजे : इस संवाददाता ने ‘अनामिका’ के रूप में व्हाट्सऐप्प नंबर 7610063464 पर एक ऐसे व्यक्ति से संपर्क किया जिसने अपना परिचय ‘अनिल कुमार’ के रूप में दिया। उनसे एक ऐक्सेस पोर्टल बनाने के लिए कहा गया।
दोपहर बाद 12:32 बजे कुमार ने नाम, ईमेल आईडी और मोबाइल नंबर पूछा और यह भी कहा कि उसके पेटीएम नंबर 7610063464 में 500 रुपए डाल दिए जाएं।
दोपहर बाद 12:35 बजे : इस संवाददाता ने एक ई मेल आईडी बनाया, aadharjalandhar@gmail.com, और अपना नंबर ******5852 इस अनाम एजेंट को भेज दिया।

दोपहर बाद 12:48 बजे बजे : पेटीएम के जरिए 500 रुपए स्थानांतरित कर दिए गए।
दोपहर बाद 12:49 बजे: इस संवाददाता को एक ईमेल मिला जिसमें कहा गया था, “आप ‘सीएससी एसपीवी’ के लिए एनऱोलमेंट एजेंसी एडमिस्ट्रेटर बना दिए गए हैं। आपका एनरोलमेंट एजेंसी एडमिसट्रेटर आईडी ‘Anamika_6677’।” यह भी कहा गया था कि पासवर्ड अलग से भेजा जाएगा और यह थोड़ी देर बाद आ गया। दोपहर बाद 12:50 बजे : इस संवाददाता की पहुंच यूआईडीएआई में पंजीकृत प्रत्येक भारतीय के आधार विवरण तक थी।

आधार कार्ड प्रिंट करना
इस संवाददाता ने बाद में अनिल कुमार से संपर्क कर आधार कार्ड प्रिंट करने के लिए सॉफ्टवेयर की मांग की। इसके लिए उसने पेटीएम नंबर 8107888008 के जरिए (राज के नाम से) 300 रुपए की मांग की। पैसे देने के बाद अपना नाम सुनील कुमार बताने वाले एक व्यक्ति ने मोबाइल नंबर 7976243548 से फोन किया और इस संवाददाता के कंप्यूटर में सॉफ्टवेयर इंसटाल कर दिया। इसके लिए उसने “टीमव्यूअर” सॉफ्टवेयर का उपयोग किया और अपने ठिकाने से ही यह सॉफ्टवेयर इंसटाल कर दिया। काम पूरा होने के बाद उसने सॉफ्टवेयर ड्राइवर को रीसाइकिल बिन से भी डिलीट कर दिया।

संभावित दुरुपयोग
किसी के भी नाम से सिम कार्ड प्राप्त करना या बैंक खाता खोलना। पिछले महीने जलंधर में एक व्यक्ति गिरफ्तार किया गया था जिसने फर्जी आधार कार्ड के जरिए किसी के बैंक खाते से पैसे निकाल लिए थे।

दि ट्रिब्यून से

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