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यह डाटा ‘लीक’ होना नहीं, डाटा बेचना है और यूआईडीएआई के दावे बेमतलब..

By   /  January 7, 2018  /  No Comments

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संजय कुमार सिंह॥

सरकार और उसकी तरफ से भारतीय विशिष्ट पहचान प्राधिकरण (यूआईडीएआई) कह रहा है कि आधार डाटा सुरक्षित है। बायोमीट्रिक डाटा तक किसी की पहुंच नहीं है। उसे कोई लेकर नहीं गया है या कॉपी नहीं हुआ है आदि-आदि। पर यह व्हाट्सऐप्प संदेश क्या कह रहा है।

यूआईडीएआई का दावा है कि उसके पास लीक का पता लगाने की क्षमता है। और डाटा ऐक्सेस व प्रिंट करने के अधिकार ऐसे बेचे जा रहे थे।

दि ट्रिब्यून ने ऐसे ही संदेश के आधार पर 500 रुपए देकर वेबसाइट को ऐक्सेस करने का यूजरआईडी और पासवर्ड खरीदा फिर तीन सौ रुपए देकर आधार कार्ड प्रिंट करने का अधिकार और सॉफ्टवेयर भी। इसके बाद सरकार कह रही है आपका डाटा सुरक्षित है। यह वैसे ही है कि आप हमारे डाटा की फोटो कॉपी बेचिए, चोरी होने दीजिए, दुरुपयोग करने की संभावनाएं खोल दीजिए और कहिए कि आपका ओरिजनल सुरक्षित है। या जो चोरी गया वह फोटो कॉपी है। मजे की बात यह है कि ऐसा खुले आम हो रहा था, किसी को पता नहीं चला और ट्रिब्यून ने साबित कर दिया तो झूठ का सहारा।

देश भर के नागरिकों का एक डाटाबेस सरकार ने बनाया अपनी जरूरत के लिए, अपनी सुविधा के लिए या नागरिकों को सुविधाएं देने के लिए – अब उसे सुरक्षित रखने की जिम्मेदारी उसकी है। उसमें वह नाकाम रही। चोरी हो गई। ताले की चाबियां बिक रही हैं और सरकार कह रही है कि जो चोरी हुआ वह कुछ नहीं तुम्हारा नाम और फोन नंबर भर है। मेरा नाम और फोन नंबर आपके पास है तो देश भर में बांटने या बेचने के लिए नहीं है। इसलिए भी नहीं है कि मुझे गुप्त रोग हो तो इलाज करने वाले डॉक्टर अपनी पेशकश करें। पर डाटा चोरी हो रहें हैं तो किसलिए? इसीलिए कि आपके पास फोन किए जा सकें कि बीमा ले लीजिए, कार फाइनेंस करा लीजिए। गुप्त रोग का इलाज करा लीजिए। और ऐसा नहीं है कि सरकार और उसके अधिकारी यह सब नहीं समझते हैं। खूब समझते हैं फिर भी सरकार की लापरवाही, नालायकी का बचाव करते हैं।

हार्डवर्क करने वाली ईमानदार सरकार चारो खाने चित पड़ी है। तकनीकी तौर पर कंप्यूटर या वेबसाइट को हैकर्स से सुरक्षित रखना बहुत ही मुश्किल है। भारत समेत किस देश का क्या नहीं हैक हुआ है – वह एक अलग समस्या है। पर इसका मतलब यह नहीं है कि हैक होने के बाद भोली-भाली जनता को यह समझा दिया जाए कि फोटो कॉपी चोरी गई है। असली सुरक्षित है। खासकर उसी जनता को जिसे आप नोट की फोटो प्रति से लेकर गोपनीय सूचना रखने लेने-देने के आरोप में परेशान करते रहे हैं। आपके यहां से चोरी हो जाए, चोर पकड़ा न जाए तो कोई बात नहीं। पकड़ा गया – क्योंकि चौकीदार सो रहा था तो चोर ही जिम्मेदार। जब चोरी हुई नहीं तो चोर किस बात का जिम्मेदार?

अंग्रेजी दैनिक ट्रिब्यून में खबर छपने के बाद यूआईडीएआई ने कहा कि चोरी हुई ही नहीं और फिर एफआईआर करा दी गई। खबर लिखने तक किसी गिरफ्तारी की कोई खबर नेट पर नहीं मिली। ट्रिब्यून की रिपोर्ट को खारिज करते हुए बृहस्पतिवार को जारी खंडन जरूर मिला। इसके मुताबिक उसकी प्रणाली सुरक्षित है और इसके किसी भी दुरुपयोग का पता लगाया जा सकता है। उसने कहा कि उसके पास हर गतिविधि की पूरी जानकारी होती है। जबकि ट्रिब्यून संवाददाता ने पोर्टल को ऐक्सेस करने के लिए यूजर आईडी और पासवर्ड बनवा लिया था। यूआईडीएआई के इस दावे के जवाब में ट्रिब्यून ने कहा है कि आधार डाटा तक अनधिकृत व्यक्तियों की पहुंच थी और यूआईडीएआई की वेबसाइट का दुरुपयोग करते हुए डाटा चोरी किया गया, जिसमें निजी जानकारी जैसे नाम, जन्मतिथि, पता, पिन, फोटो, फोन नंबर व ई-मेल आदि थे।

यूआईडीएआई ने दावा किया कि प्राधिकरण छेड़छाड़ की पहचान करने की क्षमता भी रखता है। पर इसका क्या फायदा अगर यूजर आईडी जारी हो जाएं और लोग डाटा से छेड़छाड़ कर लें, उसका दुरुपयोग कर लें उसके बाद पकड़ ही लिए जाएं। फिर उनका टूजी हो जाए। ट्रिब्यून का दावा है कि महीनों से बड़ी संख्या में लोग अनधिकृत तरीके से डाटा तक पहुंच बनाये हुए थे और बिक्री की पेशकश हो रही थी फिर भी उसे हवा तक नहीं लगी और अब खिसयानी बिल्ली खंभा नोते शैली में लंबे-लंबे दावे।

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  • Published: 9 months ago on January 7, 2018
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  • Last Modified: January 7, 2018 @ 6:55 am
  • Filed Under: देश

About the author

मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.

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