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झूठ-सच बोलकर गुब्बारे में बैठ गए, हमें देखिए, जमीन पर ही हैं..

By   /  January 7, 2018  /  No Comments

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-उषा पंडित की फेसबुक पोस्ट – हिंदी अनुवाद: संजय कुमार सिंह||

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी 2014 में जब चुनाव प्रचार कर रहे थे तो उन्होंने आयकर खत्म करने को मुश्किल संभावना कहा था। इसके साथ गुजरात में उनके बहुत काम करने या परिश्रमी होने की अफवाहों तथा मंदिर के मुकाबले शौचालयों को महत्वपूर्ण बना दिए जाने के बाद वे हममें से कुछ लोगों को यह यकीन दिला पाए कि हमें वाकई एक मजबूत प्रधानमंत्री मिल सकता है जो दूरदर्शिता और बदलाव की बात करता है। उस समय हम नहीं जानते थे कि वे लगातार झूठ बोलते हैं, निराधार बातें करते हैं और मौके पर चुप हो जाते हैं।

ऐसा नहीं है कि कर चोरी बहुत बड़ी बात है। क्यों?
खेती और संबद्ध क्षेत्रों में 56% लोग आयकर देने से मुक्त हैं। बाकी बचे 44% में से 75% के आयकर की सीमा के नीचे होने की संभावना हैं। इसका मतलब हुआ कि छह करोड़ लोगों को टैक्स देना चाहिए जबकि भारत में इस समय सिर्फ तीन करोड़ लोग आयकर देते हैं।

नोटबंदी का लक्ष्य अगर कराधान था तो यह सिर्फ तीन करोड़ लोगों के लिए था। देश के एक अरब 33 करोड़ (133 करोड़) लोगों में से। यानी भारत की आबादी के सिर्फ 2 प्रतिशत लोगों के लिए यह सब करने का झूठ और अफवाह फैलाया जा रहा है। काले धन का मिथक छूट में है जिसे खत्म नहीं किया गया है। हमें धार्मिक स्थलों पर टैक्स लगाना चाहिए ताकि टैक्स आधार का विस्तार हो। यही नहीं, टैक्स के लिए अमीर और गरीब किसानों में अंतर करना भी जरूरी है।

भारत के सभी लोग, अमीर और एकदम गरीब – ढेरों अप्रत्यक्ष कर देते हैं। यह सर्विस टैक्स, बिक्री कर, वैट, एक्साइज, सीमाशुल्क, चुंगी, टॉल टैक्स, संपत्ति कर, कॉरपोरेट टैक्स, सड़क कर, कैपिटल गेन्स टैक्स, एसटीटी, प्रीक्विजिट टैक्स, वाहन पंजीकरण टैक्स, मनोरंजन कर, प्रोफेसनल टैक्स, म्युनिसिपल टैक्स, स्टैम्प ड्यूटी, ट्रांसफर चार्ज, ईडीसी, संपत्ति पंजीकरण, वेल्थ टैक्स, गिफ्ट टैक्स, डिविडेंड टैक्स, डिविडेंड डिस्ट्रीब्यूशन टैक्स, प्रवेश कर, शिक्षा सरचार्ज / सेस, स्वच्छ भारत सेस, कृषि कल्याण सेस आदि आदि। ढेर सारे टैक्स से राहत के लिए जीएसटी और एसजीएसटी – इससे बमुश्किल कोई राहत मिलती है। उसके उलट, इससे समस्या गंभीर हुई है। अब एफडीआरआई का यह संकट हमें साफ कर देगा। 2000 रुपए के नोट की एक और बंदी से भी इनकार नहीं किया जा सकता है।

अभी अगर हमें आवश्यकता है तो वह है सरकारी खर्चों का दायित्व। सरकारी खर्चों को कम किए जाने की आवश्यकता है। डिजाइनर परिधान, महंगी कारें, 30 हजार रुपए किलो का मशरूम, झरने के पानी के बिल एक चाय वाला के खर्चे हैं भारत की ओर से काम करने के लिए। इसके बाद जब तब होने वाले निर्णय जो बर्बादी करने वाले हैं, कर्ज में दबे बुलेट ट्रेन और बेजान मूर्तियां ताकि एक ऐसी संपन्नता दिखाई जा सके जिसे दुनिया में हर कोई देख सकता है कि वह असल में एक खास किस्म का पाखंड है। हमें एनपीए की जिम्मेदारी और पुनर्भुगतान की आवश्यकता है। हमें विदेशी खातों के मामले में शीघ्र कार्रवाई और वहां जमा धन वापस लाने की आवश्यकता है।

अगर आप हमपर भारी टैक्स लगाना चाहते हैं तो बेल-इन के साथ हमारे खातों के पीछे पड़िए, “विकसित” देशों जैसी सख्त सुरक्षा के बिना हमारे आधार को लिंक कीजिए पर आपको हमारे दुख भी मालूम होने चाहिए। कैसे हम वो काम कर रहे हैं जो आपको करना चाहिए और इसपर टैक्स लगने से हमारा खर्च भी ज्यादा होता है। आप यह भी जानिए कि भारत में जो लोग गड्ढों से भरी सड़कों, मिलावटी खाद्य पदार्थों, महंगी दवाइयों और पुराने जमाने के मामूली बीमा के भरोसे रहने वाले लोग कैसे टैक्स के खिलाफ हैं जो सीधे उनकी बचत में से कटौती करता है। आप झूठ-सच बोलकर शिखर पर पहुंच गए पर अपने गुब्बारे से सिर निकलकर देखिए हम आज भी जमीन पर ही हैं।

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About the author

मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.

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