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न्यायमूर्ति लोया की मौत का मामला क्यों असाधारण है..

By   /  January 14, 2018  /  No Comments

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संजय कुमार सिंह॥

बृजगोपाल हरकिशन लोया मुंबई में सीबीआई की विशेष अदालत के प्रभारी जज थे। उनकी मौत 30 नवंबर और एक दिसंबर 2014 की रात हुई। उस रात वे नागपुर में थे। उस समय सोहराबुद्दीन मामले की सुनवाई चल रही थी जिसमें मुख्‍य आरोपी भारतीय जनता पार्टी के अध्‍यक्ष अमित शाह थे। उस वक्‍त बताया गया था कि लोया की मौत दिल का दौरा पड़ने से हुई है। कारवां पत्रिका के निरंजन टाकले ने लिखा है, इस मामले में नवंबर 2016 से नवंबर 2017 के बीच अपनी पड़ताल में मैंने जो कुछ पाया, वह लोया की मौत के इर्द-गिर्द कुछ असहज सवाल खड़े करता है। इनमें एक सवाल उनके शव से जुड़ा है जो उनके परिवार के सुपुर्द किया गया था। इस बारे में मैंने जिन लोगों से बात की, उनमें एक लोया की बहन अनुराधा बियाणी हैं जो महाराष्‍ट्र के धुले में डॉक्‍टर हैं। बियाणी ने बताया कि लोया ने उनसे कहा था कि बांबे हाई कोर्ट के तत्‍कालीन मुख्‍य न्‍यायाधीश न्‍यायमूर्ति मोहित शाह ने अनुकूल फैसला देने के एवज में लोया को 100 करोड़ रुपये देने की पेशकश की थी। उन्‍होंने बताया कि अपनी मौत से कुछ हफ्ते पहले लोया ने उन्‍हें यह बात बताई थी जब उनका परिवार गाटेगांव स्थित अपने पैतृक निवास पर दिवाली मनाने के लिए इकट्ठा हुआ था। लोया के पिता हरकिशन ने भी बताया कि उनके बेटे का कहना था कि एक अनुकूल फैसले के बदले उन्‍हें पैसे और मुंबई में एक मकान की पेशकश की गई है। इसके अलावा, कारवां की खबर में और भी कई मामले हैं जिससे न्यायमूर्ति लोया की हार्ट अटैक से बताई जा रही मौत पर शक होता है।

कहने की जरूरत नहीं है कि पूरा मामला बेहद गंभीर, डरावना और रोमांचक है। उसपर तुर्रा यह कि कारवां की स्टोरी हत्या के लगभग तीन साल बाद प्रकाशित हुई। जब इस खबर से संबंधित मुद्दों पर चर्चा चल रही थी और भक्ति पत्रकारिता तथा गोदी में बैठे मीडिया संस्थानों के बीच इस खबर की तारीफ हो रही थी तभी खबर आती है कि दिवंगत जज बृजमोहन लोया के बेटे ने बांबे हाई कोर्ट की मुख्य न्यायाधीश मंजुला चेल्लूर से मुलाकात की और कहा कि उनके पिता के मौत की परिस्थितियों को लेकर परिवार को कोई शिकायत या संदेह नहीं है। हाईकोर्ट की मुख्य न्यायाधीश मंजुला और जस्टिस लोया के बेटे की मुलाकात ऐसे समय पर हुई है, जब जस्टिस भूषण गवई ने टाइम्स ऑफ इंडिया से बातचीत में कहा था कि एक दिसंबर, 2014 को हुआ हादसा कोई साजिश नहीं है। जस्टिस लोया साथी जज की बेटी की शादी में हिस्सा लेने नागपुर गए थे। जस्टिस लोया के बेटे ने चीफ जस्टिस से कहा, ‘न्यायपालिका के सदस्यों पर हमारा पूरा विश्वास है, जो 30 नवंबर- एक दिसंबर की रात में मेरे पिता के साथ में थे। जांच एजेंसियों की ईमानदारी पर भी हमें पूरा विश्वास है। मेरे पिता की मौत हर्ट अटैक से ही हुई थी और इस मामले में मेरे परिवार को कोई भी संदेह नहीं है।’ इसमें कारवां की खबर के कुछ तथ्यों को गलत बताया गया था। पर सवाल यह है कि सीबीआई ने अपील क्यों नहीं की?

इस खबर के बावजूद सरकार ने कोई कार्रवाई नहीं की। संतोषजनक स्पष्टीकरण नहीं आया। अब ‘बांबे लायर्स एसोसिएशन’, महाराष्ट्र के पत्रकार बीआर लोन और कांग्रेस नेता तहसीन पूनावाला ने इस मामले में याचिका दायर की है। और जैसा कि आप जानते हैं चार जजों ने इस मामले में दिलचस्पी दिखाई थी पर यह मामला दूसरी बेंच को दे दिया गया। इसके बाद ही जजों ने प्रेस को संबोधित किया और इस मामले के बारे में पूछे जाने पर ‘हां’ कहा गया था। तहसीन पूनावाला का पक्ष रख रहे अधिवक्ता वरींदर कुमार शर्मा ने कहा कि यह ऐसा मामला है जिसमें एक दिसबंर 2014 को एक न्यायाधीश की रहस्यमयी परीस्थितियों में मौत हो गई जिसकी जांच होनी चाहिए। सुप्रीम कोर्ट ने सोहराबुद्दीन शेख मुठभेड़ मामले की सुनवाई कर रहे सीबीआई के विशेष न्यायाधीश बीएच लोया की कथित तौर पर रहस्यमय हालात में हुई मौत को ‘गंभीर मुद्दा’ कहा है और मामले की स्वतंत्र जांच की मांग कर रही याचिकाओं पर महाराष्ट्र सरकार से जवाब मांगा है। इस मामले की अगली सुनवाई 15 जनवरी को है।

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  • Published: 1 week ago on January 14, 2018
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  • Last Modified: January 14, 2018 @ 10:10 pm
  • Filed Under: देश

About the author

मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.

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