Loading...
You are here:  Home  >  मीडिया  >  Current Article

पद्मावती: यह क्या हो रहा है, सरकार क्या कर रही है..

By   /  January 19, 2018  /  No Comments

    Print       Email
इस खबर को अपने मित्रों से साझा करें..

पद्मावति फिल्म पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले से भाजपा के हाथ पांव फूल गए हैं। दरअसल, राजस्थान के दो लोकसभा क्षेत्रों अजमेर और अलवर में 29 जनवरी को उपचुनाव होने हैं और पद्मावत के खिलाफ सबसे ज्यादा विरोध राजस्थान में ही हुआ है। अब सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद भाजपा को इन उपचुनावों की चिन्ता है। अंग्रेजी दैनिक टेलीग्राफ के मुताबिक, भाजपा के एक प्रवक्ता ने कहा कि उन्हें इस विषय पर बोलने से मना किया गया है। 2014 के चुनाव में भाजपा ने अजमेर और अलवर से क्रम से कांग्रेस के दिग्गज सचिन पायलट और भंवर जितेन्द्र सिंह को हराया था। पर दोनों ही सांसदों का निधन होने से अब उपचुनाव हो रहे हैं। फिल्म को मुद्दा बनाने के बाद अब सुप्रीम कोर्ट में हार के बाद भाजपा की हालत खराब है। इसी मारे कल टीवी पर करणी सेना के नेताओं को आग उगलने दिया गया और भारत बंद की अपील तक हो गई। इसे आज इंडियन एक्सप्रेस ने अच्छे से छापा है। इंडियन एक्सप्रेस की खबर के आलोक में मीडिया की भूमिका और सरकार व भाजपा की चुप्पी पर एक टिप्पणी पढ़िये।

संजय कुमार सिंह॥

बैंडिट क्वीन से लेकर गांधी को मारने वाले लोग : प्रतिबंध की अपील को खारिज करते हुए जजों ने याद किया
सुप्रीम कोर्ट ने कहा – अभिव्यक्ति की आजादी सर्वोच्च है, राज्यों से पद्मावत के रिलीज को सुरक्षा देने के लिए भी कहा..
मुख्य न्यायाधीश के नेतृत्व वाली पीठ ने कहा, बहुमूल्य संवैधानिक अधिकार दांव पर हैं..
पर राजपूत समूह चाहता है कि “गैरआधिकारिक प्रतिबंध” बना रहे, राज्यों ने कहा वे अदालती आदेश का अध्ययन करेंगे..

आज के ‘इंडियन एक्सप्रेस’ की यह पहली खबर है और ऊपर की लाइनें – शीर्षक का अनुवाद है, जो अखबार में बड़े अक्षरों में प्रमुखता से छपा है। हिन्दी में यें खबरें ऐसी ही छपी होंगी इसकी उम्मीद मुझे नहीं है इसलिए मैंने हिन्दी अखबारों को देखने से पहले ही यह अनुवाद कर दिया है।
यह बताने के लिए देश में क्या चल रहा है। सुप्रीम कोर्ट की सर्वोच्चता को यह कैसी चुनौती है। पहले ऐसा नहीं होता था। मुझे याद नहीं है कि पहले कभी किसी राज्य सरकार ने कहा हो कि आदेश का अध्ययन करेंगे। पहले कहा जाता था कि सुप्रीम कोर्ट के आदेश का पालन होगा। और जब राज्य सरकारों का यह हाल है तो देश की जनता का क्या होगा। वह तो भीड़ की तरह व्यवहार करती ही है। और मुझे लगता है कि दोष टेलीविजन तथा कुछ हद तक सोशल मीडिया का है। हालांकि, सोशल मीडिया ही है कि कुछ समझाने और समझदारी की भी बात हो रही है।


मैं टेलीविजन नहीं देखता (कुछ पसंदीदा मित्रों के कार्यक्रम छोड़कर) पर सोशल मीडिया से पता चला कि टीवी पर ऐसे लोगों को बैठाकर खूब माहौल बनाया गया। शायद भारत बंद की भी अपील है। एक मित्र ने लिखा था कि बंद कराने वालों को औकात समझ में आ जाएगी पर मुझे लगता है कि मीडिया (खासकर टेलीविजन) और सरकार का साथ मिले (उसे साथ देना नहीं होता है पुलिस की सुस्ती पर कुछ करना नहीं होता है और इतना काफी होता है) तो भीड़ बंद करा देगी। फिल्म चलने नहीं देगी। यह अलग बात है कि तकनीक के इस जमाने में किसी को फिल्म देखने से रोकना लगभग असंभव है। पर कानून व्यवस्था? वह तो राज्य सरकार की जिम्मेदारी है। इस खबर से तो वह बिल्कुल लाचार नजर आ रही है।

दूसरी ओर, सरकार क्या कर रही है। वह क्यों ऐसे मामले बढ़ने दे रही है? राज्य सरकारें क्यों नहीं कह रही हैं कि सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद अब कोई सुनवाई नहीं फिल्म प्रदर्शित होगी और जो विरोध करेगा उसके खिलाफ कार्रवाई होगी। सरकार का इतना कहना ही पर्याप्त होता है। सरकार औऱ सरकार चलाने वाले यह सब अच्छी तरह जानते हैं पर ऐसा कह नहीं रहे हैं। जाहिर है, यह उनकी राजनीति है। और अगर यह वाकई राजनीति है तो घटिया है।

अगर समाज खराब हो जाएगा, नियंत्रण योग्य नहीं रहेगा तो आप सरकार में रहकर भी क्या करेंगे? होगा वही जो भीड़ चाहेगी और भीड़ हमेशा यह नहीं चाहेगी कि कुर्सी पर आप ही रहें। इसलिए मुझे लगता है सरकार खतरनाक खेल खेल रही है। मुमकिन है वह मीडिया के बनाए माहौल से परेशान हो और किंकर्तव्यविमूढ़ हो। अगर वाकई ऐसा है तो यह भी खतरे की घंटी है। मीडिया (खासकर टीवी चैनलों) को भी ठीक होना ही होगा। यह नहीं हो सकता है कि वे आत्मनियंत्रण ना मानें और जिम्मेदार व्यवहार भी न करें और उन्हें चलते रहने दिया जाए। सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद किसी से पूछने और उसे यह कहने देने का कोई मतलब नहीं है कि हम सुप्रीम कोर्ट का आदेश नहीं मानेंगे।

Facebook Comments

इस खबर को अपने मित्रों से साझा करें..
    Print       Email

About the author

मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.

पाठक चाहे आलेखों से सहमत हों या असहमत, किसी भी लेख पर टिप्पणी करने को स्वतंत्र हैं. हम उन टिप्पणियों को बिना किसी भेद-भाव के निडरता से प्रकाशित भी करते हैं चाहे वह हमारी आलोचना ही क्यों न हो. आपसे अनुरोध है कि टिप्पणियों की भाषा संयत एवं शालीन रखें - मॉडरेटर

Manisa escort Tekirdağ escort Isparta escort Afyon escort Çanakkale escort Trabzon escort Van escort Yalova escort Kastamonu escort Kırklareli escort Burdur escort Aksaray escort Kars escort Manavgat escort Adıyaman escort Şanlıurfa escort Adana escort Adapazarı escort Afşin escort Adana mutlu son

You might also like...

सुजस प्रकाशन की आड़ में हेराफेरी..

Read More →
Eyyübiye escort Fatsa escort Kargı escort Karayazı escort Ereğli escort Şarkışla escort Gölyaka escort Pazar escort Kadirli escort Gediz escort Mazıdağı escort Erçiş escort Çınarcık escort Bornova escort Belek escort Ceyhan escort Kutahya mutlu son
Page Reader Press Enter to Read Page Content Out Loud Press Enter to Pause or Restart Reading Page Content Out Loud Press Enter to Stop Reading Page Content Out Loud Screen Reader Support
WhatsApp chat
%d bloggers like this: