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ई-वे बिल लागू होना फिर टला..

By   /  February 2, 2018  /  No Comments

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संजय कुमार सिंह॥

बजट और उपचुनाव परिणाम के शोर में जीएसटी का हिस्सा – ई-वे बिल लागू होना फिर टलने की खबर रह गई। ई-वे बिल जीएसटी की सख्तियों का भाग है जो ज्यादातर सामान को एक स्थान से दूसरे स्थान तक भेजने या लाने-ले जाने के लिए बनाना होगा। इसके नियम व प्रक्रियाएं ऐसी हैं कि भारत जैसे देश में लागू करना भारी मुसीबत है। पर सरकार इसे इस पर आमादा है और हर बार मुंह की खाती है। एक जुलाई से जीएसटी लागू होने के बाद इसे 16 अगस्त से लागू किया जाना था। टलते-टालते इसे एक फरवरी से लागू किए जाने की घोषणा हुई थी। जनवरी में ही इसका कथित ट्रायल शुरू हो गया और लगा था कि इस बार ई-वे बिल पार हो जाएगा। हिन्दी के कई अखबारों ने अति उत्साह में यह खबर तो दी कि बजट से पहले या बजट के ही दिन ई-वे बिल “सफलतापूर्वक” लागू हो हो गया। पर आखिरकार उसी दिन इस टाल दिए जाने की खबर हिन्दी अखबारों में (गूगल सर्च से) नहीं मिली। जबकि अंग्रेजी के अखबारों में यह खबर समान रूप से थी।

इस संबंध में इंडियन एक्सप्रेस में प्रकाशित खबर के मुताबिक सेंट्रल बोर्ड ऑफ एक्साइज एंड कस्टम्स (सीबीईसी) ने ट्वीट किया है, “ई-वे बिल बनाने में कारोबारियों को ‘शुरुआती’ प्रौद्योगिकीय असुविधाओं के कारण जो मुश्किलें आ रही हैं उसके मद्देनजर यह तय किया गया है कि ई-वे बिल बनाने की परीक्षण अवधि का राज्यों के अंदर और एक राज्य से दूसरे राज्य में सामान लाने-ले जाने के लिए विस्तार कर दिया जाए। यह एक ऐसी तारीख से लागू होगा जिसकी सूचना बाद में दी जाएगी।” इंडियन एक्सप्रेस ने भी लिखा है कि एक जुलाई से जीएसटी लागू होने के बाद से ई-वे बिल लेकर चलने की आवश्यकता आईटी नेटवर्क तैयार न होने के कारण टलती जा रही है। नई टैक्स व्यवस्था के लिए आईटी बैकबोन का विकास करने वाली कंपनी जीएसटी नेटवर्क 17 जनवरी से इसका परीक्षण कर रही है और इस दौरान 2.84 लाख ऐसे परमिट पोर्टल पर जारी किए गए हैं। इसके बाद भी आज औपचारिक शुरुआत होते ही सिस्टम तकनीकी मुश्किलों में फंस गया और इसे लागू किया जाना टालना पड़ा। अनिश्चित काल के लिए।

वैसे तो इसे सिस्टम की दिक्कतों की आड़ में ही टाला गया है पर सच यह है कि तथाकथित टैक्स चोरी रोकने के नाम पर इसे ऐसा बना दिया गया है कि यह व्यावहारिक भी नहीं है। इसलिए इसे लागू करने में देर हो रही है। व्यावहारिक से मेरा मतलब देश के दूरदराज के गांवों में सड़कों पर नाका चौकियों पर कंप्यूटर चलना, नेट कनेक्शन और बिजली रहना और 24 घंटे चालू हालत में रहना मुझे तो सपना लगता है। पता नहीं इसपर कितना ध्यान दिया गया है और इससे निपटने के लिए क्या-कैसे उपाय किए गए हैं। हालांकि दावा यही किया गया था कि परीक्षण के दौरान जो परेशानी बताई गई थी उसे दूर करने के उपाय भी किए गए हैं।

जीएसटी की चोरी और काले कारोबार पर रोक लगाने के लिए ई-वे बिल जरूरी है। हो सकता है व्यापारी इसी लिए विरोध कर रहे हों या मुश्किलें खड़ी कर रहे हों पर ई-वे बिल जीएसटी के नियमों की ही तरह इतना मुश्किल है कि बहुतों के लिए टैक्स चुकाकर काम करना भी असंभव होगा। फिलहाल तो सिस्टम ही नहीं चल रहा है। ऐसे में अगर लागू होना जरूरी है तो जो नुकसान हो रहा है उसके लिए कौन जिम्मेदार है। देश में कारोबार और रोजगार का तो जो हो रहा है वह अपनी जगह है ही। कहा यह जा रहा है कि कोई अधिकारी 30 मिनट से अधिक तक किसी गाड़ी को रोक कर रखता है तो ट्रांसपोर्टर उसकी सूचना ऑनलाइन अपलोड कर सकेगा। इसतरह ई-वे बिल से भ्रष्टाचार में भी कमी आएगी। पर सवाल उठता है कि शिकायत करने के विकल्प अब नहीं हैं क्या? या पहले नहीं थे। कौन शिकायत करता था और कहां कार्रवाई होती थी। अगर सब ठीक ही था तो इसकी क्या जरूरत और यह कहना कि शिकायत की जा सकती है इसलिए भ्रष्टाचार नहीं होगा बेमतलब है। रोज काम करने वाले शिकायत नहीं करते। वैसे भी जब सरकार सुन ही नहीं रही हो तो आदमी काम करेगा, शिकायत नहीं। फिर भी।

50 हजार रुपये से अधिक मूल्य के सामान को एक राज्य से दूसरे राज्य में ले जाने के लिए ई-वे बिल अनिवार्य है। इसे राज्य के भीतर माल ले जाने के लिए भी लागू किया जाना है। कर्नाटक में पायलट प्रोजेक्ट के रूप में ई-वे बिल लागू किया गया है। तमाम कानूनों की तरह इसमें भी छूट है। कुछ वस्तुओं को ई-वे बिल की आवश्यकता से मुक्त रखा गया है। इसका दुरुपयोग सब जानते हैं पर अभी वह मुद्दा नहीं है। एक देश एक टैक्स के नारे के बीच किसपर जीएसटी है किसपर नहीं और कितना, कहां जीएसटी लागू है और कहां नहीं, कहां परीक्षण चल रहा है कहां पूरा हो गया यह सब का हिसाब रखना फिलहाल संभव नहीं है। इसलिए अभी तो उसपर बात भी नहीं हो सकती।

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About the author

मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.

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