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शून्य से शिखर तक और फिर वापस..

By   /  February 4, 2018  /  No Comments

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-वीर विनोद छाबड़ा॥
भगवान दादा अपने ज़माने के सुपर स्टार थे। वो अपने दौर को यों याद करते थे – फारेस रोड से लैमिंग्टन रोड तक का सफर यों तो महज़ पंद्रह-बीस मिनट का है, मगर यह फासला तय करने में मेरे बारह साल खर्च हुए।
मोटा थुलथुल जिस्म, चौड़ा चौखटा और ऊपर से छोटा कद। ये देख चाल को वालों को हंसी आती थी – पहलवान दिखते हो एक्टर नहीं।
शौक और जुनून क्या कुछ नहीं कराता। छोटे-छोटे स्टंट और मजाकिया रोल करके कुछ धन जमा किया। कुछ उधार लिया। एक छोटा-मोटा स्टूडियो लिया किराये पर। कुल पैंसठ हज़ार रुपये की लागत से फिल्म बनाई- बहादुर किसान। स्पाट ब्याय से लेकर प्रोड्यूसर-डायरेक्टर तक का काम खुद किया। स्टंट व एक्शन- थोड़ा सा कॉमेडी का तड़का। चाल और झुग्गी-झोंपड़ियों में रहने वाले कामगारों-मजदूरों के मध्य खासी लोकप्रिय।
भगवान दादा का फिल्मों के प्रति समर्पण और जुनून देख राज कपूर ने सोशल फिल्में बनाने का मश्विरा दिया। फिल्म क्या बनी, एक इतिहास ही रच डाला। सुपर-डुपर हिट। गीताबाली के साथ भगवान खुद नायक। दिल के भोले और देखन में प्यारेलाल। फिल्म थी- अलबेला(1951)। राजेंद्र कृष्ण के गीत और चितलकर रामचंद्र की धुनों पर थिरकते भगवान दादा- शोला जो भड़के दिल मेरा धड़के….और ओ भोली सूरत, दिल के खोटे, नाम बड़े और दर्शन छोटे… आज भी इतिहास के सफे फाड़ कर जब-तब कानों में गूंजते हैं।
इन्हीं गानों में भगवान दादा का ‘स्लोमोशन स्टेप-डांस’ बहुत मक़बूल हुआ। इधर परदे पर भगवान दादा नाचते और उधर थिएटर में दर्शक। इसी ‘स्लोमोशन स्टेप-डांस’ को बाद में अभिताम बच्चन, मिथुन चक्रवर्ती और गोविंदा ने परिमार्जित किया। अभिनय सम्राट दिलीप कुमार भी भगवान दादा स्टाइल में ठुमके लगाने से पीछे नहीं रहे। ट्रेजेडी देखिये कि दर्शक ओरीजनल को भूल कर नकलचियों में खो गये।
‘अलबेला’ की अपार सफलता के बाद झमेला, लाबेला और भला आदमी बनायीं। अति आत्मविश्वास ले डूबा। लगातार तीन फ्लाप शो।
शुरू हुआ शिखर से सिफ़र तक का रिटर्न सफ़र। एक एक करके सब बिक गया।
भगवान दादा निराश जरूर हुए मगर टूटे नहीं। अगले दिन से वही पुराना भगवान दादा। भाग्य चक्र उल्टा घूम गया। जिन्होंने कभी काम के लिये भगवान दादा के चक्कर लगाये, भगवान दादा काम के लिये उनके चक्कर लगा रहे थे। छोटा-मोटा जो भी रोल मिला लपक लिया। डायरेक्टर को सैल्यूट करते हुए शुक्रिया अदा किया – आज की रोटी को इंतज़ाम तो हुआ।
उम्र बढ़ रही थी। बुढ़ापे के तमाम रोगों ने आ घेरा। बढ़िया इलाज के लिये जेब में पैसा नहीं। ऐसे बुरे हालात में भगवान से मिलने और मदद करने आये सिर्फ उनके पुराने साथी कामेडियन ओम प्रकाश, संगीतज्ञ सी० रामचंद्र और गीतकार-संवाद लेखक राजेंद्र कृष्ण। फिर वो दौर आया जब उनके हमदर्द भी एक एक कर दुनिया छोड़ गए। भगवान तनहा हो गए। बिलकुल टूटे और हताश। पैरालिसिस ने उन्हें व्हील चेयर तक सीमित कर दिया। बेटे-बेटियां उन्हें उनके हाल पर छोड़ कर चले गए। जबरदस्त हार्ट अटैक आया। कोई अस्पताल भी नहीं ले गया। अपने एक कमरे वाली चाल में आखिरी सांस ली। वो 04 फरवरी 2000 थी। उम्र 89 साल । तकरीबन चार सौ फिल्मों में काम कर चुके इस बंदे के आख़िरी सफ़र में चाल के कुछ लोग थे। सिनेमा की कोई नामी हस्ती नहीं थी।
अब तो भगवान दादा को पहचानने वाली पीढ़ी भी लगभग विदाई की कगार पर है।
यह लेख इसलिए कि आने वाली पीढ़ी को सनद रहे कि इतिहास में एक अलबेला भगवान होता था, भगवान दादा।

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About the author

मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.

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