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तत्काल रीफंड पर खबर तो यह होनी चाहिए थी

By   /  February 15, 2018  /  No Comments

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-संजय कुमार सिंह||
आज कुछ अखबारों में यह खबर छपी है कि तत्काल टिकट पर भी अब 100 प्रतिशत रीफंड मिल सकता है। खबर पढ़कर मुझे अपनी अज्ञानता पर आश्चर्य हुआ। मैं जानता था कि तत्काल टिकट पर रीफंड नहीं मिलता पर यह कल्पना भी नहीं की थी कि इस मामले में रेलवे ने ऐसे नियम बनाए होंगे कि टिकट जारी होने के बाद किसी कारण से ट्रेन न जाए या आपके स्टेशन पर आए ही नहीं या आपको जहां उतरना हो वहां जाए ही नहीं तो भी यात्री को रीफंड नहीं मिलेगा। मैं यह मानकर चल रहा था कि ऐसा बहुत कम होता है और अगर हो ही जाए तो यात्री यात्रा की सोचेगा, गंतव्य पर पहुंचने के उपाय करेगा कि अपने पैसे वापस लेने के फेर में पड़ेगा। लेकिन नियम बनाने के मामले में कोई सरकारी संस्थान इस कदर लुटेरी सोच की हो सकती है इसकी कल्पना मैंने नहीं की थी। कुछ ईमानदारी तो यमराज भी रखते हैं और कहा जाता है कि डायन भी सात घर छोड़ देती है पर इस सरकार ने तत्काल के नियम तो गजब के बनाए थे। गोदी मीडिया के स्वनामधन्य पत्रकारों में रेलवे बीट कवर करने वाले संवाददाता होते हैं। पता नहीं उन्हें इसकी जानकारी नहीं थी या उन्होंने खबर की, मैं ही नहीं देख पाया।

आज छपी खबर पढ़कर मुझे लग रहा है कि खबर तो यह होनी चाहिए थी कि रेलवे ट्रेन के शुरुआती स्टेशन से ही तीन घंटे या ज्यादा लेट होने पर भी यात्रियों को टिकट लौटाने और अपने पूरे पैसे वापस पाने की सुविधा नहीं देता है। ना ही रूट डायवर्ट होने पर और ना ही बोर्डिंग या डेस्टिनेशन या दोनों स्टेशन रूट पर न होने पर यह सुविधा मिलती है। इसी तरह, अगर तत्काल की बोगी ट्रेन से नहीं जुड़ी और आपको अपने क्लास में यात्रा करने की सुविधा नहीं मिली तो भी रीफंड का कोई प्रावधान नहीं था या फिर किसी कारण से आपने जिस श्रेणी में आरक्षण कराया उसमें यात्रा संभव नहीं हो तो भी शत प्रतिशत छोड़िए, अंतर भी नहीं मिलता था। मिलना तो छोड़िए नहीं मिलेगा – का नियम बनाना रेलवे को अपने बाप का समझना और यात्रियों को निरीह-लाचार से ज्यादा नहीं समझना ही है। मुझे तो लगता है कि इससे अच्छे तो वो भ्रष्ट थे तो आज भले जेल में हैं पर अपर क्लास की खाली सीटों पर नीचे वालों को यात्रा करने का मौका तो दिया।

आज यह खबर ऐसे छपी है जैसे रेलवे ने बहुत बड़ा अहसान किया है। नवभारत टाइम्स की साइट पर दिखी इस खबर में निम्नलिखित पांच कारण बताए गए हैं जब रेलवे ने यात्रियों को 100 फीसदी रीफंड देने की मेहरबानी की है।

तीन घंटे या अधिक विलंब : पहली स्थिति तो यह है कि ट्रेन आपकी बुकिंग के प्रारंभिक स्टेशन पर तीन घंटे या अधिक समय से विलंब से आती है तो 100 प्रतिशत रीफंड मिलेगा। ध्यान देने वाली बात यह है कि नियम बुकिंग के प्रारंभिक स्टेशन को लेकर है, अगर आपकी बुकिंग का प्रारंभिक स्टेशन और बोर्डिंग पॉइंट अलग है, तो यह नियम प्रभावी नहीं होगा। (यहां यह गौरतलब है कि यात्री के लिए तो वही स्टेशन शुरुआती है जहां से उसे यात्रा करनी है। सामान्य स्थिति में यहां भी यात्री पूरा रीफंड ले सकता है। पर जब वह मजबूरी में, जल्दी में यात्रा कर रहा हो तो रीफंड नहीं मिलेगा। यह मजबूरी का फायदा उठाना नहीं है तो और क्या है। इसके लिए यात्री कहीं भी दोषी नहीं है, उल्टे उसकी परेशानी बढ़ जाएगी पर रीफंड नहीं मिलेगा।)

अगर ट्रेन का रूट डायवर्ट हुआ : अगर ट्रेन का रूट डायवर्ट कर दिया गया है और यात्री उस रूट पर यात्रा नहीं करना चाहता तो भी तत्काल टिकट पर 100 फीसदी रिफंड मिलेगा। (मेरे ख्याल से अगर यात्री के दोनों स्टेशन मार्ग में हैं और यात्रा समय का कुल अंतर तीन घंटे से ज्यादा का नहीं है तो इस नियम की जरूरत नहीं है पर सरकार जी ने बना दिया तो बना दिया। सवाल कौन उठाएगा?)

बोर्डिंग या डेस्टिनेशन या दोनों स्टेशन रूट पर न हों : (यह नियम तो पहले ही हास्यास्पद था) अगर ट्रेन का रूट डायवर्ट हुआ है और बोर्डिंग स्टेशन या डेस्टिनेशन स्टेशन या दोनों बदले हुए रूट पर नहीं हैं तो 100 फीसदी रिफंड मिलेगा। (नहीं मिलने का भी कोई मतलब था – रेल मंत्री जी?)

बोगी अटैच नहीं हुई तो : अगर तत्काल कोटे के कोच को ट्रेन में अटैच नहीं किया और यात्री को उसकी बुकिंग क्लास के हिसाब से यात्रा की सुविधा नहीं मिली तो भी रेलवे 100 फीसदी रिफंड देगा। (यह मामला भी ऊपर वाले जैसा ही है)

बुकिंग क्लास में नहीं मिली यात्रा की सुविधा : अगर यात्री को बुक टिकट वाले क्लास में यात्रा की सुविधा नहीं मिल रही तो भी वह रेलवे से तत्काल टिकट पर 100 फीसदी रिफंड ले सकता है। (अव्वल तो ऐसा होना ही नहीं चाहिए पर हो तो यह सेवा मुहैया कराने वाले का नालायकी के सिवा कुछ नहीं है। इसपर रीफंड नहीं देना मनमानी और लूट के सिवा कुछ नहीं है। बेशर्मी की हद है।

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About the author

मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.

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