Loading...
You are here:  Home  >  राजनीति  >  Current Article

क्या मोदी 2019 में फिर भाजपा का परचम लहरायेंगे.?

By   /  March 3, 2018  /  1 Comment

    Print       Email
इस खबर को अपने मित्रों से साझा करें..

नितिन ठाकुर॥

आज बधाई देने का दिन है। ऐसे दिन खुलकर बधाई देनी भी चाहिए। टीवी चैनल पहली बार पूर्वोत्तर को भाव दे रहे हैं। भाव देने की वजह यही है कि हिंदी पट्टी की सबसे प्रभावशाली पार्टी बीजेपी ने वामपंथी किले में सेंध लगा दी है। ये दृश्य हिंदी न्यूज़ चैनल्स के लिए ऑडियंस फ्रेंडली है। जिन राज्यों की जीत-हार को एक दिन की हेडलाइंस में खत्म कर दिया जाता था आज उनकी चुनावी कहानी स्पेशल शोज़ में बांची जाएगी। किसी भी बहाने से सही, मगर पूर्वोत्तर भी हिंदी न्यूज़ चैनल में दिखने लगा है। कितने दिन दिखेगा वो अलग बात है, तो पूर्वोत्तर की नज़रअंदाज़ सियासत और चैनलों को बधाई।

बीजेपी पैन इंडिया पार्टी बनकर उभर आई है। अब वो बीस से ज़्यादा राज्यों में पूरी धमक के साथ मौजूद है। ईवीएम वगैरह की शिकायतें झूठी पड़ गई हैं। नोटबंदी या जीएसटी से भले लोगों की जेब फट गई हो लेकिन उन्हें कांग्रेसियों और वामपंथियों की हमदर्दी से ज़्यादा मोदी का कोड़ा भा रहा है। एक परसेप्शन काम आ रहा है कि मोदी फैसला करनेवाले नेता हैं। मनमोहन सिंह के खाते में ये कहां था? फिर राज्यों के अपने मुद्दे भी होते हैं जिन्हें पूर्वोत्तर से दूर बैठकर हम लोग कितना भी चाहें पकड़ नहीं पाते। स्थानीय नेताओं का अपना प्रभाव होता है जो बीजेपी के काम आ रहा है। जानकार बता रहे हैं कि कम्युनिस्ट पार्टी और दूसरी पार्टियों से दुखी होकर कितने ही राजनैतिक कार्यकर्ताओं ने त्रिपुरा में बीजेपी का दामन थाम लिया था और ये जीत दरअसल उन्हीं के कंधे पर बैठकर हासिल की गई है। ये कमोबेश वैसा ही लगता है जैसे ममता ने कम्युनिस्टों के साथ किया था। देश भर में माणिक सरकार की सादगी का प्रचार होता रहा लेकिन जनता कितनी आजिज़ आ गई थी अब नतीजे बता ही रहे हैं। लोगों ने मनमोहन की निजी ईमानदारी भी पसंद की थी पर जैसे उन्हें कैबिनेट समेत उखाड़ फेंका था, वैसा ही माणिक के साथ हुआ। कांग्रेसी रहे बिप्लव देव के हाथों भाजपा ने वामपंथियों की जड़ काट ही डाली। त्रिपुरा में बंगाली बोलनेवालों की बड़ी तादाद है। अगर ये बंगाली बोलनेवालों का रुझान है तो बीजेपी के आसार निश्चित तौर पर बंगाल में भी बन रहे हैं, तो त्रिपुरा को बधाई कि उन्होंने पच्चीस साल पुराने वामपंथ से निजात पाई जिसे लोकतंत्र के लिहाज़ से बुरा नहीं कह सकते।

नागालैंड में बीजेपी ने कमाल की रणनीतिक सोच का परिचय दिया। अपने ही सहयोगियों की टूट में साथ दिया और फिर उस धड़े को चुन लिया जो जीत सकता था। कांग्रेस के पास तो खैर हर सीट पर खड़ा करने को प्रत्याशी ही नहीं थे तो हालत का अंदाज़ा लगा लीजिए। एक बार भी इन जगहों पर बीफ जैसी बातों का ज़िक्र नहीं किया गया। एक रणनीतिक चुप्पी थी। पहले से बीजेपी जिन राज्यों में मौजूद है वहां छोटे राजनीतिक दलों के साथ उनकी अंडरस्टैंडिंग खराब हो जाती है पर चुनाव के आसपास ऐसे दलों को साथ लाने का अमित शाह में जो हुनर है वो अब खारिज नहीं हो सकता। वैसे इस हुनर पर असली मुहर तब लगेगी जब वो शिवसेना और टीडीपी को भी अपने साथ बनाए रखे। यहां बधाई से ज़्यादा शुभकामना उन दलों को जिनके भरोसे बीजेपी सत्ता में आने का ख्वाब देख रही है, साथ ही ये सलाह भी कि शिवसेना का हाल ज़रूर देखते चलें।

बस मेघालय ही रहा जहां मुकुल संगमा की अगुवाई में कांग्रेस गढ़ बचा ले गई लेकिन कांग्रेस के सेनापति जी को खुद दो जगहों से चुनाव लड़ना पड़ा। यहां बधाई राहुल गांधी के प्रवक्ताओं को कि टीवी की बहसों में उन्हें जान बचाने के लिए एक राज्य का नाम मिल गया।

तीन राज्यों के बारे में ये मेरी शुरूआती टिप्पणी है जो अंतिम निष्कर्ष नहीं हो सकता पर पिछले दो साल से मैं लगातार अनुमान लगा रहा हूं कि 2019 बीजेपी को देश में दोहराएगा। बीजेपी को सत्ता में ना देखने की चाहत रखनेवालों से माफी मांगते हुए फिर लिख रहा हूं कि मुझे मेरा अनुमान सशक्त होता ही दिख रहा है। हां, जिस तरह अब बीजेपी हिंदी पट्टी के बाद गैर हिंदी भाषी क्षेत्रों में जीत रही है उसमें भले बीजेपी का कल्याण हो लेकिन देश का इतना एकतरफा रुझान लोकतंत्र का संतुलन बिगाड़ रहा है। 2021 में राज्यसभा अगर बीजेपी की तरफ झुक गई तो संविधान निर्माताओँ ने जवाबदेह सरकार बनाने की कोशिश में चैक-बैलेंस की जो सोच समझ लगाई थी वो किसी काम की नहीं रह जाएगी।

Facebook Comments

इस खबर को अपने मित्रों से साझा करें..
    Print       Email

About the author

मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.

1 Comment

  1. Anjali Choudhary says:

    Appropriate analysis without being partial..

पाठक चाहे आलेखों से सहमत हों या असहमत, किसी भी लेख पर टिप्पणी करने को स्वतंत्र हैं. हम उन टिप्पणियों को बिना किसी भेद-भाव के निडरता से प्रकाशित भी करते हैं चाहे वह हमारी आलोचना ही क्यों न हो. आपसे अनुरोध है कि टिप्पणियों की भाषा संयत एवं शालीन रखें - मॉडरेटर

Manisa escort Tekirdağ escort Isparta escort Afyon escort Çanakkale escort Trabzon escort Van escort Yalova escort Kastamonu escort Kırklareli escort Burdur escort Aksaray escort Kars escort Manavgat escort Adıyaman escort Şanlıurfa escort Adana escort Adapazarı escort Afşin escort Adana mutlu son

You might also like...

हारी हुई कांग्रेस को लेना चाहिए नेहरू की बातों से सबक..

Read More →
Eyyübiye escort Fatsa escort Kargı escort Karayazı escort Ereğli escort Şarkışla escort Gölyaka escort Pazar escort Kadirli escort Gediz escort Mazıdağı escort Erçiş escort Çınarcık escort Bornova escort Belek escort Ceyhan escort Kutahya mutlu son
Page Reader Press Enter to Read Page Content Out Loud Press Enter to Pause or Restart Reading Page Content Out Loud Press Enter to Stop Reading Page Content Out Loud Screen Reader Support
WhatsApp chat
%d bloggers like this: