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लोकतंत्र के चौथे खंभे की बजाए धंधा बन गया है मीडिया – दिलीप मंडल

By   /  September 21, 2011  /  5 Comments

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मीडिया का स्वरूप पिछले दो दशक में काफी बदल गया है। मीडिया देखते ही देखते चौथे खंभे की जगह, एक और धंधा बन गया। अखबार और चैनल चलाने वाली कंपनियों का सालाना कारोबार देखते ही देखते हजारों करोड़ रुपए का हो गया। मुनाफा कमाना और मुनाफा बढ़ाना मीडिया उद्योग का मुख्य लक्ष्य बन गया। मीडिया को साल में विज्ञापनों के तौर पर साल में जितनी रकम मिलने लगी, वह कई राज्यों के सालाना बजट से ज्यादा है।
पर यह सब 2010 में नहीं हुआ। कुछ मीडिया विश्लेषक काफी समय से यह कहते रहे हैं कि भारतीय मीडिया का कॉरपोरेटीकरण हो गया है और अब उसमें यह क्षमता नहीं है कि वह लोककल्याणकारी भूमिका निभाए। भारत में उदारीकरण के साथ मीडिया के कॉरपोरेट बनने की प्रक्रिया तेज हो गई और अब यह प्रक्रिया पूरी हो चुकी है। ट्रस्ट संचालित “द ट्रिब्यून” के अलावा देश का हर मीडिया समूह कॉरपोरेट नियंत्रण में है। पश्चिम के मीडिया के संदर्भ में चोमस्की, मैकचेस्नी, एडवर्ड एस हरमन, जेम्स करेन, मैक्वेल, पिल्गर और कई अन्य लोग यह बात कहते रहे हैं कि मीडिया अब कॉरपोरेट हो चुका है। अब भारत में भी मीडिया के साथ यह हो चुका है।

मीडिया का कारोबार बन जाना दर्शकों और पाठकों के लिए चौंकाने वाली बात हो सकती है, लेकिन जो लोग भी इस कारोबार के अंदर हैं या इस पर जिनकी नजर है, वे जानते हैं कि मीडिया की आंतरिक संरचना और उसका वास्तविक चेहरा कैसा है। लोकतंत्र में सकारात्मक भूमिका निभाने की अब मीडिया से उम्मीद भी नहीं है। चुनावों में मीडिया जनमत को प्रभावशाली शक्तियों और सत्ता के पक्ष में मोड़ने का काम करता है और इसके लिए वह पैसे भी वसूलता है।  हाल के चुनावों में देखा गया कि अखबार और चैनल प्रचार सुनिश्चित करने के बदले में रेट कार्ड लेकर उम्मीदवारों और पार्टियों के बीच पहुंच गए और उसने खुलकर सौदे किए। मीडिया कवरेज के बदले कंपनियों से भी पैसे लेता है और नेताओं से भी। जब वह पैसे नहीं लेता है तो विज्ञापन लेता है। टाइम्स ऑफ इंडिया जैसे अखबार विज्ञापन के बदले पैसे नहीं लेते, बल्कि कंपनियों की हिस्सेदारी ले लेते हैं। इसे प्राइवेट ट्रिटी का नाम दिया गया है। मीडिया कई बार सस्ती जमीन और उपकरणों के आयात में ड्यूटी की छूट भी लेता है। सस्ती जमीन का मीडिया अक्सर कोई और ही इस्तेमाल करता है। प्रेस खोलने के लिए मिली जमीन पर बनी इमारतों में किराए पर दफ्तर चलते आप देश के ज्यादातर शहरों में देख सकते हैं।

मीडिया हर तरह की कारोबारी आजादी चाहता है और किसी तरह का सामाजिक उत्तरदायित्व नहीं निभाता, लेकिन 2008-09 की मंदी के समय वह खुद को लोकतंत्र की आवाज बताकर सरकार से राहत पैकेज लेता है। मंदी के नाम पर मीडिया को बढ़ी हुई दर पर सरकारी विज्ञापन मिले और अखबारी कागज के आयात में ड्यूटी में छूट भी मिली। लेकिन यह नई बात नहीं है। यह सब 2010 से पहले से चल रहा था।

2010 में एक नई बात हुई। एक पर्दा था, जो उठ गया। इस साल भारतीय मीडिया का एक नया रूप लोगों ने देखा। वैष्णवी कॉरपोरेट कम्युनिकेशंस की मालकिन नीरा राडिया दिल्ली की अकेली कॉरपोरेट दलाल या लॉबिइस्ट नहीं हैं। ऐसे कॉरपोरेट दलाल देश और देश की राजधानी में कई हैं। 2009 में इनकम टैक्स विभाग ने नीरा राडिया के फोन टैप किए थे, जो अब लीक होकर बाहर आ गए। नीरा राडिया इन टेप में मंत्रियों, नेताओं, अफसरों और अपने कर्मचारियों के साथ ही मीडियाकर्मियों से भी बात करती सुनाई देती हैं। इन टेप को दरअसल देश में राजनीतिशास्त्र, जनसंचार, अर्थशास्त्र, मैनेजमेंट, कानून आदि के पाठ्यक्रम का हिस्सा बनाया जाना चाहिए। इन विषयों को सैकड़ों किताबे पढ़कर जितना समझा सकता है, उससे ज्यादा ज्ञान राडिया के टेपों में है।

(मीडिया विश्लेषक और फेसबुक ऐक्टिविस्ट दिलीप मंडल की नई किताब कॉरपोरेट मीडिया-दलाल स्ट्रीट की भूमिका से उद्धृत)

किताब के बैक कवर पर यह लिखा गया है-

राडिया कांड मीडिया की ताकत और उसकी खामी दोनों को एक साथ दर्शाता है। ताकत इस बात की कि मीडिया जनमत बना सकता है, जनमत को बदल सकता है, लोगों के सोचने के एजेंडे तय करता है और खामी यह कि मीडिया पैसों के आगे किसी बात की परवाह नहीं करता। मीडिया को पैसे वाले पैसा कमाने के लिए और ताकत के लिए चलाते हैं। इसलिए इसके दुरुपयोग की संभावना इसकी संरचना और स्वामित्व के ढांचे में ही दर्ज है। राडिया कांड से यह जगजाहिर हो गया कि खासकर ऊंचे पदों पर मौजूद मीडियाकर्मी पैसे और प्रभाव के इस खेल में हिस्सेदार बन चुके हैं। पिछले 20 वर्षों में मीडियाकर्मियों के मालिक बनने की प्रक्रिया भी तेज हुई है। कुछ संपादक तो मालिक बन ही गए हैं। इसके अलावा भी मीडिया संस्थानों में मध्यम स्तर पर काम करने वाले पत्रकारों तक को कंपनी के शेयर दिए जाते हैं। इस तरह उनकी प्रतिबद्धता को नए ढंग से परिभाषित कर दिया जाता है। पत्रकारों का ईमानदार या बेईमान होना अब उनकी निजी पसंद का ही मामला नहीं रहा। कोई पत्रकार अपनी मर्जी से ईमानदार नहीं रह सकता। यह बात कई लोगों को तकलीफदेह लग सकती है। राडिया कांड ने मीडिया को सचमुच गहरे जख्म दिए हैं।

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About the author

मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.

5 Comments

  1. Arora Gulshan says:

    मीडीया अब लोकतंत्र का चौथा स्तंभ नहीं रहा अब वो पैसे के लिए जनमत बनाने और बदलने का कारोबार बन गया है।.

  2. krupal meshram says:

    बहोत बढ़िया दिलीप सर. अलोकतान्त्रिक, पूंजीवादी,जातिवादी,मनुवादी मीडिया की पोल आप खोलते रहिये.हम आपके साथ है !

  3. J.P. Sharma says:

    ये लेखक तो स्वघोषित मीडिया विश्लेषक है, ये उपाधि कहाँ से प्राप्त की है इन्होने ?

  4. adv. suresh rao says:

    सबसे पहले …एक सच सामने लाने के लिए माननीय दिलीप मंडल सर को धन्यवाद् ..सर मीडिया को लोकतंत्र का चौथा स्तम्भ कहा जाता है ..परन्तु ऐसा है नहीं .स्वयं मीडिया की सरचना अलोकतांत्रिक है मतलब यहाँ पर देश के सभी वर्गो की भागीदारी नहीं है…भला एसा मीडिया लोकतंत्र की रछा कैसे कर सकता है…जो मीडिया पूरी तरह जातिवाद से ग्रसित है ..जहाँ आज भी देश के पिछड़े वर्गो की भागीदारी शुन्य है .जो पिछडो की बात तक करने की जरूरत नहीं समझता …ऐसा मीडिया लोकतंत्र का रछक कैसे हो सकता है. आज भारत का मीडिया पूरी तरह से चंद जातियों और उद्योगपतियों के हाथ की कठपुतली एवं कुछ लोगो के लिए पैसे कमाने का धंधा बन गया है….इसके सिवा कुछ भी नहीं…………

  5. Om ! “Vandegomatram”
    Samajik andolano/social activism ki kokh se kabhi paida, media aaj dhandha v udyog matra tak simit nahi hai , isase bhi aage media danvon ke hath ki kathputli ban ke aam admi yani lachar v pareshan logon ko sata raha Sachchayee ye hai ki media large scale pe dalali kar raha hai. Ye aaj ka media police se bhi bada chor v bhrasht ban chuka hai. Police auron se hafta wasulti hai aur media to Police se bhi hafta wasulti hai. Media ki besharmi ki had to tab aur badh gai jab ye praqkhar deshbhakt Baba Jai Guru Dev ji evam Ram Dev Ji jaise mahapurshon ko badnam karne me koi kor kasar nahi chhodi. Paise k bal pe sattaon ke shirsh pe baithe rakshson ki ye media agent ban gai hai. Hame gupt roop bataya gaya hai ki ek deshdrohi party ke kathit yuvraj ko PM k roop me image building hetu v Baba Ram Dev jaise virodhiyon se nipatne unhe badnam karne hetu media mgt ke naam pe media ko 28,000 crs ki supari di gai hai. Ye bahut hi ghatak / khatrnak dushkritya hai , isliye hamne iske liye supari shabd ka prayog kiya hai.
    Dr. Krantiveer(Social Activist)

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