Loading...
You are here:  Home  >  मीडिया  >  Current Article

देश के लोकतंत्र की आत्मा को बेच देने वाला विधेयक..

By   /  March 20, 2018  /  No Comments

    Print       Email
इस खबर को अपने मित्रों से साझा करें..

-गिरीश मालवीय||

माफ कीजिएगा आज बड़ा मजबूर होकर के लिखना पड़ रहा है कि हमारे देश के बड़े नामचीन पत्रकारों, संपादको ने अपनी आत्मा अपने संस्थान के मालिकों के पास गिरवी रख दी है नही तो यह ख़बर आपको इस पोस्ट के माध्यम से नही मिल रही होती यह खबर कल बड़े बड़े काले हर्फों में फ्रंट पेज पर छप रही होती, ओर ब्रेकिंग न्यूज़ बनकर आपके टीवी स्क्रीन पर हेडलाइन के रूप में चल रही होती.

आपको कल शायद यह तो पता लग गया होगा कि लोकसभा में राजनीतिक पार्टियों के चंदे से संबंधित विधेयक को बिना बहस के पास कर दिया गया है …….यह कोई छोटा मोटा विधेयक नही था यह देश के लोकतंत्र की आत्मा को बेच देने वाला विधेयक था.

दरअसल इस विधेयक द्वारा विदेशी अंशदान (नियमन) अधिनियम (एफसीआरए)2010 में संशोधन किया गया है यह अधिनियम राजनीतिक दलों को विदेशी कंपनियों द्वारा मिले चंदे पर रोक लगाता हैं वैसे तो भारत सरकार ने वित्त विधेयक 2016 के जरिए एफसीआरए में संशोधन कर राजनीतिक दलों के लिए विदेशी चंदा लेने को आसान बनाया था लेकिन अब ताजा संशोधन के बाद पार्टियों को 1976 से मिले विदेशी चंदे की जांच की कोई गुंजाइश नहीं रह जाएगी.
ध्यान दीजिएगा 1976 से , यानी इससे बीते 42 वर्ष में राजनीतिक दलों को हुई तमाम विदेशी फंडिंग वैध हो गई हैं.
कानून की भाषा मे इसे भूतलक्षी प्रभाव से किया गया संशोधन कहा जाता है इस तरह के संशोधन की अनुमति बहुत विषम परिस्थितियों में ही दी जानी चाहिए.

अब आते हैं लेख के मूल विषय पर आखिर इस तरह के रेयर किस्म के प्रावधान को लागू क्यो करना पड़ा ?
2017 की शुरुआत में गैर-सरकारी संगठन एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स (एडीआर) ने एक याचिका दिल्ली हाईकोर्ट में दायर की ओर इस याचिका में एडीआर ने केंद्र सरकार पर अदालत की अवमानना करने का आरोप लगाया.

दरअसल 2014 में दिल्ली हाई कोर्ट ने पाया था कि भाजपा और कांग्रेस दोनों दलों ने ब्रिटेन स्थित कंपनी वेदांता रिसोर्सेज की भारतीय सहायक कंपनियों से चंदा लेकर फॉरेन कॉन्ट्रीब्यूशन रेगुलेशन एक्ट (एफसीआरए) का उल्लंघन किया था.

एफसीआरए की धारा-4 राजनीतिक दलों और जनप्रतिनिधियों पर विदेशों से चंदा लेने पर रोक लगाती है. उस वक्त दिल्ली हाई कोर्ट ने चुनाव आयोग और केंद्रीय गृह मंत्रालय को छह महीने के भीतर कांग्रेस और भाजपा दोनों के खातों की जांच करने और उन पर कार्रवाई करने का आदेश दिया था. लेकिन न तो चुनाव आयोग ने कुछ किया और न ही गृहमंत्रालय द्वारा कोइ कदम उठाए गए.

जुलाई 2017 में एडीआर की याचिका पर कार्यवाही करते हुए दिल्ली हाई कोर्ट ने केंद्र सरकार के रवैए पर सवाल उठाया, अदालत ने पूछा कि आखिर केंद्र सरकार इस मामले में कोई कदम क्यों नहीं उठाना चाहती.सरकार ने उस वक्त अदालत में दलील दी थी कि उसे रिकार्ड खंगालने के लिए 31 मार्च 2018 तक का वक्त दिया जाए.

अदालत ने 8 अक्टूबर 2017 मामले में कार्रवाई करने के लिए केंद्र को आखिरी छह हफ्ते का समय दिया था लेकिन यह छह हफ़्तों की अवधि यानी लगभग डेढ़ महीना तो दिसम्बर 2017 में ही खत्म हो गयी थी.

तो सवाल उठता है कि उसके बाद अदालत ने क्या किया ?, बहुत ढूंढने पर भी जवाब तो नही मिला पर यह जरूर मालूम पड़ा कि दिल्ली हाई कोर्ट की कार्यवाहक चीफ जस्टिस गीता मित्तल जो जस्टिस सी हरिशंकर के साथ मिलकर यह मुकदमा सुन रही थी उन्हें केंद्र सरकार ने 8 मार्च 2018 को नारी शक्ति पुरस्कार से नवाज दिया गया.

यह कोई साधारण पुरुस्कार नही है बल्कि यह तो महिलाओं को मिलने वाला यह भारत का सर्वोच्च सम्मान है जो महिला सशक्तिकरण की दिशा में किए गए कामों के लिए विश्व महिला दिवस पर ही दिया जाता है.

उस वक्त सुप्रीम कोर्ट की वरिष्ठ वकील इंदिरा जयसिंह ने कई ट्वीट कर जस्टिस मित्तल को पुरस्कार दिए जाने पर सवाल खड़े किए थे उन्होंने ट्वीट में कहा कि “कार्यरत जजों ने सरकार से पुरस्कार स्वीकार किए ? कभी नहीं, मुझे आशा है कि उनमें इसे ख़ारिज करने की ताक़त है.”

उन्होंने न्यायपालिका की स्वतंत्रता पर सवाल खड़े करते हुए अगला ट्वीट किया “बहुत से तरीके हैं जिनके ज़रिए न्यायपालिका की स्वतंत्रता को नष्ट किया जा सकता है, जिनमें से किसी कार्यरत जज को सम्मान दिया जा सकता है, खासकर महिला को.”

लेकिन अंतोतगत्वा जस्टिस गीता मित्तल ने 8 मार्च को राष्ट्रपति कोविंद के हाथों से यह पुरुस्कार स्वीकार कर लिया.

अब आप इस पुरस्कार के दिए जाने को और वो भी ऐसे महत्वपूर्ण मामले में उनके जुड़े होने को कैसे देखते हैं यह मैं तो नही कह सकता ! पर अब उन चार सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस की बात से पूर्ण रूप से सहमत हो गया हूँ जो 12 जनवरी 2018 को एक ऐतिहासिक प्रेस कॉन्फ्रेंस में कही गयी थी कि ‘देश का लोकतंत्र खतरे में हैं’.

Facebook Comments

इस खबर को अपने मित्रों से साझा करें..
    Print       Email

About the author

मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.

पाठक चाहे आलेखों से सहमत हों या असहमत, किसी भी लेख पर टिप्पणी करने को स्वतंत्र हैं. हम उन टिप्पणियों को बिना किसी भेद-भाव के निडरता से प्रकाशित भी करते हैं चाहे वह हमारी आलोचना ही क्यों न हो. आपसे अनुरोध है कि टिप्पणियों की भाषा संयत एवं शालीन रखें - मॉडरेटर

You might also like...

प्रसून भाई, साला पैसा तो लगा, लेकिन दिल था कि फिर बहल गया, जाँ थी कि फिर संभल गई!

Read More →
Page Reader Press Enter to Read Page Content Out Loud Press Enter to Pause or Restart Reading Page Content Out Loud Press Enter to Stop Reading Page Content Out Loud Screen Reader Support
%d bloggers like this: