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वीडियोकॉन घोटाला: धूत ने चंदा कोचर के साथ मिलकर आईसीआईसीआई बैंक को चूना लगाया..

By   /  March 29, 2018  /  No Comments

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जो लोग पीएसयू बैंको के निजीकरण के पक्ष में माहौल बना रहे थे उन्हें आज आईसीआईसीआई बैंक के सीईओ चंदा कोचर पर भ्रष्टाचार और परिवारवाद के सनसनीखेज आरोप को जरूर देखना चाहिए. खेल बहुत सिम्पल है..

-गिरीश मालवीय||

दिसंबर 2008 में वीडियोकॉन समूह के मुखिया वेणुगोपाल धूत , चंदा कोचर के पति दीपक कोचर और उनके दो रिश्तेदारों के साथ मिलकर कंपनी खड़ी करते हैं और फिर फिर इस कंपनी को 64 करोड़ का लोन वेणुगोपाल धूत की कम्पनी देती है. बाद में मात्र नौ लाख रुपये में कंपनी दीपक कोचर के हवाले कर दी जाती हैं.

जो बात सबसे ज्यादा हैरान करती है वो ये हैं कि दीपक कोचर को इस कंपनी का ट्रांसफर वेणुगोपाल द्वारा आईसीआईसीआई बैंक की तरफ से वीडियोकॉन ग्रुप को 3,250 करोड़ रुपये का लोन मिलने के छह महीने के बाद किया जाता है.

वेणुगोपाल धूर्त द्वारा इस लोन का 86 प्रतिशत यानी लगभग 2,810 करोड़ रुपये की राशि वापस जमा नही कराई जाती और बाद में 2017 में वीडियोकॉन के अकाउंट को चन्दा कोचर अपने प्रभाव का इस्तेमाल करते हुए एनपीए घोषित करवा देती है.

अब सबसे घटिया बात यह है कि आईसीआईसीआई बैंक इतना ओपन ओर शट केस होने के बावजूद चन्दा कोचर का बचाव कर रहा है.

मीडिया भी चन्दा कोचर का बचाव वाले बयान बताने में अधिक इंटरेस्ट दिखा रहा है इस घोटाले को ‘स्वीट डील’ कहा जा रहा है, मीडिया की गिरावट का अंदाजा आप इस से लगा लीजिए कि पहले चन्दा कोचर का बचाव वाला बयान सामने आता है उसके 12 घण्टे बाद मीडिया बताता है कि घोटाला क्या है और कैसे किया गया, लेकिन जब पीएसयू बैंक की बारी आती है तो मीडिया बहुत आक्रामक तेवर अपनाता है.

चलते चलते एक ओर तथ्य जानते चलिए कि चन्दा कोचर मैडम ने आईसीआईसीआई बैंक से गीतांजलि जेम्स के चोकसी को 1,000 करोड़ रुपए भी दिलवाए थे इन्हें पिछले हफ्ते सीबीआई ने पूछताछ के लिए बुलाया था और चन्दा कोचर ओर दीपक कोचर की बेटी आरती की शादी अंबानी के करीबी से हुई हैं.

चन्दा कोचर के दामाद आदित्य काजी के पिता समीर काजी और मां राधिका को अंबानी परिवार के करीबी माना जाता है.  आदित्य काजी रिलायंस जिओ इन्फोकॉम में, और आरती भी रिलायंस में ही नौकरी कर रही है.

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About the author

मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.

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