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प्रसून भाई, साला पैसा तो लगा, लेकिन दिल था कि फिर बहल गया, जाँ थी कि फिर संभल गई!

By   /  April 19, 2018  /  No Comments

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-त्रिभुवन ||
वह लंदन से पत्र लिख रहा था।

प्रसून भाई, कॉमनवेल्थ हेड्स ऑफ़ गवर्नमेंट मीटिंग (चोगम) सम्मेलन का इस तरह फ़ायदा उठवाने के लिए तुम्हें अपने हृदय तल से कितना साधुवाद दूं! मेरे पास शब्द नहीं हैं। मेरे यार तुमने तो कमाल कर दिया। साला मैं तो कच्ची कैरियों को आम बताकर बेचने में उस्ताद था, तुमने तो यार गुठलियां की गुठलियां ही अल्फ़ांज़ो बताकर टिका दीं! मान गए गुरू!

प्रसून, तुम्हारी वो एक कविता है ना….शर्म आ रही है ना! यार इस वक़्त मुझे बहुत याद आ रही है। लेकिन शीर्षक के बाद ऐसा लगता है कि यह कविता इसी पंक्ति पर ख़त्म हो जानी चाहिए। तुमने वेस्टमिंस्टर के सेंट्रल हॉल से जिस तरह लंदन में बैठे लाेगों के माथे पर तिलक लगवाया और उनके दिमाग़ों का जिस तरह मुरब्बा बनाया, वह कमाल की अदा थी। आैर ये तुम जानते ही हो कि ये सब वे प्रवासी थे, जो अंगरेज़ के वापस चले जाने के बाद हिन्दुस्तान में अपनी रूह को ग़मज़दा देखकर उनके पीछे-पीछे चले गए थे।

मुझे इस वक़्त वो पाकिस्तानी (हां-हां, वह घटिया मुल्क़, जैसा कि तुमने एक सवाल पूछकर साबित भी किया कि हमने कैसे सर्जिकल स्ट्राइक करके क़ीमा बना दिया) शायर फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ का शेर याद आ रहा है : शाम-ए-फ़िराक़ अब न पूछ आई और आ के टल गई दिल था कि फिर बहल गया जाँ थी कि फिर सँभल गई! सच में उस्ताद, पैसा तो लगा, लेकिन मज़ा आ गया। ये जो आरिफ़ा-वारिफा, उन्नाव-वुन्नाव, नोटबंदी-ओटबंदी जैसे वाहियात से मामलों के कारण विपक्ष वाले जो हालात ख़राब कर रहे थे ना, उनसे कुछ सांस मिल गई।

सच कहता हूं, कई दिन से साला दिमाग का दही हो रहा था तुमने जैसे बज़्म-ए-ख़याल में हुस्न की शमां सी जला दी। क़माल हो या क़माल। फ़िल्मी गीतकारों के इतिहास में आज तक जो कुछ ग़ुलज़ार और जावेद अख़्तर जैसे लोग सोच भी नहीं पाए, तुमने तो उससे आगे भी नए जहां तलाश लिये। सच में मैकेन एरिकसन ने तुम्हारी प्रतिभा को ठीक ही पहचाना।

प्रसून यार, अपनी तबियत प्रसन्न हो गई। दर्द जितना भी था, चांद बनकर चमक उठा। वो हिज़्र की रातों की सी बेचैनी को तुमने धो-पौंछ दिया। मैं लंदन में सुबह उठा तो हृदय गदगद हो गया। अप्रैल की ये सुहानी सुबह मचल-मचलकर महक-महक कर मुझे बांहों में भर रही थी। तुमने तो मेरे यार सारे हालात ही बदल दिए। आज तो एक नई सुबह थी और नई सबा थी।

वो क़मीना पत्रकार तो इसे ‘अवेक इन लंदन, अनअवेयर इन इंडिया’ नाम देकर मज़ाक उड़ा रहा था, लेकिन तूने प्रसून सारे पैसे वसूल करवा दिए। मैं इतना खुश हूं कि बयान नहीं कर सकता। क्या-क्या बुलवा दिया तुमने मुझसे। मेरी सरकार की ख़ूब आलोचना की जानी चाहिए। आख़िर हम लोकतंत्र में रहते हैं। मैं भी आप जैसा ही आदमी हूं और मुझ में भी वही कमियां हो सकती हैं, जो आप में हैं। क्या रे यार। तूने तो परेश रावल को भी पीछे छोड़ दिया। क्या खूब तो प्लाॅट, क़माल स्टोरी, म्युजिक और शानदार स्क्रीनप्ले! ग़ज़ब बंदे हो यार। कहां तो शेख़ साहब के इक़राम में आज तक जो शय हराम थी, उसी को तुमने राहते-जां बना डाला। तुमने यार जो पब्लिक रिलेशंस की टर्म को जर्नलिज्म और पॉलिटक्स के जिस हॉट डॉग में बदला है ना, वह सच में संजीव कपूर जैसे लोग भी कुछ नहीं कर सकते। हां, इससे याद आया, तुम अब पब्लिक रिलेशंस और पाेएट्री का कोई फ्यूजन करके सैफ्रॉन चिल्ली रेस्टॉरेंट भी चला सकते हो!

प्रसून, तुमने किस तरह सबको एक साथ कैसे-कैसे साधा। मैं तो मन ही मन हंस-हंसकर लोटपाेट हो रहा था कि तुमने एक गुजराती को चूसी हुई गुठली दी और वह आंखों में आंसू भरकर उसे केसर आम समझकर ले गया। और वह तो और भी कमाल था। वो कर्नाटक वाला तो गुठली को तोतापुरी समझकर ही चूसता-चूसता सम्मेलन से बाहर निकला। ये आम की गुठलियों का इतना शानदार प्रयोग तुमने कहां सीखा मित्र? वो हिमाचल वाले को तुमने जैसे ही गुठली दी, मुझे लगा एक बार कि ये तो वॉमिट कर देगा, लेकिन क्या देखता हूं, वह तो चोसा समझकर लपालप चूसने लगा। और यार वो यूपी वाले दोनों बुड्‌ढ़े तो गुठलियों को ऐसे बटोर ले गए जैसे लंगड़े और दशहरी की ताज़ा कटी फांकें हों। मुझे तो वो बंगाली और महाराष्ट्रियन पर हंसी आ रही है। दोनों भाई गुठलियों को अल्फ़ांजों और हिमसागर समझकर टूट पड़े। वो आंध्र वाला भाई तो बची-खुची गुठलियों को बंगनपल्ली समझकर ही फ़िदा था! यार, प्रसून तुम वाकई में भारत रत्न हो! अगली बार अपनी सरकार आ गई तो अपना ये वादा रहा कि तेरे को भारत-रत्न पक्का! बस तू मेरे लिए इस देश के हर मतदाता को भाग मिल्खा भाग की तरह ईवीएम की तरफ दौड़ाता रह! दोस्त, तू ही है अब। तू मेरी पार्टी के किसी बंदे के दिल को लहू कर या किसी और का, या अपना ही कर, लेकिन मेरा गरेबाँ तो रफ़ू कर!

तुुम्हारा
मैं

…और वहीं कहीं फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ या पता नहीं किसी और की आत्मा भी भटक रही थी। वह गुनगुना रही थी : बिखरी इक बार तो हाथ आई है कब मौज-ए-शमीम, दिल से निकली है तो कब लब पे फ़ुग़ाँ ठहरी है!

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