Loading...
You are here:  Home  >  दुनियां  >  देश  >  Current Article

औरतें, ‘व्यभिचार’ परिवार,नैतिकता और समाज

By   /  September 28, 2018  /  No Comments

    Print       Email
इस खबर को अपने मित्रों से साझा करें..

-मणिमाला||

भारतीय दंड संहिता की धारा 497 पर आए सुप्रीम कोर्ट फैसले के बाद कुछ लोगों को लग रहा है कि हर औरत व्यभिचारी हुई जा रही है. समाज अनैतिकता के गर्त में गिरा जा रहा है. सवाल उठ रहे हैं कि अब परिवार का क्या होगा? बच्चों का क्या होगा? कुछ लोग तो इतने भयभीत हैं कि पूछ रहे हैं कि इंसान और जानवर में कोई फर्क भी रह जाएगा या नहीं? ऐसा लग रहा है जैसे इस निर्णय ने स्त्रियों को व्यभिचार की खुली छूट दे दी हो। ऐसा जैसा इस कानून ने ही हर औरत को व्यभिचारी होने से रोका हुआ था वर्ना हर स्त्री व्यभिचारी होने को मचल रही हो.
जबकि भारतीय दंड संहिता की इस धारा में औरत न गुनाहगार थी, न ही पीड़ित. वह अस्तित्वविहीन थी. ना उसकी कोई इच्छा थी, न उसकी कोई पीड़ा थी, न उसका कोई दर्द था, न कोई सहमति/असहमति थी, न कोई फैसला. वह थी ही नहीं. जो कुछ था, पुरुष था, पुरुष का था. रक्षक भी वही, मालिक भी वही, पीड़ित भी वही, अपराधी भी वही. 497 की व्यवस्था थी कि अगर किसी मर्द ने किसी शादीशुदा औरत से उसके पति की सहमति बिना सेक्स किया तो वह मर्द अडल्ट्री (व्यभिचार) के जुर्म में दोषी होगा। उसे जुर्माना और अधिकतम पांच साल जेल में से कोई एक या फिर दोनों हो सकता था.

यह क़ानून शादीशुदा स्त्री को उसके पति की सम्पत्ति मानता रहा है। यह पति या पत्नी के आचरण को आपराधिक घोषित नहीं करता, बल्कि उस पुरुष को आपराधिक घोषित करता है जिसने किसी शादीशुदा स्त्री के साथ सेक्स किया हो, वह भी उसके पति कि सहमति के बगैर। तो, पति-पत्नी एक-दूसरे पर एफ़आईआर नहीं कर सकते, कि तुम मेरी मर्ज़ी बिना किसी और के साथ सोई/सोए. पत्नी की हालत तो इस कानून में इतनी पतली है कि वो न तो अपने पति और न ही अपने पति की प्रेमिका के ख़िलाफ़ एफ़आईआर कर सकती थी. बस पति को ही यह अधिकार था कि वह अपनी पत्नी से सम्बन्ध बनाने वाले के ख़िलाफ़ शिकायत दर्ज कराए कि तुमने मेरी मर्ज़ी के बिना मेरी पत्नी (संपत्ति) के साथ सेक्स किया (क़ब्ज़ा किया)। मतलब यह कि इस कानून को न शादी की पवित्रता से मतलब था, न पारिवारिक दायित्व से, न स्त्री की सहमति से मतलब था और ना ही संबंधों में नैतिकता और परस्पर वफ़ादारी से. बस पति की सहमति होनी चाहिए कि उसकी पत्नी किसी और के साथ सोये या ना सोये। एक तरह से पति कि पूरी परमेश्वरगिरी. कई मामलों में तो इसी परमेश्वरगिरी कि आड़ में अपनी पत्नियों को कई किस्म का फ़ायदा उठाने के लिया इस्तेमाल भी किया गया है, और कुछेक ने वैश्यावृति तक करवाई है. पति कि मर्ज़ी वह अपनी सम्पति (पत्नी) का चाहे जैसे इस्तेमाल करे. हाँलाकि इस तरह के अपराध कल भी अपराध की ही श्रेणी में थे और आज भी हैं.

इस निर्णय के आ जाने के बाद भी व्याभिचारी पति/पत्नी के ख़िलाफ़ क़दम उठा सकते हैं। पहले भी दीवानी (सिवल) उपाय थे, अब भी हैं। व्याभिचार घरेलू हिंसा के अंतर्गत आता है। कोई भी पीड़ित पत्नी घरेलू हिंसा क़ानून के अंतर्गत याचिका डाल सकती है। इसके अलावा पति या पत्नी ऐसे व्याभिचारी पार्ट्नर से तलाक ले सकते हैं। तलाक़ का एक आधार अडल्ट्री या व्याभिचार भी होता है। पहले भी आप अपने धोखेबाज़ पार्ट्नर से तलाक़ ले सकते थे, अब भी ले सकते हैं। सच है, जो आपके प्रति वफ़ादार न हुआ, अपना-अपना हम बिस्तर किसी और को चुन लिया तो उसके साथ रहना ही क्यों? अपने-अपने रास्ते जाइए, ख़ुश रहिए।

इससे पहले भी कई बार इस धारा के खिलाफ़ अदालत में आवाज़ उठाने की कोशिश हुई थी, पर अदालत ने इसकी वैधता पर कोई सवाल उठाना लाज़िमी नहीं समझा था. तर्क था परिवार और संबंधों का बचाव. पिछले साल जब केरल अप्रवासी जोजेफ़ शाइन ने 497 को अदालत में यह कह कर चुनौती दी थी कि यह पुरुष विरोधी है, तब अदालत ने फिर एक बार बहस के लिए स्वीकार किया. हांलाकि अदालत ने इसे पुरुष विरोधी नहीं, औरत विरोधी माना और असंवैधानिक बताया. २ अगस्त को अदालत ने कहा था कि पहली नज़र में तो यह कानूनी प्रावधान पुरुष विरोधी और महिलाओं को सुरक्षा देने वाला लगता है पर वास्तव में यह महिला विरोधी है. अजीब सी स्थिति है कि अगर वह पति की सहमति से किसी के साथ सम्बन्ध बनती है तो जायज है पर सहमति के बिना बनती है तो व्यभिचार है. शादी में औरत आदमी दोनों बराबर के भागीदार हैं और दोनों कि बराबर ज़िम्मेदारी बनती है संबंधों और संबंधों कि गरिमा बनाए रखने की . औरतों पर शादी को बनाये-बचाए रखने की अतिरिक्त ज़िम्मेदारी क्यों होनी चाहिए?

सच्चाई तो यह है कि स्त्री पराए मर्द से स्वेच्छा से यौन संबंध बनाए, यह कभी भी औरत का अपराध नहीं था। यह उस मर्द का अपराध था जिसने किसी की पत्नी के साथ यौन संबंध स्थापित किया। इसकी शिकायत वही पुरुष कर सकता था जिस की पत्नी के साथ यह संबंध बनाया गया था। मामला पुरुषों के बीच था स्त्री तो मात्र संपत्ति थी। सुप्रीम कोर्ट के निर्णय से एक पति का दूसरे पुरुष के प्रति शिकायत करने का अधिकार समाप्त हुआ है और दूसरा पुरुष दंड से बच गया है। स्त्री तो मुफ्त में बदनाम हो रही है। संपत्ति है ना? है कि नहीं? ऐसी संपत्ति जो किसी के छूने मात्र से अपवित्र हो जाती है लेकिन पर्दे में पुरुषों का परस्त्री सम्बन्ध बना रहता है. कोई उंगली उठाने वाला नहीं.

Facebook Comments

इस खबर को अपने मित्रों से साझा करें..
    Print       Email

About the author

मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.

पाठक चाहे आलेखों से सहमत हों या असहमत, किसी भी लेख पर टिप्पणी करने को स्वतंत्र हैं. हम उन टिप्पणियों को बिना किसी भेद-भाव के निडरता से प्रकाशित भी करते हैं चाहे वह हमारी आलोचना ही क्यों न हो. आपसे अनुरोध है कि टिप्पणियों की भाषा संयत एवं शालीन रखें - मॉडरेटर

This site uses Akismet to reduce spam. Learn how your comment data is processed.

You might also like...

नरेंद्र मोदी दिवालिया होने के कगार पर खड़े अनिल अम्बानी का कौन सा क़र्ज़ा उतार रहे हैं..

Read More →
Page Reader Press Enter to Read Page Content Out Loud Press Enter to Pause or Restart Reading Page Content Out Loud Press Enter to Stop Reading Page Content Out Loud Screen Reader Support
%d bloggers like this: