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यूपी का अनाज़ घोटाला नचाता है माया मुलायम को केंद्र के इशारों पर..

By   /  October 4, 2018  /  No Comments

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पंकज चतुर्वेदी॥

उत्तर प्रदेश में सार्वजनिक वितरण प्रणाली के अनाज का घोटाला असल में देश के सबसे बड़े घोटालों में से एक है, सालों तक पचास जिलों से सार्वजानिक वितरण प्रणाली का अनाज चोरी कर विदेश बेचा जाता रहा . यह अकेले घोटाला मात्र नहीं है- यह राज्य की सियासत का सबसे बड़ा जमूरा भी है , जिसके इशारे पर मुलायम- मायावती और कई अन्य नेता नाचते रहते हैं .

केंद्र सरकार की जनकल्याणकारी योजनाओं के तहत गरीबों व गरीबी की रेखा से नीेचे रहने वालों के लिए सस्ती दर पर अनाज वितरित करने की कई योजनाएं राज्यों में संचालित होती हैं। ऐसी ही अन्तोदय, जवाहर रोजगार योजना, स्कूलों में बच्चों को मिडडे मील, बीपीएल कार्ड वालों को वितरण आदि के लिए सन 2001 से 2007 तक उत्तरप्रदेश को भेजे गए अनाज की अधिकांश हिस्सा गोदामों से सीधे बाजार में बेच दिया गया। घोटालेबाजों की हिम्मत और पहंुच तो देखो कि कई-कई रेलवे की मालगाडि़यां बाकायदा बुक की गईं और अनाज को बांग्लादेश् व नेपाल के सीमावर्ती जिलों तक ढोया गया और वहां से बाकायदा ट्रकों में लाद कर बाहर भेज दिया गया। खबर तो यह भी है कि कुछ लाख टन अनाज तो पानी के जहाजों से सुदूर अफ्रीकी देशों गया। ऐसा नहीं कि सरकारों को मालूम नहीं था कि इतना बड़ा घोटाला हो रहा है, फिर भी पूरे सात साल तक सबकुछ चलता रहा। अभी तक इस मामले में पांच हजार एफआईआर दर्ज हो चुकी हैं। हालंाकि कानून के जानकार कहते हैं कि इसे इतना विस्तार इसी लिए दिया गया कि कभी इसका ओर-छोर हाथ में ही ना आए।

नवंबर-2004 में उ.प्र. के खाद्य-आपूर्ति विभाग के सचिव ने बांग्ला देश व अन्य देशों को भेजे जा रहे अनाज के बारे में जानकारी मांगी। दिसंबर-2004 में रेलवे ने उन जिलों व स्टेशनों की सूची मुहैया करवाई जहां से अनाज बांग्ला देश भेजने के लिए विशेष गाडि़यां रवाना होने वाली थीं। वर्श 2005 में लखीमपुरी खीरी के कलेक्टर सहित कई अन्य अफसरों की सूची सरकार को मिली, जिनकी भूमिका अनाज घोटाले मंें थी। सन 2006 में तत्कालीन मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव ने ई ओ डब्लू को इसकी जांच सौंपी थी और तब अकेले बलिया जिले में 50 मुकदमें दर्ज हुए।

राज्य में सरकार बदली व जून-2007 में मायावती ने जांच का काम स्पेषल टास्क फोर्स को सौंपा, जिसकी जांच के दायरे में राज्य के 54 जिले आए और तब कोई पांच हजार मुकदमें कायम किए गए थे। सितंबर-2007 में राज्य सरकार ने घोटाले की बात स्वीकार की और दिसंबर-2007 में मामला सीबीआई को सौंपा गया। पता नहीं क्यों सीबीआई जांच में हील-हवाला करती रही और उसने महज तीन जिलों में जांच का काम किया।

सन 2010 में इस पर एक जनहित याचिका सुप्रीम कोर्ट में दायर की गई, जिसे बाद में हाई कोर्ट, इलाहबाद भेज दिया गया। 03 दिसंबर 2010 को लखनऊ बैंच ने जांच को छह महीने इसे पूरा करने के आदेश दिए लेकिन अब आठ साल हो जाएंगे, कहीं कोई सुगबुगाहट नहीं है। विडंबना है कि जांच एजेंसियां अदालत को सूचित करती रहीं कि यह घोटाला इतना व्यापक है कि उसकी जांच के लिए उनके पास मशीनरी नहीं है। इसमें तीस हजार मुकदमें और कई हजार लोगों की गिरफ्तारी करनी होगी। इसके लिए जांच एजेंसी के पास ना तो स्टाफ है और ना ही दस्तावेज एकत्र करने लायक व्यवस्था।

प्रारंभिक जांच में मालूम चला है कि राज्य के कम से कम 31 जिलों में बीते कई सालों से यह नियोजित अपराध चल रहा था। सरकार कागज भर रही थी कि इतने लाख गरीबों को इतने लाख टन अनाज बांटा गया, जबकि असली हितग्राही खाली पेट इस बात से बेखबर थे कि सरकार ने उनके लिए कुछ किया भी है। जब हाई कोर्ट ने आदेश दिया तो सीबीआई ने अनमने मन से छह जिलों में कुछ छापे मारे, कुछ स्थानीय स्तर के नेताओं  के नाम उछले।

फिर अप्रैल-2011 में राज्य सरकार सुप्रीम कोर्ट पहुंच गई और हाई कोर्ट के उस आदेश को चुनौती दे डाली जिसमें सीबीआई जांच का निर्देश दिया गया था। जाहिर है कि मामला लटक गया, या यों कहें कि लटका दिया गया। यह कई लोग जानते हें कि इस अरबों -अरब का हिसाब-किताब किसी “राजा” के पास रहा है, सो वह चाहे डी एस पी की ह्त्या कर दे, बाल भी बांका नहीं होता, रंग बदलने के पीछे का गणित कहीं यह तो नहीं ?????

यह भी खबर हे कि वही माल आजकल फर्जी ठेकेदारों के नाम से ऊ प्र की जेलों में खपाया जा रहा है . अब इतना फंसोगे तो “मुलायम” तो होना ही होगा . मसला “माया” का जो है .चाहे सत्ता चली जाए लेकिन जेल ना जाना पड़े.

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About the author

मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.

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