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रियाज़उद्दीन शेख़ की विदाई के मायने..

By   /  May 4, 2019  /  No Comments

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अनिल शुक्ल॥

रियाज़उद्दीन शेख़ के नाम से ‘मीडिया दरबार’ के पुरस्कारों की घोषणा स्वागत योग्य है। सुझाव है कि इसके लिए ऐसे युवाओं को चुना जाय जो छोटे जनपदों में रहकर ईमानदार और निर्भीक पत्रकारिता की मशाल जलाने की कोशिश में मशगूल हैं। ज़ाहिर है ‘क़लम’ को भोथरा बनाये जाने के राज्यगत आतंक के इस ख़ौफ़नाक युग में चिकने पात वाले ऐसे होनहारों को ढूंढ़ पाना थोड़ा मुश्किल होगा गोकि नामुमकिन नहीं। इसी के साथ पुरस्कार राशि को बढ़ाने के अनुरोध को भी दर्ज कर लिया जाय। यह भी थोड़ा मुश्किल प्रयास होगा लेकिन सुरेंद्र ग्रोवर की क्षमताओं से वाक़िफ़ और रियाज़ के चाहने वालों की लम्बी लिस्ट से परिचित जानते हैं कि नामुमकिन यह भी नहीं है।
रियाज़ की पत्रकारिता ज़रूर राजधानी में सुर्ख़रू हुई लेकिन उनकी पैदाइश (11 मई 1955) और शुरुआती तालीम का आगाज़ भीलवाड़ा ज़िले के एक छोटे से गांव बनेड़ा में हुआ था। भीलवाड़ा के ही आसींद क़स्बे के निवासी उनके पिता बनेड़ा ग्राम पंचायत के प्राथमिक विद्यालय में शिक्षक थे। रियाज़ अपने 7 भाई-बहनों में सबसे बड़े थे। उनका कैशोर्य और युवा आसींद में विकसित हुआ। स्नातक की पढ़ाई उन्होंने भीलवाड़ा से की और यहीं उन्हें लेखन का चस्का लगा। छात्र राजनीति में भी उनकी रूचि थी। पिता की शिक्षक बनाने की कोशिशों के बरख़िलाफ़ वह भीलवाड़ा और अजमेर के स्थानीय अख़बारों में लिखा पढ़ी करने लगे। उन्होंने खुद का अख़बार ‘लोकमत’ भी निकला और कुछ समय के लिए ‘राजस्थान पत्रिका’ से भी जुड़े।
सन 1981 में उनका चयन ‘जन संपर्क विभाग’ के सहायक जन संपर्क अधिकारी के रूप में हो गया लेकिन जल्द ही खुशामद से भरी सरकारी प्रेस विज्ञप्तियां बनाने में उन्हें गहरी ऊब होने लगी। छोटे स्तर पर ही सही, उन्हें उखाड़-पछाड़ की पत्रकारिता का चस्का लग चुका था। इस बीच उनके पिता ने आसींद के पटवारी की बेटी ख़ुर्शीदा के साथ उनका निकाह करवा दिया। दाम्पत्य का बोझ सिर पर लद जाने का नतीजा था कि वह चाहकर भी सरकारी नौकरी नहीं छोड़ पा रहे थे।
इसी बीच 1983 में ‘इंडियन एक्सप्रेस’ समूह ने अपने नए हिंदी दैनिक प्रकाशन ‘जनसत्ता’ के लिए पत्रकारों के चयन का विज्ञापन निकला। संपादक के रूप में प्रभाष जोशी ऐसे युवाओं की टोली बनाने की जुगत में थे जो थोड़ा बाग़ी फितरत के हों, ‘धांधाखोरी’ का खून जिनकी दाढ़ में न लगा हो और पत्रकारिता के पेशे को जो नौकरी के अतिरिक्त भी ‘कुछ’ समझते हों। रियाज़ुद्दीन शेख़ को बड़ा ताज्जुब हुआ जब हरिशंकर व्यास ने उन्हें यह इत्तलाह दी कि वह ‘जनसत्ता’ के राजस्थान संवाददाता नियुक्त हो गए हैं। अपना बोरिया बिस्तर लेकर रियाज़ जयपुर आ गए।
एक तो अपनी चाहत और दूसरा ‘जनसत्ता’ के बाग़ी तेवरों की डिमांड। आते ही रियाज़ ने राज्य सरकार के खिलाफ मोर्चा संभाला।
सांस्कृतिक रूप से सामंती संस्कारों में आकंठ डूबे राजस्थान की तत्कालीन पत्रकारिता भी ‘माखन-मिसरी’ में लिपटी थी और एकाध अपवादों को छोड़कर जयपुर के छोटे-बड़े पत्रकारों में ‘खुशामदी’ बनने की होड़ मची रहती थी। रियाज़ की दोधारी तलवार वाली शासन-प्रशासन की पोल खोलती रिपोर्टें और जयपुर सहित पूरे राज्य में ‘जनसत्ता’ का तेजी से बढ़ता सर्कुलेशन का ग्राफ! स्थानीय पत्रकारों का बड़ा हिस्सा रियाज़ से चिढ़ता था। वह उनकी इस चिढ़न से भली-भांति परिचित थे इसलिए किसी को ज़्यादा ‘भाव’ भी नहीं देते थे। वह राज्य में शिवचरण माथुर की हूकूमकत का दौर तह और उनकी सरकार भ्रष्टाचार में आकंठ डूबी थी। रियाज़ की तोप हर दिन मुख्यमंत्री के खिलाफ आग उगलती रहती थी।
​’रविवार’ के संवाददाता की हैसियत से सन 85 में मैं जब जयपुर पहुंचा तो एक सी फितरत लगने के चलते हम जल्द ही दोस्त बन गये और यह दोस्ती उनकी विदाई की बेला तक चली। आज के युवा पत्रकारों को यह समझाना बड़ा मुश्किल है कि कोई संवाददाता या संपादक जब किसी हुकूमत के ख़िलाफ़ मोर्चा खोलता है तो यह उसकी कोई निजी ‘खुन्नस’ का सबब नहीं होता। दरअसल सारी दुनिया में पत्रकारिता का मूल धर्म ही ‘विपक्ष’ का लाउड स्पीकर बनना रहा है। मैं जब वहां पहुंचा तो कुछ दिन बाद ही मुख्यमंत्री की गद्दी पर हरिदेव जोशी क़ाबिज़ हो गए थे। शिवचरण माथुर की तरफ से हटकर रियाज़ की तोप अब जोशी जी की तरफ घूम गयी। रियाज़ के शत्रुओं की तादाद बढ़ गयी। हालाँकि शिवचरण माथुर अब उनके ‘मित्र’ और ख़बरों के ‘सोर्स’ बन गए। उधर ‘नवभारत टाइम्स’ और ‘टाइम्स ऑफ़ इंडिया’ के जयपुर प्रकाशन शुरू होने से बाहर से आने वाले पत्रकारों की तादाद बढ़ गई। इनमें उनके कई नए दोस्त बने। कोई भी पत्रकार बाहरी हमलों से नहीं टूटता। उसे हराने वाली शक्तियां उसे भीतर से ज़ख़्मी करने की रणनीति बनती हैं और सीधा-सादा पत्रकार इन भीतरी शक्तियों का मुक़ाबला नहीं कर पाता और टूट कर बिखर जाता है। रियाज़ के साथ भी यही हुआ। सन 87 में ‘जनसत्ता’ प्रबंधन के वह कोपभाजन हुए। मैं स्थान्तरित हो कर लखनऊ चला गया था जब मैंने सुना कि उन्हें कोटा स्थान्तरित कर दिया गया जो अभी तक ‘स्टिंगर’ का पद था। तिकड़मबाज़ियों से दूर रहने वाले रियाज़ को ये बड़ा अपमानजनक लगा। वह कुछ समय के लिए कोटा गए लेकिन फिर उन्होंने त्यागपत्र दे दिया। वह जयपुर लौट आये। नयी नौकरी मिल नहीं रही थी, वह फ़ाक़ामस्ती से परेशान रहने लगे। पत्नी और 4 बच्चों का पालन पोषण। उन पर गहरा आर्थिक दबाव था। यहीं से उनका भटकाव शुरू हुआ।
वह सब जगह से परेशान होकर सियासी गलियारों में चहलकदमी करने लग गए। यहाँ उन्हें कुछ हासिल नहीं होना था। न हुआ। 89 में वह ‘संडे ऑब्ज़र्वर ‘ के संवाददाता बने और अख़बार के के बंद होने तक वहीँ पत्रकारिता करते रहे। एक बार वह और उनका परिवार फिर सड़क पर थे। उन्होंने कांग्रेस के मुख्यालय में प्रवक्ता की नौकरी कर ली। 2 साल पहले हरिशंकर व्यास के नए अख़बार ‘नया इण्डिया’ में उन्हें फिर नौकरी मिली। इस बार उनके क़लम की धार वसुंधरा राजे के खिलाफ चल निकली। मृत्युपर्यन्त वह वहीँ कार्यरत थे।
रियाज़ आसींद जैसे छोटे से क़स्बे से उठकर राजस्थान में निर्भीक पत्रकारिता की जड़ें ज़माने की कोशिश में जूझते पत्रकार का नाम था। हिंदी से उन्हें खासा प्यार था। वह अपने समय में अपने प्रदेश में हिंदी पत्रकारिता करने अकेले मुसलमान थे। नमाज़ी होने के बावजूद राजनीति और पत्रकारिता में धार्मिकता और साम्प्रदायिकता के वह सख्त खिलाफ थे। आम संवाददाताओं की भीड़ से अलग दफ्तर को भेजे जाने वाले उनके न्यूज़ डिस्पैच शानदार कॉपी के मालिक होते थे जिसके साथ डेस्क को ज़्यादा काट छांट की दरकार नहीं होती थी। ख़बरों को ताड़ने की कला के वह उस्ताद थे। वह 24 घंटे, सोते-जागते पत्रकारिता में उलझे रहते थे। पत्रकारिता उनके लिए ‘एडिक्शन’ था। निर्भीक पत्रकार रियाज़ुद्दीन शेख की धारदार पत्रकारिता से नाखुश जयपुर के कुछ लोग बाद के दौर में उन पर राजनीतिक महत्वाकांक्षी होने का आरोप मढ़ते रहे। जो लोग उन्हें नज़दीक से जानते हैं वे भली भांति समझते हैं कि रियाज़ को राजनीति का चाव तो था लेकिन उनकी पहली प्राथमिकता पत्रकारिता थी और जब जब उन्हें क़लम चलने के मौके मिले, उन्होंने कभी सियासत की तरफ झाँका भी नहीं। वहां वह मजबूरी में तब गए जब उनका परिवार फाकामस्ती को अभिशप्त था और अपने छोटे छोटे बच्चों की भुखमरी को वह देख नहीं पाए। उनकी तुलना अरुण शौरी, एम० जे० अकबर, उदयन शर्मा और राजीव शुक्ल जैसे लोगों से करना बेमानी है जिन्होंने पत्रकारिता को सेतु बनाकर राजनीति को साधा और पत्रकारिता को सियासत के अँगने में गिरवी रख दिया। ‘मीडिया दरबार’ का यह पुरस्कार युवा पत्रकारों की नयी पीढ़ी को रियाज़उद्दीन शेख़ जैसों का मर्म जानने में मदद करेगा, ऐसा मुझे उम्मीद है। आमीन। ​ अलविदा रियाज़!

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  • Published: 2 weeks ago on May 4, 2019
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  • Last Modified: May 4, 2019 @ 8:49 pm
  • Filed Under: मीडिया

About the author

मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.

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