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मजीठिया मांगा तो भास्‍कर खुलेआम साइबर क्राइम पर उतर आया..

By   /  August 6, 2019  /  No Comments

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मजीठिया वेजबोर्ड अवार्ड मांगने वाले कर्मचारियों का जानी दुश्‍मन बन गया है दैनिक भास्‍कर। कर्मचारियों के उत्‍पीड़न – परेशान करने के तमाम उपक्रमों-तिकड़मों में ताजा कारनामा आपराधिक कार्यों का भी जुड़ गया है। भास्‍कर खुद को अपने जन्‍मकाल से ही कानून कायदे से ऊपर मानता रहा है, लेकिन अब तो सरेआम क्राइम करने पर उतर आया है। एकदम नया मामला चंडीगढ़ एडीशन में साइबर क्राइम का है। और इसे आजमाया है एचआर डिपार्टमेंट के सबसे दानिशमंद- संजीदे- कर्मठ- कुशल कर्मचारी सुधीर श्रीवास्‍तव के ऊपर। उनका कुसूर महज इतना है कि उन्‍होंने अपनी पगार मजीठिया वेजबोर्ड की संस्‍तुतियों के हिसाब से करवाने के लिए आवाज उठा दी। पहले तो उन्‍होंने अपने हाकिमों के समक्ष अपना वेतन बढ़ाने की डिमांड रखी। जब हाकिमों ने उनकी मांग को अनसुना कर दिया और साथ ही अनेक बेबुनियाद आरोपों का पिटारा उनके सिर पर पटक दिया तो उन्‍होंने इंसाफ के लिए वर्किंग जर्नलिस्‍ट एवं नॉन जर्नलिस्‍ट एक्‍ट के दफा 17 का सहारा लेते हुए लेबर कमिश्‍नर और लेबर कोर्ट का रुख कर लिया।

मैनेजमेंट, खासकर एचआर के मुखिया मनोज मेहता को जब पता चला कि सुधीर श्रीवास्‍तव ने इंसाफ के लिए अदालत का दरवाजा खटखटा दिया है तो उन्‍होंने आनन-फानन में अपने एक विभागीय अधिेकारी हरीश कुमार और एक कर्मचारी विजय कुमार की मदद से सुधीर का फर्जी इस्‍तीफा उनके ऑ‍फशियल मेल से भास्‍कर के आला अधिकारियों को भेज दिया। दरअसल सुधीर के सिस्‍टम और ऑफशियल मेल का पासवर्ड एक ही है, जिसकी जानकारी उनके साथ काम करने वाले सभी लोगों को थी। सुधीर ने लोकल से लेकर हेड ऑफि‍स तक के आईटी सेल को अनगिनत बार शिकायत की कि उनके सिस्‍टम और मेल का पासवर्ड अलग अलग दिया जाए, लेकिन इसकी कहीं भी और कभी भी सुनवाई नहीं हुई। सुधीर के ही सिस्‍टम से प्रिंटर व स्‍कैनर भी अटैच थे, इसीलिए सभी सहकर्मी उनके सिस्‍टम का बहुत ही अधिकार से खुला इस्‍तेमाल करते थे।

बहरहाल, इस साइबर फर्जीवाड़े के दिन यानी 20 जून को सुधीर शाम साढ़े 8 बजे हमेशा की तरह बॉयोमेटरिक यंत्र पर अंगूठा लगाकर घर के लिए निकल गए। उसके बाद एचआर प्रधान मनोज मेहता, हरीश कुमार और विजय कुमार ने अपनी क्रिमिनल करतूत को अंजाम देते हुए सुधीर का मेल खोलकर उनका फर्जी इस्‍तीफा लिखकर अपने भोपाल व दिल्‍ली के आकाओं की खिदमत में पेश कर दिया। अगले दिन 21 जून को सुधीर जब ड्यूटी के लिए भास्‍कर पहुंचे तो सिक्‍योरिटी गार्ड ने उन्‍हें गेट पर रोक लिया। कहने लगा कि आपको अंदर जाने की मनाही है। बाद में मनोज मेहता और हरीश कुमार बाहर गेस्‍ट रूम में आकर मातमपुर्सी के अंदाज में सुधीर से मिले। सहानुभूति का नाटक करते हुए कहने लगे, ‘अरे, तुमने तो इस्‍तीफा दे दिया है।‘ इतना सुनते ही सुधीर का माथा ठनका और कहा, ‘मैंने इस्‍तीफा कहां दिया है‘, अच्‍छा तो तुम लोगों ने मेरा मेल खोलकर इस्‍तीफा डाल दिया। ठीक है, कोई बात नहीं।

कहासुनी, नोक झोंक के बाद सुधीर खिन्‍न मन से घर चले गए और बाद में पुलिस केस कर दिया। मतलब दैनिक भास्‍कर के रहनुमाओं पर साइबर क्राइम का केस। पुलिस ने पिछले दिनों कई बार दैनिक भास्‍कर के चंडीगढ़ कार्यालय में सबूत खंगालने के लिए धावा बोला और छापेमारी की। पुलिस ने फुटेज मांगा तो मनोज मेहता, हरीश कुमार और विजय कुमार ने घटना की फुटेज न होने की बात कही। साथ ही बोल दिया कि घटना की फुटेज हेड ऑफि‍स भोपाल भेज दी गई है। पुलिस ने मनोज मेहता और हरीश कुमार को साइबर क्राइम थाने तलब किया। मेहता तो भागता-छिपता फि‍रता रहा लेकिन हरीश साइबर क्राइम थाने पहुंचा, जहां पुलिस ने तगड़ी पूछताछ की। फि‍र भी हरीश अपराध कबूल करने में ना-नुकुर करता रहा। हालांकि अभी तक की जानकारी के मुताबिक मेहता और हरीश का सूरत-ए-हाल अपराधी-क्रिमिनल का ही है। इसका प्रमाण है दैनिक भास्‍कर चंडीगढ़ के संपादक दीपक धीमान और भास्‍कर की क्राइम बीट देखने वाले संजीव महाजन की मनोज मेहता और हरीश कुमार को बचाने– महफूज रखने में गहरी रुचि और संलिप्‍तता-संलग्‍नता। संपादक धीमान के निर्देश पर महाजन ने मेहता व हरीश की हिफाजत में पूरी ताकत लगा दी है। महाजन ने एसएसपी से लेकर साइबर क्राइम थाने के इंचार्ज के चौखट के न जाने कितने चक्‍कर लगा डाले हैं। इस क्रम में महाजन ने अपने अखबारी रसूख-रुतबे-धौंस का बेहिसाब इस्‍तेमाल किया है और कर रहे हैं।

मतलब, जिस महाजन ने कभी खुद का मोबाइल चोरी होने पर एक तथाकथित चोर को पुलिस से बेरहमी से पिटवाया था, भास्‍कर कार्यालय का एक एसी चोरी हो जाने पर भास्‍कर के ही एक संबंधित कर्मचारी को पुलिस के डंडे खिलवाये थे, वही महाजन आज साइबर अपराधियों को बचाने में अपनी सारी ऊर्जा खपाए जा रहे हैं।  और उनके संरक्षक धीमान साहब, जो खुद को अखबार की सत्‍यता व विश्‍वसनीयता की प्रतिमूर्ति प्रदर्शित करते नहीं थकते, भास्‍कर के ही साइबर अपराधियों के पोषक-संरक्षक बने हुए हैं। धीमान के व्‍यक्तित्‍व से परिचित लोग हैरान इस मौजूदा घटनाक्रम से हैं।

साइबर पुलिस का डंडा चलना शुरू होते ही मनोज मेहता ने एचआर के एक नवधा मैनेजर पवन त्रिपाठी के दस्‍तखत से सुधीर श्रीवास्‍तव के खिलाफ पुलिस में एक कंप्‍लेंट दे दी। इस कंप्‍लेंट में बे सिर पैर के, बेबुनियाद आरोप लगाए गए, जिसकी ताईद पुलिस ने भी की। पुलिस ने साफ कहा कि ऐसे मामले का निपटारा पुलिस नहीं करती। यह मसला ऑफिस का है, वहीं निपटा लिया जाना चाहिए। खुद को फंसता देख पवन त्रिपाठी ज्‍वाइनिंग के 4–5 दिन बाद ही इस्‍तीफा देकर चलता बन गया। पुलिस त्रिपाठी को पूछताछ के लिए बुलाने की जुगत में लगी हुई है।

मौजूदा तस्‍वीर ये है कि टीकाधारी हरीश कुमार, संजीव महाजन का पैर छूकर थरथराते-डगमगाते पांव अपने आसन (कुर्सी) पर विराजमान होने का प्रयास कर रहे हैं। मनोज मेहता, धीमान साहब को साष्‍टांग करके अपना आशियाना बनाए- बचाए रखने का यत्‍न कर रहे हैं। लेकिन वरदहस्‍त, छत्रछाया, आशीष वचन अपराध का संजाल काट देगी, जानकार लोग इस पर यकीन नहीं करते। उनका यकीन यह है कि मानवद्रोही काम करने का परिणाम अंतत: बुरा ही होता है। और भास्‍कर में ऊंची कुर्सी पर बैठने वालों द्वारा किया गया साइबर अपराध कभी भी क्षम्‍य नहीं हो सकता। सजा तो मिलेगी ही। क्‍यों ठीक कह रहा हूं न।

इस्‍तीफे का फर्जीवाड़ा और साइबर क्राइम का उपरोक्‍त मामला मेसेज यह देता है कि मजीठिया पाने के लिए हमें ऐसे न जाने कितने गंभीर मोर्चों पर लड़ना जूझना पड़ेगा। लेकिन जब ठान लिया है कि मजीठिया लेना है, तो ऐसी कितनी भी बाधाएं, रुकावटे आएं, मालिकान व उनके कारिंदे चाहे कितनी भी बदमाशियां करें, मजीठिया लेकर रहेंगे। सुधीर श्रीवास्‍तव सरीखे लोग एक मिसाल हैं, एक प्रेरणा हैं।

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  • Published: 2 weeks ago on August 6, 2019
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  • Last Modified: August 6, 2019 @ 4:35 pm
  • Filed Under: मीडिया

About the author

मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.

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