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सारे मर्द पिले पड़े हैं दुष्कर्म के खिलाफ, खुद के भीतर कोई नहीं झाँकता..

By   /  December 1, 2019  /  No Comments

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हिना ताज़।।

दिल में तो नहीं था कि कुछ लिखूं.. क्यों नहीं था इसकी ठीक ठीक वजह समझ नहीं आती.. शायद फर्क पड़ने वाला पॉइंट लूज़ है.. और उसमे झोल कि वजह यह सारे वर्चुअल क्रंदन हैं.. क्या है ना कि हमदर्दियों से नहीं बदलाव अपने अंदर झाँकने से आते हैं.. दुःख से नहीं उसकी वजह जानने से आते हैं.. सच से आते हैं.. अब सच क्या है ? .. सिर्फ लिख भर देने के लिए नहीं लिख रही.. कल्पना कर नहीं लिख रही.. कुछ फैक्ट्स लिख रही हूं जिन्हें अपने आसपास देखा.. रेप की शिकार औरतों पर रोने वाला वो सच जो.. मुझे ऐसे दिखाई दिया अपनी वॉल पर..

वो सब लोग भी रेप पीड़िता के प्रति सहानुभूति प्रकट कर रहे हैं जो सोशल प्लेटफॉर्म्स के कई एडल्ट ग्रुप्स से जुड़े हैं और वहां परोसे जाने वाले छिछलन्दर कंटेंट की डाउनलोडिंग पर अपना ज़्यादातर डाटा खर्च करते हैं..

कई ऐसे भी विरोध कर रहे हैं.. जिनकी पोस्ट्स औरतों पर किये भद्दे जोक्स से ही हिट हैं.. और वो भी हायतौबा मचा रहे हैं जो उन पोस्ट्स पर ठहाके मारकर हँसते हैं..

इस कतार में वो भी हैं जो वर्क प्लेस पर अपनी साथी कलीग्स से सहमति और बिना सहमति फ़्लर्ट करते हैं.. इसी फ़िराक में कि कोई चांस बन जाए..

और वो फ़र्ज़ी भाई बंधू भी जो बहन की सहेलियों या सहेलियों की सहेलियों और उनकी भी सहेलियों की मदद को हर वक़्त ततपर हैं..

वो प्रेमी भी अफ़सोस जता रहे हैं.. जिनकी बेहिसाब मोहब्बत माशूका के फ्लैट पर जाने या उसे अपने फ्लैट पर ले जाने तक सीमित है..

दुःख में वो भी हैं जो लड़कियों के मैसेंजर पर सिर्फ अपनी सज्जनता दिखाने के लिए देर रात तक पिंग करते हैं..

पीड़ा वो भी लिख रहे हैं जिनकी नींद पोर्न की लज़्ज़तदार सिसकियों की मोहताज है..

बड़े गहरे दुःख में हो भई सब !!

नेता, अफसर, पंडे, मुल्ले, भाई, डूड सबके दिल क्रैक हैं.. मगर क्यों ? मैं आपके जज़्बे पर सवाल नहीं करती चलो.. मेरा सवाल इस दोगलेपन पर है.. एक सज्जन ने लिखा कि “जब तक मर्दों की जमात मिल कर यह मान ना ले कि उनमें एक स्वाभाविक बलात्कारी है” तब तक लड़कियों को यह बात अपने ज़ेहन में रखनी चाहिए.. ठीक कहा.. मगर ज़ेहन क्या लड़कियों के ही पास है ?

मुझे रेप पर बात नहीं करनी वो बड़ी चीज़ है.. मुझे छोटी चीज़ों पर बात करनी है.. उनपर जो रेप जैसी मानसिकता को बल देती हैं.. मुझे आपसे कहना है कि हम असहज नहीं होते अब इस बात से कि “आदमी को कोई कुछ नहीं कहता”.. लेकिन आप सहज मत होइए.. रेप जैसे गुनाह का बोझ औरत पर नहीं लादा जा सकता.. यह तो सारे सेफ्टी मेज़र्स अपनाने के बाद भी हो रहा है ऐसे नहीं तो किसी दूसरी शक्ल में.. इसलिए जिहाद कीजिये.. खुद से.. वाकई फ़िक्र है तो उन छोटी बातों पर ग़ौर करें जो आपकी असीमित ऊर्जा को ठरक तक ले जाती हैं और आपको पता भी नहीं चलता.. और हाँ इस बार एक और बदलाव आया है.. सोशल मीडिया क्रांति ने लड़कियों के सुरक्षा घेरे को रियायत देते हुए उनसे ज़िम्मेदारी का बोझ कम किया है.. और आप पर बढ़ाया है.. तो थोड़ा थमिए.. अच्छे और बहुत अच्छे पलों में.. आनंद की पराकाष्ठा चाहते हुए.. किसी चुटकुले पर ठहाका मारने से पहले.. कोई कमेंट पास करते हुए.. उभरे आकारों पर आंखें ठहराते हुए.. आकर्षण में किसी को निहारते हुए.. या अकेले में.. विवेक जगाइए.. अपने आप से पूछिये क्या आप ठीक हैं !! ..
क्या आपकी कथनी अपनी करनी से सच में मेल खाती है !!
क्या अपने पर्सनल स्पेस की म्युचुअल चॉइस में भी आप अपने आप से या साथी से फेयर हैं !!
क्या आपके लिए दोस्ती प्रेम शादी की मूल भावना में सेक्स सबसे इम्पोर्टेन्ट फैक्टर नहीं है !!
किसी लड़की को पहली नज़र में देखते हुए सबसे पहले आपको क्या दिखाई देता है !!
या उसके हंस कर बात करने को आप कैसे लेते हैं !!
आपके दिमाग़ की एग्रेसिव फैंटसीज़ क्या हैं !!

रेप तो बहुत बड़ी चीज़ है बात करने के लिए.. बात करने का मुद्दा वो सोच है.. जो इस अपराध को करने की हिम्मत देती है.. यह लड़की और सेक्स को सोचते रहने वाली कुंठित ऊर्जा है जो किसी भी कमज़ोर पर निकल जाती है.. जबकि इस अपराध की जड़ में बहुत अदना सा पुरुषत्व है.. जिसकी सोच का दायरा शरीर और सेक्स से आगे नहीं बढ़ पा रहा.. ना फुरसत में, ना दफ्तर में, ना सड़कों पर, ना गैजेट्स में और ना रिश्तों में.. इसलिए छोटी बातों पर ग़ौर किया जाना बेहतर है.. ख़ुद से ईमानदार होना बेहतर है.. क्योंकि जो असर साफ़ दिल और साफ़ नीयत में है.. वो RIP, श्रद्धांजलि, चार गलियों या we want justice लिख देने में नहीं है… फ़िलहाल तो मिर्ज़ा ग़ालिब का यह शेर ऐसों पर फबता है…

” इस सादगी पर कौन ना मर जाए ऐ ख़ुदा
लड़ते हैं और हाथ में तलवार भी नहीं !!”

(हिना ताज़ की फेसबुक वॉल से)

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About the author

मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.

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