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नागरिक का मतलब हिन्दू होना, मय अहसान..

By   /  December 10, 2019  /  No Comments

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अभिषेक श्रीवास्तव।।

ये जो नागरिकता संशोधन का संसदीय प्रहसन जारी है, उस पर थोड़ा ठहर कर सोचें तो शायद पकड़ सकें कि मामला मुसलमानों को बेदखल करने का इतना नहीं है, जितना गैर-मुसलमानों को एकमुश्त हिन्दू बना देने का है। ज़रा रिकॉर्ड खंगाल के देखिए पिछले कुछ साल का, किस किस्म के हिन्दू निपटाए गए हैं। मोटे तौर से दो तरह के हिन्दुओं को निशाना बनाया गया है। एक वे, जो असहमत थे, चाहे किसी भी जाति या वर्ग के रहे हों। मसलन, दाभोलकर से लेकर गौरी लंकेश तक। दूसरे वे, जो निम्न जाति और वर्ग के थे। यूपी के फर्जी एनकाउंटर इसकी अकेले गवाही देंगे।

चलिए, एक बार को मान लेते हैं कि सरकार की सारी ताकत मुसलमानों को बेदखल करने के लिए है। क्या इससे सारे हिन्दू खुश हो जाएंगे? ऐसा कतई नहीं है। केवल मतदान के आंकड़ों को देखें तो आधे से ज़्यादा हिन्दू आबादी अब भी मुसलमान विरोधी नहीं है, वो सह-अस्तित्व में विश्वास करने वाली है। इसके लिए आसान गणित ये है कि आप भाजपा के अलावा बाकी सारे दलों के हिन्दू वोट जोड़ लें। ये ऐसे हिन्दू हैं जिन्हें आरएसएस वाला हिन्दू नहीं कहा जा सकता।

इनमें सामान्य लोग और वैचारिक रूप से दक्षिणपंथ विरोधी विचार खेमे के तमाम लोग शामिल हैं। गांधीवादी हैं, मानवतावादी हैं, अवसरवादी हैं, वामपंथी हैं, समाजवादी हैं, अंबेडकरवादी हैं, रैदासी, कबीरपंथी, नाथपंथी, सतनामी, आदि हैं। आरएसएस ब्रांड हिन्दू के विरोधी खेमे में सतरंगी हिन्दू हैं। ये वे लोग हैं जो ज़्यादातर अपनी पहली पहचान धर्म को नहीं, अलहदा चीज़ों को मानते हैं। कोई विचार को, कोई जाति को, कोई क्षेत्र को, भाषा को, गुरु को..। बहुविध पहचान वाले इन हिन्दुओं का क्या किया जाए, आरएसएस की सबसे बड़ी दिक्कत ये है। मुसलमान नहीं।

नागरिकता संशोधन के बाद दरअसल होगा ये, कि इस सतरंगी खेमे को नागरिक मानने के बहाने स्टेट की तरफ से जो प्राथमिक पहचान दी जाएगी वह हिन्दू की होगी। उस हिन्दू की नहीं जो लोग खुद को मानते हैं। उस हिन्दू की, जो स्टेट उन्हें मानना चाहता है- मुसलमान को अपने लिए खतरा मानने वाला हिन्दू। इस तरह देश के तमाम हिन्दुओं को एकमुश्त हिन्दू पहचान देकर नागरिकता बख़्शी जाएगी। यह प्रिविलेज नहीं होगा, अहसान होगा।

मेरे खयाल से असल खतरा यहां है। संशोधन विधेयक लागू होने के बाद कल को मैं ज़बान खोलूंगा तो मुझे कह दिया जाएगा कि हिन्दू होने के कारण ही तुम्हें नागरिक माना गया है, इसलिए चुपचाप पड़े रहो। इससे स्टेट को कोई फर्क नहीं पड़ेगा कि मैं खुद की प्राथमिक पहचान क्या मानता हूं। उसके लिए मैं सबसे पहले हिन्दू हूं और इसलिए मुझे उसका अहसानमंद होना पड़ेगा। बताइए, ऐसे में मेरे पास क्या रास्ता बचता है? ज़िन्दगी भर आप खुद को सेक्युलर, डेमोक्रेटिक, जातपात विरोधी, धार्मिक पहचान का विरोधी, फलाना ढेकाना मानते रहे और एक झटके में एक कानून ने आपको हिन्दू बना दिया और अहसान भी लाद दिया?

नागरिकता के सवाल पर मैं उस दिन से सोच रहा हूं जब मथुरा के जवाहरबाग में रामवृक्ष यादव और उनके साथियों की गोलियों से भून दिया गया था। रामवृक्ष लगातार अपनी नागरिकता के सबूत के लिए आरटीआई लगाए पड़े थे। जवाब में मिली थी गोली। क्यों? क्योंकि नागरिक होने का कोई प्रमाण देना स्टेट के लिए अब तक संभव नहीं था, सिवाय झौआ भर पहचान पत्रों के। पहचान पत्र नागरिकता का प्रमाण नहीं होते, रामवृक्ष लगातार यही कहे जा रहे थे। वे ज़िंदा होते तो संशोधन के कानून बन जाने पर सरकार धार्मिक आधार पर उन्हें हिन्दू होने का प्रमाणपत्र शायद दे देती। लेकिन यह उनका entitlement नहीं होता, अहसान होता। मने आप गैर-मुसलमान नागरिक हैं तो चुपचाप इस स्टेट का अहसान खाइए या फिर गोली! मर्ज़ी आपकी है।

अब सोचिए, यह संशोधन किसके लिए ज़्यादा खतरनाक है? इस सरकार से मुसलमान ज़्यादा खतरे में है या सीधा सच्चा हिन्दू?

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About the author

मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.

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