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बलात्कार के बढ़ते मामलों में क्या सरकार व सिस्टम पर सवाल नहीं करना चाहिए..

By   /  December 14, 2019  /  No Comments

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सरकार व सिस्टम पर उठ रहे सवाल, फैलता जा रहा बलात्कारीय अपराधों का जाल.. बलात्कार की बढ़ रही वारदातों को देख अब सरकार व सिस्टम से सवाल करने की मजबूरी हुई जरूरी..


-संदीप के. गुप्ता।।

बलात्कार के आए दिन हो रहीं नई वारदातें व बढ़ते हुए क्रूर, बर्बर, घ्रणित दुष्कर्मों के मामले को देखकर तो यह निश्चित हो गया है कि लोगों में अब कानूनी सजा का भय नहीं है। कानून अब उनके लिए शायद एक दाँवपेंच का तंत्र मात्र बन गया है। न्यायिक-व्यवस्था का ढुलमुल रवैया, सुस्त कार्यवाही, तारीखों पे तारीख जैसी खामियों को लेकर अपराधी बड़ी निडरता से अब अपने अपराधों को जन्म दे रहे हैं।

अपराधियों की नजर में यह न्याय-व्यवस्था व कानून महज फिल्मी हो गया है। यह बिल्कुल एक अन्धा कानून ही लगता है। दलीलों सबूतों का संवेदनहीन खेल लगता है। यह सब ऐसा क्यों है, और क्यों अपराधियों को यह सब सहज व निडर लगता है। कम से कम बढ़ते हुए अमानवीय अपराधों को देखकर तो यही मालूम पड़ रहा है। बड़ा आश्चर्य होता है कि जब अपराधी जेल से रिहा होता है और खुले आम पीड़िता को धमकी देता है फिर उसे जला डालता है। कुछ ऐसा ही अभी उन्नाव मे भी हुआ।

ऐसे न जाने कितने ही हृदयविदारक घटनाएँ, कांड बेहद बेबाक अंदाज मे अपना अंजाम देते रहते हैं, और हम सब मुंह बाँय उसकी ओर बस केवल घूरते ही रहते हैं और इससे अधिक कुछ नहीं करते। यह कैसी व्यवस्था है? कैसा सिस्टम है?
दूसरी तरफ यदि सरकार की बात करें तो मालूम हो कि, देश की लोकसभा और राज्यों की विधानसभाओं में 30% नेताओं (जिन्हें हम चुनते हैं) का आपराधिक रिकॉर्ड है। इनमें से 4 नेता तो सीधे-सीधे दुष्कर्म के मामलों का सामना भी कर रहे हैं। यह सब मैं नहीं कह रहा, एडीआर की रिपोर्ट कह रही है।

अभी संसद में देश की एक सांसद ने लिंचिंग की बात कही। जायज़ है उनका गुस्सा, लेकिन मैडम जी जनता क्या ही करे जब आपके संसद के भीतर ही कुछ ऐसे सांसद बैठे हैं जिन पर बलात्कार के आरोप हैं। पर शायद यह सब हम नजरअंदाज़ करने के आदी भी हो गए हैं, जोकि चुनाव के समय अपने यहाँ से खड़े होने वाले प्रत्याशी की जानकारी तक नहीं रखते और चुनाव कर उसे सदन तक पहुँचाते हैं।
परिणामस्वरूप, यह सब जो तमाशा हो रहा है इसका जिम्मेदार सरकार व सिस्टम और साथ ही जनता भी है। क्योंकि जनता भी अपना काम ठीक-ठीक नहीं कर रही है। एक तो नेताओं का सही चुनाव करने मे अपनी अज्ञानता दिखाती है।

दूसरा, काम का ब्योरा मांगने व सवाल करने मे असमर्थता महसूस करती है। आखिरकार सवाल पूंछना कोई गलत है क्या या फिर अलोकतांत्रिक है। यदि नहीं, तो फिर क्यों नहीं करते हैं सवाल। सवाल करिए, पूंछिए।
जवाब मांगिए सरकार से कि बताइए, ‘निर्भया फंड’ के हजारों करोड़ रुपये का क्या हुआ?
कहाँ, कैसे, किन चीजों पर / सुविधाओं पर / व्यस्थाओं पर लगाए गए हैं पैसे? यह लगाया भी गया है ठीक-ठीक या नहीं, और यदि है तो ये व्यस्थायेँ, तंत्र, सुविधायें कहाँ सो रही हैं?
जारी किए गए करोड़ों रुपए के ‘निर्भया फंड’ से हमारी बहनें कितनी निर्भय बन सकीं?
इस फंड से जो एमर्जेंसी रेस्पोन्स सपोर्ट सिस्टम (ERSS) बनाना था, जिसके लिए करोड़ों रुपए जारी भी किए गए। उसका क्या हुआ?
इस फंड से जो वन स्टॉप सेंटर बनाना था, जिसमे यौन-शोषण व हिंसा से प्रभावित महिलाएं फौरन चिकित्सा सहायता, पुलिस सहायता, कानूनी सहायता, मनोसमाजिक परामर्श सहायता सब एक ही जगह सहजपूर्ण उपलब्ध होने का उल्लेख था। उसका क्या हुआ?
इन सारे सवालों का जवाब अब सरकार को देना ही होगा और यही सही मायने में एक लोकतान्त्रिक सरकार का अर्थ है।

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  • Published: 2 months ago on December 14, 2019
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  • Last Modified: December 14, 2019 @ 12:34 pm
  • Filed Under: देश

About the author

मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.

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