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प्रेमकुमार मणि का भारत के गृहमंत्री अमित शाह को लिखा खुला पत्र..

By   /  December 14, 2019  /  No Comments

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प्रिय श्री अमिताभ अनिलचंद्र शाह जी ,

कुछ समय पूर्व टीवी पर लोकसभा में नागरिकता संशोधन अधिनियम रखे जाने के क्रम में आपके दिए वक्तव्य को देख -सुन रहा था . आप मुल्क के होम मिनिस्टर हो , आपकी आवाज थोड़ी बुलंद है ,और इन सब के ऊपर मौजूदा राष्ट्रीय राजनीति में आपके पास मजबूत बहुमत है ,इसलिए इन सब की इकट्ठी ताकत से आप विपक्ष पर चढ़ बैठते हो . विपक्ष न केवल संख्या बल में अपितु अपनी चेतना में भी कमजोर है ,इसलिए उन्हें परास्त अथवा निस्तेज करना आपके लिए बहुत आसान हो जाता है . मैं उस सदन का सदस्य नहीं हूँ ,जहाँ आप अपनी बात रख रहे थे .मैं यदि वहां होता तब आपकी एक -एक बात का एक -एक जुमले का जवाब देता . लेकिन देश का एक नागरिक हूँ और यह जरुरी समझता हूँ कि एक पत्र द्वारा अपनी बातों को संक्षेप में ही सही रख जाऊँ . मैं नहीं जानता यह पत्र आप पढ़ पाओगे या नहीं . लेकिन मुझे एक संतोष तो होगा कि मैंने अपनी बातें रख दी . सुना है ,इतिहास की कुछ अवचेतन शक्तियां होती हैं ,जो इन्हें संजो लेती हैं . न भी संजोये ,तो चलेगा . कभी -कभी बड़बड़ाने का भी कुछ अर्थ होता है . आप तो गृह मंत्री हो . इसे घर के एक अदना सदस्य की बड़बड़ाहट के रूप में भी लोगे तो चलेगा .

मैं यदि कहूं ,आपका वक्तव्य झूठा तो था ही , बेहूदा और बेबुनियाद भी था ,तो अधिक सच होगा . आप झूठ पर झूठ बोलते गए . पहली बात यह कि आपने मुल्क के सब से बड़ी पंचायत को यह कह कर गुमराह किया कि कांग्रेस ने धर्म के नाम पर देश का बंटवारा कबूल किया . मैं नहीं जानता आपने इतिहास का कितना अध्ययन किया है . लेकिन मैंने जितना जाना है वह यह कि कांग्रेस ने हमेशा इसका विरोध किया . हाँ ,मुस्लिम लीग जरूर इसी आधार पर मुल्क का बंटवारा चाहती थी . यहां तक कि कांग्रेस ने अपने हिस्से के मंत्रियों में जब मुस्लिम सदस्य को रखा ,तब इस पर भी उसे नाराजगी थी . उस वक्त द्विराष्ट्रवाद के सिद्धांत में दो ही नेता यकीन रखते थे .एक थे जिन्ना दूसरे थे सावरकर . द्वितीय विश्वयुद्ध में जब ब्रिटेन कूद पड़ा और भारत को भी उसने इसमें शामिल कर लिया , तब 1937 के प्रांतीय चुनावों में निर्वाचित -निर्मित कांग्रेस सरकारों ने इस्तीफा दे दिया . इस वक्त मुस्लिम लीग और हिन्दू महासभा ,जिसके मुखिया तब सावरकर थे , ने अंग्रेजों का पृष्ठपोषण किया . सावरकर ने हिन्दुओं से अपील की कि वह अधिक से अधिक संख्या में ब्रिटिश फ़ौज में शामिल हों . क्योंकि सावरकर केलिए हिन्दुओं का सैन्यीकरण एक अहम प्रश्न था .उन्हें लगता था ब्रिटिश फ़ौज में भर्ती होकर हिन्दू लड़ाकू बन जायेंगे और फिर वह अपने हिन्दू राष्ट्र केलिए लड़ेंगे . इसी तरह जिन्ना अंग्रेजों की चापलूसी कर अलग पाकिस्तान हासिल करना चाहते थे . सब जानते हैं कि 1946 -47 में राजनैतिक स्थितियां इतनी नाजुक हुईं कि कांग्रेस पाकिस्तान के अलगाव को रोक नहीं सकी . इसका यह अर्थ नहीं कि उसने धर्म के नाम पर देश का बंटवारा कबूल किया . यह सरासर झूठ है . धर्म के नाम पर बंटवारा तब होता जब भारत हिन्दू राष्ट्र बनता . ऐसा नहीं हुआ . भारत हिन्दू राष्ट्र नहीं बना . देश की आज़ादी के समय संविधान सभा ही राष्ट्रीय विधायिका थी . आज़ादी मिलने के बाद ही इसके निर्माण का कार्य सही मायने में आरम्भ हुआ . संविधान सभा ने भारत को हिन्दू राष्ट्र नहीं बनाया . वह एक धर्मनिरपेक्ष राज्य बना . यह अवश्य था कि आपकी मातृसंस्था आरएसएस को यह नहीं सुहाया . लेकिन इस कथा को अधिक विस्तार देना विषयांतर होना होगा . इसलिए इस प्रसंग को यहीं समाप्त करता हूँ .
भारतीय प्रधानमंत्री नेहरू और अन्य राष्ट्रीय नेताओं ने लगातार धर्मनिरपेक्षता के प्रति अपनी निष्ठा सक्रिय रखी . इसी का प्रतिफलन था कि मुस्लिम बहुल जम्मू -कश्मीर के लोगों ने भारत में मिलना चाहा ,पाकिस्तान में नहीं . शेख अब्दुल्ला और उनकी पार्टी नेशनल कांफ्रेंस ने पाकिस्तान के बजाय भारत में मिलना पसंद किया ,तो इसके कारण थे . एक क्षण केलिए भी भारतीय नेताओं ( इसमें कांग्रेस ,सोशलिस्ट ,कम्युनिस्ट सब थे ) ने धर्मनिरपेक्षता से अपने को अलग नहीं किया . श्री शाह साहब जी, आपको इतिहास के पन्नों से एक बार गुजरने की गुजारिश करूँगा . संघ के झूठे इतिहास पाठ ने आपको भ्रम में रखा है .
अब एक दूसरे झूठ की याद दिलाऊंगा जिसे आप बहुत ऊँची आवाज में सुना रहे थे . वह यह कि आप बता रहे थे कि पाकिस्तान और बंगलादेश में केवल हिन्दुओं के खिलाफ जुल्म हुए . आप की समझ में यह बात आ ही नहीं रही थी कि वहां मुसलमानों के खिलाफ जुल्म हुए होंगे . आप थियोक्रेटिक पॉलिटिक्स करते रहे हैं . आपको शायद यह बात समझ में नहीं आये .लेकिन आपको जानना चाहिए कि 1971 में पाकिस्तान ने ही अपने पूर्वी हिस्से ,जो आज बंगलादेश है , में भीषण नरसंहार किया था . वह नरसंहार क्या वहां के हिन्दुओं के खिलाफ था ? क्या भारत की सेना ने हिन्दुओं को बचाने केलिए सैनिक हस्तक्षेप किय था ? क्या मुजीबुर्रहमान हिन्दू नेता थे ? कुछ तो समझ बूझ कर बोला करिये शाह साहब ! आप कोई मामूली हस्ती नहीं ,इस महान मुल्क के होम मिनिस्टर हो . आपको शर्म भले नहीं आवे ,लेकिन आपके बोले पर हमे तो आती है ,क्योंकि आप हमारे प्रतीक हो . पाकिस्तान में मुसलमानों के खिलाफ जुल्म नहीं होता और भारत में हिन्दुओं के खिलाफ जुल्म नहीं होता की सैद्धांतिकी के क्या मायने होते हैं ,आप जानो . लेकिन जान लो यह बकवास के सिवा कुछ नहीं है .
नागरिकता संशोधन विधेयक सचमुच हमारे राष्ट्रीय चरित्र और संविधान की आत्मा के विरुद्ध है . हाँ,यदि भारत को सावरकर के स्वप्न हिन्दुस्थान में तब्दील करने की योजना का यह हिस्सा है ,तब आप अवश्य सही हैं . लेकिन ऐसी स्थिति में तो हमारी मजबूरी होगी कि हम आपका विरोध करें .हम अपने भारत केलिए लड़ेंगे शाह साहब . क्योंकि हम जिस भारत की बात करते हैं उसे हमारे ऋषियों -मनीषियों और कवियों ने सृजित किया है .वह हमारी विरासत है ,धरोहर है. इसे हम नहीं खोने देंगे . यह कोई एक रोज में नहीं बना है और एक रोज में मिटेगा भी नहीं . विश्वकवि टैगोर ने भारत की नागरिकता को कुछ यूँ बाँधा है –
हेथाय आर्य ,हेथा अनार्य ,हेथाय द्रविड़ -चीन ,
शक -हूण -दल ,पठान -मोगल एक देहे होलो लीन .

यहां आर्य -अनार्य द्रविड़ ,चीन ,शक ,हूण ,पठान ,मोगल सब एक ही देह में मिल चुके हैं . आप अब किसको कहाँ भेजेंगे , किसकी क्या व्याख्या करेंगे ? शाह महोदय ! अपना डीएनए टेस्ट कराइये और किसी पाकिस्तानी का भी कराइये . देखिये कितनी समानताएं हैं . आपने अपने शाह पद पर कभी गौर किया है ? इसके ओरिजिन पर ध्यान देंगे तब दिलचस्प नतीजे मिलेंगे .

और आखिर में यह कि राज -पाट मिला है ,तब कुछ सकारात्मक कार्य कीजिए . मुल्क की आर्थिक स्थिति चरमर हो चुकी है . कुछ अकल है तो इस पर लगाइये . आज आपको भारी समर्थन मिला है . इस पर इतराइये नहीं . इससे भी भारी समर्थन इंदिरा गांधी को मिला था . उसके गुमान में उन्होंने मुल्क पर इमरजेंसी थोप दी . फिर जो हुआ उससे आप परिचित होंगे . आने वाले जाते भी हैं ,इसे याद रखियेगा .
गृहमंत्री के नाते आदर के साथ ,
आपका ,
प्रेमकुमार मणि

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  • Published: 2 months ago on December 14, 2019
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  • Last Modified: December 14, 2019 @ 9:06 pm
  • Filed Under: देश

About the author

मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.

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