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हिंसक होने का नहीं बल्कि गांधी के रास्ते चलने का वक़्त है..

By   /  December 18, 2019  /  No Comments

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-सौरभ वाजपेयी।।

हमारे जैसे लोग और संगठन CAA और NRC के विरोध में इसलिए उतरे हैं कि यह हमारे देश और उसके संविधान की आत्मा के विरुद्ध साजिश है। हम इसलिए नहीं आये कि कोई भी अनियंत्रित भीड़ पागल होकर बसें जलाने लगे और पुलिस पर पत्थर बरसाने लगे।

राज्य यही चाहता है कि आप हिंसक हो उठें। उसके लिए हिंसक आन्दोलन का दमन बहुत आसान बात है। आईटी सेल मुँह पर रुमाल बाँधे आपकी फ़ोटो ढूँढता रहता जिससे वो हिंदुओं को बता सके कि डरो वरना ये पूरे देश को कश्मीर बना देंगे। जामिया में हुई हिंसा के समय हमने लिखा कि यह छात्रों की नहीं, आसपास की राजनीति की हिंसा है तो लोग हाय-हाय करने लगे। कहने लगे कि नहीं-नहीं बसें तो ख़ुद पुलिस ने जलाईं और सारी हिंसा एक साजिश है।

तो भाई, एक छोटी सी बात समझिये। आप थोड़ी सी हिंसा पर उतारू होंगे, इसी फ़िराक में बैठा गृह मंत्रालय हिंसक नंगई पर उतारू हो जाएगा। लाठी-पत्थर उस दिन भी थे और दो दिन पहले भी चले थे। आपने पत्थर फेंके और उन्होंने पेट्रोल छिड़ककर बसों में आग लगवा दी। उस दिन मुझे पता था कि इस जाहिलियत का खामियाज़ा जामिया के छात्र-छात्राओं को उठाना पड़ेगा।

अब सीलमपुर जैसी घटनाओं के बाद हमारे जैसे लोग जो गाँधी को अपना नायक मानते हैं, को चाहिए कि फ़िलहाल इन हिंसक प्रदर्शनों से ख़ुद को अलग कर लें। CAA-NRC के विरुद्ध यह आन्दोलन बहुत जरूरी है लेकिन ऐसी घटनाएँ ख़ुद मुस्लिम समाज के तमाम लोगों की मुसीबतें बढ़ाने वाली हैं।

आगे से ध्यान रखा जाए कि अगर किसी भी आन्दोलन को अहिंसक रखने की चाकचौबंद व्यवस्था न कर ली जाए, बेहतर है आन्दोलन स्थगित रहे। हिंसा सिर्फ और सिर्फ आन्दोलन को अपनी राह से भटका सकती है, आगे नहीं बढ़ा सकती। इसलिए हम लोग अभी फिलहाल अपने को उन प्रदर्शनों तक सीमित रखेंगे जिनके अहिंसक होने की गारंटी है। साथ ही इसके विरुद्ध जनजागरण की अपनी सांगठनिक कोशिशों पर ध्यान केंद्रित करेंगे।

कुछ मुट्ठी भर सिरफ़िरे लोगों की बेवकूफियों की सज़ा समूचे समाज को नहीं दी जा सकती। जामिया में पिटते बच्चों के लिए जिनके दिल में व्यथा है वो जानते हैं कि लड़ाइयाँ कैसे लड़ी और जीती जाती हैं। गाँधी की राह पर चलिए वरना सावरकर और गोलवलकर के लोग एक और बँटवारे पर आमादा हैं और आपसे ज्यादा हिंसा के लिए उतारू बैठे हैं।

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About the author

मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.

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