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कौआ कान नहीं, कानून लेकर भागा है मोदीजी..

By   /  December 22, 2019  /  No Comments

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-प्रेमकुमार मणि।।

आज दिल्ली के रामलीला मैदान में अपने अंदाज़ में आप बोले ,जिसे आपके भक्त दहाड़ना कहते रहे हैं . CAA और NRC पर आप जितना अधिक स्पष्टीकरण दे रहे थे , उतने ही व्यग्र होते जा रहे थे . आपके मानसिक विचलन का पता भाषण के आपके तेवर और उसमे चयनित शब्दों से चल रहा था . आपने अपने विरोधियों को अर्बन नक्सली कहा . आपके तेवर में गुस्सा ही गुस्सा था . बार -बार ऐसा प्रतीत होता था कि आप फट पड़ेंगे और गिर पड़ेंगे . आपसे आदरपूर्वक कहना चाहूंगा ,अपनी सेहत और मर्यादा का ख्याल रखें . आखिर आप हमारे प्राइम मिनिस्टर हो . आपकी मर्यादा ,हमारी भी मर्यादा है . अपने अभिभावक या मातापिता के पतन पर जैसे बच्चे दुखी और अपमानित अनुभव करते हैं ,वैसे ही आपके सार्वजानिक- पतन पर हम हो रहे थे . एक दफा पूरे भाषण का क्लिप आप सुन लें . अपने पतन पर आप भी शर्मिंदा होंगे . हालांकि आपके चापलूस मंडली आपकी तारीफ कर रही होगी . लेकिन आप पर इतना भरोसा अवश्य है कि इन चापलूसों की शिनाख्त कर सकें . हालांकि सत्ता व्यक्ति को अँधा बना देती है . लेकिन आपके डीएनए में चायवाले आमआदमी की खुराक है . आप अंधे नहीं हुए होंगे ,विश्वास है .

प्रधानमंत्रीजी , आप किसको समझा रहे हो कि कौआ को नहीं कान को पकड़ो . कान अपनी जगह है . आप ने कान को नहीं ,कानून को ध्वस्त किया है . आपको अच्छी तरह मालूम है कि लोग बातों को कायदे से समझ रहे हैं . लोग तो संविधान की मर्यादा केलिए ,उसकी परंपरा और परिपाटी केलिए विरोध कर रहे हैं . आप और आपके गृहमंत्रीजी कह रहे हैं कि यह मुसलमानों के खिलाफ नहीं है . कोई नहीं कह रहा कि यह मुसलमानों के खिलाफ है . दरअसल यह भारत के खिलाफ है . इसलिए भारत के लोग इसका विरोध कर रहे हैं . इसमें सभी धर्मों ,जातियों और इलाकों के लोग हैं . निश्चित ही अर्बन नक्सली भी होंगे . रामचंद्र गुहा जैसे लोग आपकी नजर में अर्बन नक्सली ही तो हैं .
प्रधानमंत्रीजी ,अभी -अभी पारित नागरिकता बिल से कौन डर रहा है ? वे सब डर रहे हैं ,जो इस मुल्क को एक सेक्युलर राज्य बनाये रखने के पक्षधर हैं . आप जिन विचारों से प्रेरित हैं वह इसका समर्थन नहीं करती . आप हिन्दू राष्ट्र की विचारधारा से प्रेरित हो . पाकिस्तान ,बंगलादेश ,नेपाल आदि देशों में भी धर्मकेंद्रित राष्ट्र -राज्य के विचार से कुछ लोग प्रेरित थे . नेपाल तो घोषित रूप से हिन्दू राष्ट्र था . पाकिस्तान और बंगलादेश भी आरम्भ में तो सेक्युलर रहे ,लेकिन जल्दी ही इस्लामिक राष्ट्र बन गए . नेपाल अपने हिन्दू राष्ट्र से नए संविधान (2015 ) द्वारा मुक्त हो सेक्युलर राष्ट्र बन गया है . लेकिन आप पाकिस्तान और बंगलादेश के पदचिह्नों पर चलना चाहते हैं . भारत को हिन्दू -केंद्रित राष्ट्र बनाना भारत को पाकिस्तान बनाना ही है . भारत की जनता इसका विरोध कर रही है . इसमें मुस्लमान भी हैं दलित भी हैं . हिन्दू ,सिक्ख ,बौद्ध ,ईसाई ,पारसी सब हैं . वे भी हैं जो किसी संस्थागत धर्म में यकीन नहीं करते ; यानि नास्तिक लोग . भारतीय ज्ञान परंपरा में इन्हे लोकायतिक कहा जाता है और आपकी संघी परंपरा में शायद यही अर्बन नक्सली हैं . ऐसे में आपके भाषणों में बार -बार यह आना कि मुसलमानों को डरने की जरूरत नहीं है ,आपकी शातिराना हरकत ही कही जाएगी . मैं फिर जोर देकर कहना चाहूंगा ,आप ठीक से सुन लो प्रधानमंत्रीजी ,देश के मुस्लमान नहीं .बल्कि पूरा देश इस कानून के खिलाफ है . आप और आपकी पार्टी जरूर इसके समर्थन में हो सकती है . इंदिरा गाँधी ने जब इमरजेंसी थोपी थी ,तब उनकी पार्टी और उनके लोग सपोर्ट तो कर ही रहे थे न ! लेकिन आप जानते हो ,पूरा भारत इसके खिलाफ था . आज के इस कानून के खिलाफ पूरा मुल्क है ,न कि कोई एक मजहब या पंथ के लोग . आप कानून को तो मजहबी बना ही चुके हो , राजनीति को भी बनाना चाहते हो . यह आपकी सोची -समझी चाल है . हम इसे अच्छी तरह समझते हैं .

इस पूरे वाकये से जुडी एक हकीकत आपको बतलाना चाहूंगा . संभव है ,आप इस से अवगत हों . आपको क्या यह पता है कि नेपाल में हिन्दू राष्ट्र और पाकिस्तान -बंगलादेश में इस्लामिक राष्ट्र की आवाज़ कब बुलंद हुई ? तब -तब जब -जब वहां अमीर लोग राजनीति पर हावी हुए . नेपाल का हिन्दू राज्य वहां की राजशाही को बचाये रखने का औजार था . पाकिस्तान और मुस्लिम लीग का निर्माण ही अवध के मुस्लिम ज़मींदारों ने अपनी औकात बचाने के लिए की थी ,क्योंकि उन सब को लगता था कि पाकिस्तान बनेगा तब ही हमारी हुकूमत कुछ इलाकों में बचेगी . जिन्ना काबिल इंसान थे ,लेकिन दूरदर्शी बिल्कल नहीं थे . जिद्द पूरा करने के चक्कर में भारत और मुसलमानों का उन्होंने सत्यनाश कर दिया . ब्रिटिश हकूमत नहीं होती तो यह संभव नहीं था . लेकिन वह जिन्ना ही थे जिन्होंने पाकिस्तान को सेक्युलर देश घोषित किया . लेकिन कहावत है बोये पेड़ बबूल का आम कहाँ से होय . पाकिस्तान मुसलमानों का जहन्नुम बन कर रह गया . पूरी कहानी कहने केलिए वक़्त चाहिए .

लेकिन भारत में रह रहे अधिकांश मुसलमानों ने जिन्ना को नकारा ,जैसे अधिकांश हिन्दुओं ने सावरकर को नकारा . भारतीय मुसलमानों ने राजनीति के हर मोड़ पर बहुसंख्यक मिजाज का साथ दिया . उनने नेहरू में अपना समर्थन व्यक्त किया . 1965 और 1971 के भारत -पाक युद्ध में भारतीय नेताओं की जयकार की . 1971 में इंदिरा गाँधी के समाजवाद का पक्ष लिया ,तो 1977 में उनकी तानाशाही का विरोध भी किया . 1984 में कांग्रेस ने अल्पसंख्यक सिक्खों के खिलाफ युद्ध छेड़ दिया था ,भीषण नरसंहार किये थे ;लेकिन जब देश ने राजीव गाँधी को चुना तब मुस्लमान भी साथ हुए . 1989 में उन्ही राजीव गांधी का विरोध भी किया ,जबकि रामजन्मभूमि का मामला जोरों पर था और वीपी सिंह भाजपा के साथ गंठजोड़ कर चुनाव लड़ रहे थे . यहाँ तक कि अटलबिहारी की भाजपा के समर्थन में भी मुसलमानों का एक तबका आया . यदि भाजपा ने कोशिश की हुई होती तो मुस्लमान उसके साथ भी होते . लेकिन भाजपा को ,आपको नफरत की राजनीति करनी थी . आपने जो किया ,उन के प्रति आप के जो ख़याल हैं ,आप सेअधिक कौन जान सकता है . इस पर भी आप मुसलमानों से समर्थन की बात करते हैं ,तो आप ही सोचिये आप कितने सही हैं .

प्रधानमंत्रीजी , नफरत की राजनीति से दो -चार चुनाव जरूर जीते जा सकते हैं .लेकिन कोई समाज और देश नहीं बनाया जा सकता . कोई समाज और देश तो प्रेम और सद्भाव के द्वारा ही रचा जा सकता है ,नफरत और हिंसा के द्वारा कदापि नही . आप संघ के आदर्शों को पूरा कर लोगे . कुछ समय केलिए सावरकर -गोडसे ज़िंदाबाद कर लोगे . अर्बन नक्सलियों को जेलों में ठूंस दोगे और हिटलर की तरह कुछ डिटेंशन कैम्पों को भी बनाने का ख्वाब पूरा कर लोगे . लेकिन आप उस भारत को ख़त्म कर दोगे ,जिसे वाल्मीकि ,व्यास ,कालिदास ,कबीर ,तुलसी से लेकर गांधी -टैगोर और नेहरू आम्बेडकर ने मिल जुल कर हज़ारों साल में संवारा है . आप पूरी संस्कृति और इतिहास को ख़त्म कर दोगे . आप कृपा कर इतिहास के हत्यारे मत बनो प्रधानमंत्री जी ! चीख -चीख कर भाषण
देने से कोई राष्ट्र भक्त नहीं हो जाता . आप पूरे मुल्क को 2001 का गोधरा बनाने पर क्यों तुले हो ? हमें अपना कान टटोलने कहते हो ,पहले आप अपनी आत्मा को टटोलो प्रधानमंत्रीजी!

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About the author

मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.

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