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मुल्ला नसरुद्दीन और मोदी जी..

By   /  December 30, 2019  /  No Comments

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-विष्णु नागर।।

मुल्ला नसरुद्दीन का नाम पहले सिर्फ़ नसरुद्दीन हुआ करता था। कुछ उसे प्यार से नसरू और कुछ मियां नसरुद्दीन कहा करते थे। नसरुद्दीन को लेकिन मुल्ला नसरुद्दीन बनने से बहुत पहले ही रोज -रोज नये -नये किस्से गढ़ने का बहुत शौक था बल्कि नशा- सा था। ताजा राजनीतिक हालात को वह फौरन किस्से में बदल देता था।

मोदी जी उस समय भी थे और प्रधानमंत्री ही थे। भारत के थे या नहीं,यह तो मोदी जी को भी याद नहीं मगर कहीं के थे जरूर, इतना उन्हें याद है।

मोदी जी को लगता था कि यह नसरुद्दीन मेरे खिलाफ रोज किस्से गढ़ता रहता है। तब इंटरनेट, टीवी,फेसबुक वगैरह तो कुछ था नहीं, नसरुद्दीन के किस्सों पर प्रतिबंध लगाने और ‘देश की सुरक्षा’ के साथ नसरुद्दीन की इस ‘छेड़छाड़’ को रोकने का उपाय भी नहीं किया जा सकता था। नसरुद्दीन एक जगह एक किस्सा सुनाता और वो कानोंकान एक से दूसरे तक पहुंचता चला जाता और लोग आनंद लेते,हँसते-हँसते लोटपोट हो जाते।दूसरे भी देखादेखी उतने ही बढ़िया किस्से गढ़ने लगे और वे किस्से भी नसरुद्दीन के नाम से मशहूर होने लगे।

मोदी जी इससे बहुत परेशान हो गए। उन्होंने अमित शाह, आदि जैसे शीर्ष नेताओं की बैठक बुलाई।

अगले दिन भाजपा (तब भी भाजपा थी। कहाँ थी, यह मोदी जी को भी अब याद नहीं ) की रैली में मोदी जी ने नसरुद्दीन को चिढ़ाने और अपनी पापुलरिटी बढ़ाने के लिए ‘सर्जिकल स्ट्राइक’ करते हुए नसरुद्दीन के आगे मुल्ला शब्द भी जोड़ दिया। यह वाली ‘सर्जिकल स्ट्राइक’ उनकी बुरी तरह फेल हो गई। मोदी जी के नसरुद्दीन को मुल्ला नसरुद्दीन बनाने से उसकी लोकप्रियता दिनदूनी और रात चौगुनी बढ़ गई। मोदी जी के दिए ‘मुल्ला’ शब्द को तोहफा मानते हुए खुद उसने अपने नाम के आगे मुल्ला शब्द लगाना शुरू कर दिया और वह मुल्ला नसरुद्दीन हो गया, बल्कि इससे उसकी इज्जत में इतना इजाफा हो गया कि लोग उसका आदर करने लगे। उसे उसे की बजाय उन्हें कहने लगे। मुल्ला नसरुद्दीन कहने लगे।

मुल्ला नसरुद्दीन ने एक और समझदारी दिखाई, बदले की कार्रवाई नहीं की। उसने मोदी जी के आगे पंडित शब्द नहीं जोड़ा।

तब से नरेन्द्र मोदी तो आतेजाते रहते हैं मगर मुल्ला नसरुद्दीन कहीं नहीं जाते। जहाँ -जहाँ मोदी जी प्रधानमंत्री या उस जैसे कुछ बनते हैं,वहाँ- वहाँ मुल्ला नसरुद्दीन बिना वीसा लिए आकाश मार्ग से पहुंच जाते हैं।

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  • Published: 3 months ago on December 30, 2019
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  • Last Modified: December 30, 2019 @ 3:23 pm
  • Filed Under: व्यंग्य

About the author

मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.

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