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मोदी की इंटरनेशनल इमेज का क्या होगा..

By   /  January 2, 2020  /  No Comments

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सीमा सिरोही वाशिंगटन में रहती हैं, उन्होंने भारत के मौजूदा हाल पर अमरीका से एक लेख लिखा है जिसे ORF यानी ऑब्ज़र्वर रिसर्च फाउंडेशन ने छापा है. मोदी के घरेलू कदमों को बाकी दुनिया कैसे देख रही है. इस फाउंडेशन का वित्तीय पोषण मुकेश अंबानी का रिलायंस उद्योग समूह करता है। लेख का एक अंश हिंदी में.

पिछले साल की शुरुआत भारत को लेकर ज़ाहिर की जा रही चिंताओं से हुई थी जो आलोचनाओं के शोर पर जाकर खत्म हुई. नरेंद्र मोदी की भारी चुनावी जीत को लेकर दुनिया भर की राजधानियों में लोग दंग थे लेकिन उनके कई घरेलू फ़ैसलों की वजह से उनकी चमक पूरी तरह खत्म हो गई.
कश्मीर का राज्य का दर्जा खत्म करने से लेकर नागरिकता संशोधन कानून तक, दुनिया ने देखा कि मोदी देश में बुनियादी बदलावों की निरंतर मुहिम चला रहे हैं. जब छात्रों और सिविल सोसाइटी ने बदलाव का विरोध किया तो उन्हें विपक्ष का दलाल और अपराधी कहा गया.
इस बीच अर्थव्यवस्था सिकुड़ती रही, ऐसा लग रहा था कि मोदी तक आंकड़े पहुंच ही नहीं रहे थे. भ्रम चरम पर रहा. मुलम्मा तेज़ी से उतर रहा था लेकिन उनके वफ़ादारों की फौज हर बात को ठीक बता रही थी या दावों को सीधे नकार रही थी.
भारत के मित्र देशों के कूटनयिक चिंता के साथ पूछ रहे थे, “क्या सेकुलर और विविधता से भरा भारत कोई नई शक्ल लेने जा रहा है?” वे बहुसंख्यक वर्चस्व वाला देश कहने से कतरा रहे थे, अब भी कतरा रहे हैं.
भारत में अमरीकी राजदूत केन जस्टर ने अपनी ट्विटर प्रोफ़ाइल की बैकग्राउंड तस्वीर जान-बूझकर बदली है, इन तस्वीरों में वे भारत के अलग-अलग धर्मों के तीर्थस्थलों पर दिख रहे हैं, यह उनका संदेश देने का तरीका था.
सवाल बढ़ते जा रहे हैं और भारतीय राजनयिकों के पास जवाब नहीं हैं. इसके लिए उन्हें कसूरवार नहीं ठहराया जा सकता, उनका काम सबसे कठिन है. इन सवालों का जवाब कौन दे सकता है कि यूपी पुलिस ने बच्चों को क्यों गिरफ़्तार किया, या मुख्यमंत्री बदला लेने की बात क्यों कर रहे हैं?
दुनिया भर की सरकारें मोदी को भारत के उत्थान के नायक के रूप में देख रही थीं, लेकिन अब इससे इनकार करना मुश्किल है कि 2019 में मोदी के घरेलू फैसलों की वजह से वर्षों में जमा हुई सदभावना की पूंजी छिन गई है.
आज का हाल बहुत अलग है, भारत के पड़ोस लेकर सुदूर देशों तक, सरकारें यही सोच रही हैं कश्मीर में आखिरकार सरकार क्या चाहती है, भारत किस दिशा में बढ़ रहा है, क्या वह दोबारा उठ सकेगा और अपनी खोई हुई चमक हासिल कर सकेगा.
यह दावा कि एनआरसी, सीएए, कश्मीर में पूर्व मुख्यमंत्रियों की नज़रबंदी, प्रदर्शनकारियों पर हमले, इंटरनेट बंदी और पुलिस ज़्यादती ये सब भारत के अंदरूनी मामले हैं इसलिए भारत से बाहर किसी को इन पर चिंता नहीं होनी चाहिए, यह खोखली बात है.
बीजेपी को आखिरकार अपनी अंतरराष्ट्रीय छवि का खयाल करना ही होगा. इंटरनेट सेना दुनिया भर में कहां कहां आलोचकों के मुंह बंद करवाएगी, इतनी मेहनत से बनाई गई नरेंद्र मोदी की इंटरनेशनल स्टेट्समैन की छवि का भी सवाल है.
भारत सरकार के वर्जन को मान लेने के रुझान में उसी अनुपात में गिरावट आ रही है जिस अनुपात में देश भर में सख्ती हो रही है. एक हद के बाद सरकारी वर्जन की मान्यता नहीं रह जाती.

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  • Published: 3 weeks ago on January 2, 2020
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  • Last Modified: January 2, 2020 @ 4:24 pm
  • Filed Under: दुनियां

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