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यूपी की सियासत को क्या कांग्रेस मय कर पाएँगी प्रियंका..

By   /  January 3, 2020  /  No Comments

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-तौसीफ़ क़ुरैशी।।

यूपी की सियासत में आज कल बहुत कुछ बदलाव होने की आहट दिखाई दे रही हैं। तीन दशकों से यूपी की सियासत से बाहर चल रही कांग्रेस फ़्रंट फुट पर आने के लिए हाथ पैर मार रही है और अब इसकी कमान कांग्रेस की राष्ट्रीय महासचिव यूपी की प्रभारी श्रीमती प्रियंका गांधी ने संभाल रखी है। यूपी की योगी सरकार के नाक में दम कर रखा है प्रियंका ने। कोई भी मामला हो सबसे पहले कांग्रेस खड़ी हो जा रही है, चाहे उन्नाव की दोनों घटनाएँ हो या शाहजहांपुर का मामला रहा हो या अब सीएए एनआरसी और एनपीआर का मुद्दा हो। जबकि यूपी का मुख्य विपक्ष सपा व बसपा हाड़ कंपा देने वाली सर्दी में अपने-अपने कार्यालयों में बैठे हाथ तापते नज़र आ रहे हैं।

उनका कोई कदम ऐसा नहीं है जिससे कहा जा सके कि वह भी कही है। प्रियंका गांधी न सर्दी देख रही है न रात देख रही है। मौक़ा मिलते ही निकल पड़ती हैं सियासी जंग के लिए। बहुत लम्बे अरसे के बाद यूपी में कांग्रेस इस तरह लड़ती नज़र आ रही है जिससे मोदी की भाजपा की योगी आदित्यनाथ सरकार तिलमिला उठी है। वह योगी सरकार पर हमला करने से भी पीछे नहीं हट रही है। इस बार तो प्रियंका गांधी ने योगी को भगवा रंग के भी मायने बताते हुए कहा कि हिन्दू धर्म में बदला शब्द कही नहीं हैं। इसके बाद पूरी भगवा ब्रिगेड लाल पीली होती दिखाई दी। भगवा ब्रिगेड का कहना है कि अब हमें गांधी परिवार बताएगा कि हिन्दू धर्म में क्या है और क्या नहीं। प्रियंका गांधी की सक्रियता से मोदी की भाजपा तो परेशान हैं या नहीं है ये तो अलग बात है लेकिन सपा कंपनी और बसपा कंपनी अन्दर ही अन्दर बड़ी परेशानी में नज़र आ रही है। उसकी वजह भी है। सबसे बड़ी चुनौती सपा कंपनी के सामने है क्योंकि उसका पिछले तीन दशकों से बँधवा मज़दूर चला आ रहा मुसलमान वोट अगर अंगड़ाई ले कांग्रेस की ओर रूख कर गया तो सबसे ज़्यादा नुक़सान सपा कंपनी का ही होने की संभावना व्यक्त की जा रही है। क्योंकि जिस तरीक़े से प्रियंका गांधी यूपी में सक्रिय रूप से योगी सरकार को घेर रही है उससे मुसलमानों में कांग्रेस के प्रति लगाव की कुलबुलाहट महसूस की जा रही है और ये कुलबुलाहट सपा कंपनी की सेहत के लिए बेहतर नहीं है। क्योंकि सपा कंपनी के पास वोटबैंक के नाम पर मुसलमान ही माने जाते हैं अगर यह वोटबैंक कांग्रेस की ओर रूख करेगा तो सपा कंपनी के पास कुछ नहीं बचेगा और उसका हाल पश्चिम उत्तर प्रदेश की पार्टी राष्ट्रीय लोकदल जैसा हो सकता है । उसके पास वोटबैंक के नाम पर सिर्फ़ यादव ही रह जाएगा और उसका भी भरोसा नहीं है। जैसे लोकसभा और विधानसभा के चुनाव में यादव जाति ने मोदी की भाजपा की ओर रूख किया था और सपा को बहुत नुक़सान हुआ था। सिर्फ़ बँधुवा मज़दूर की हैसियत से मुसलमान ही रह गया था और अगर ये भी अलग हो गया तो फिर सपा कंपनी का बेड़ा पार होना मुश्किल हो जाएगा।

रही बात बसपा कंपनी की उसको भी बहुत कठिनाइयों का सामना करना पड़ेगा जहाँ तक उसके अस्तित्व का सवाल है तो उसका वोटबैंक दलित माना जाता है जो उसके साथ अभी भी मज़बूती से खड़ा दिखता है। हर चुनाव में यूपी में दलित की पहली पसंद बसपा ही रही है लेकिन सिर्फ़ दलितों से काम नहीं चलता उसको जीतने के लिए प्लस वोट चाहिए और वह मुसलमान ही है, जो बसपा का बेड़ा पार लगा सकता है परन्तु मुसलमान बसपा को पसंद नहीं करता। उसकी कई वजह भी है बसपा ने कभी मुसलमानों के लिए कोई ख़ास आवाज़ नहीं उठाई । मुसलमानों का मानना है कि बसपा मुसलमान के मुद्दे पर कुछ बोलती तो है नहीं।मुसलमानों को बयानबाज़ी चाहिए जो मायावती कभी नहीं करती जिसकी वजह से मुसलमान मायावती को यह कहते हुए नकार देता है कि मायावती हमारे लिए कुछ बोलती तो है नहीं। जैसे सपा कंपनी के पूर्व सीईओ मुलायम सिंह यादव बयानबाज़ी कर मुसलमानों का बेवकूफ बनाते आए हैं दिया कुछ भी नहीं सिर्फ़ बयानबाज़ी कर उनका दिल जीत लिया करते थे। उनके बेटे अखिलेश यादव अब वो भी नहीं करते ख़ैर ऐसी ही अपेक्षा मुसलमान मायावती से भी करता है और मायावती मुसलमान की इस कमजोरी को समझ नहीं पायी या यूँ भी कहा जा सकता है कि मायावती मुसलमानों को बयानबाज़ी से ठगना नहीं चाहती।

क्या वह वास्तव में मुसलमान के लिए कुछ करना चाहतीं हैं? सियासत में ये दलील नहीं चलती कि हम ग़लत तरीक़े से किसी को छल नहीं सकते सियासी पंडितों का मानना है कि साम दाम दंड भेद कोई भी तरीक़ा अपनाया जाए सत्ता को पाना ही लक्ष्य होता है लेकिन मायावती ऐसा क्यों नहीं करती ये बात समझ में नहीं आती। जब मुसलमान को कुछ चाहिए ही नहीं और उनका मक़सद सिर्फ़ बयानबाज़ी से ही पूरा हो सकता है अगर उसे मुसलमानों का वोट चाहिए तो उसे मुसलमान के प्रति उदारता दिखानी होगी वर्ना मुसलमान का वोट लेने की मायावती की चाहत पूरी नहीं होगी। ग्राउंड ज़ीरो पर तो यही महसूस होता है, बाक़ी चुनावी बिसात की चालों से भी भविष्य तय होता है। देखना होगा कि कांग्रेस की राष्ट्रीय महासचिव प्रियंका गांधी को सपा कंपनी और बसपा कंपनी अगर हल्के में ले रही हैं तो यह उनकी बहुत बड़ी सियासी भूल होगी।

रही बात मोदी की भाजपा की वह भी कांग्रेस की राष्ट्रीय महासचिव श्रीमती प्रियंका गांधी से भयभीत हैं क्योंकि मोदी की भाजपा की सियासी हाँड़ी धार्मिक भावनाओं के साथ खिलवाड़ कर चढ़ी हुई है, जिसका टाईम ज़्यादा नहीं होता जब लोगों को ये बात महसूस होने लगती हैं कि हो कुछ नहीं रहा और देश लगातार हर तरीक़े से पिछड़ता जा रहा है। तब जनता जो धार्मिक भावनाओं में बहकर साथ खड़ी थी एक दम साथ छोड़ देती हैं और उसका ग्राफ नीचे आ जाता है फिर उसका खड़ा होना भी भारी हो जाता है। यही हाल मोदी की भाजपा के साथ होना है इसकी भविष्यवाणी सियासी पंडित कर रहे हैं उनका मानना है कि धार्मिक भावनाओं के सहारे बहुत दूर तक नहीं जा सकते है इस लिए माना जा रहा है कि कांग्रेस की राष्ट्रीय महासचिव यूपी की प्रभारी प्रियंका गांधी सपा , बसपा और मोदी की भाजपा के लिए शुभ संकेत नहीं है। अगर इसी तरह कांग्रेस की राष्ट्रीय महासचिव प्रियंका गांधी यूपी में सक्रिय रूप से कार्य करती रही तो कांग्रेस के लिए यूपी में अच्छे दिन आने वाले हैं इससे इंकार नहीं किया जा सकता।

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About the author

मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.

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