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क्या फ़ैज़ की नज़्म “हम देखेंगे” वाक़ई हिन्दू-विरोधी है?

By   /  January 3, 2020  /  No Comments

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-आयुष चतुर्वेदी।।

सबसे पहली बात कि इस नज़्म को बिना पढ़े और समझे, महज़ एक शब्द को आधार बनाकर इसे किसी धर्म-विशेष का विरोधी बताना सरासर गलत होगा क्योंकि ये नज़्म किसी धर्म नहीं बल्कि तानाशाही और सत्ताधीश के ख़िलाफ़ लिखी गयी है।

फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ और हबीब जालिब जैसे लेखकों का पाकिस्तान में वही हाल हुआ, जो हिंदुस्तान में अवतार सिंह संधू ‘पाश’ और सफ़दर हाशमी का हुआ! ऐसे लोगों को या तो जेलों में भर दिया जाता या फिर मार दिया जाता। सिर्फ़ इसलिए क्योंकि ये लोग जी-हुज़ूरी और मसीहाई की मुख़ालिफ़त करते थे!

व-यबक़ा-वज्ह-ओ-रब्बिक (हम देखेंगे), आइये इस न के अर्थ और इसके लिखे जाने की कहानी जानते हैं!

यह नज़्म फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ ने 1977 में लिखी थी, जब तत्कालीन पाकिस्तानी आर्मी चीफ़ जनरल जिया-उल-हक़ ने तख़्तापलट किया था और पूर्व पाकिस्तानी प्रधानमंत्री ज़ुल्फ़िकार अली भुट्टो की कुर्सी चले जाने से जनतंत्र की हत्या हुई थी। आर्मी चीफ़ के इस रवैये से काफ़ी दुःखी होकर फ़ैज़ ने जनता और जनतंत्र की नुमाइंदगी करते हुए यह नज़्म लिखी थी।

चलिए इस नज़्म को चार भागों में बाँटकर पढ़ते हैं और लफ़्ज़-दर-लफ़्ज़ इसका अर्थ समझते हैं―

1.
हम देखेंगे
लाज़िम है कि हम भी देखेंगे
वो दिन कि जिसका वादा है
जो लोह-ए-अज़ल में लिखा है

(अर्थ: हम देखेंगे, आवश्यक और उचित है कि हम भी देखेंगे. उस दिन को देखेंगे जिसका वादा है और जो विधि के विधान में लिखा है, उसको भी देखेंगे)

2.
जब ज़ुल्म-ओ-सितम के कोह-ए-गरां
रुई की तरह उड़ जाएँगे
हम महकूमों के पाँव तले
ये धरती धड़-धड़ धड़केगी
और अहल-ए-हकम के सर ऊपर
जब बिजली कड़-कड़ कड़केगी

[अर्थ: जब ज़ुल्म और सितम के घने पहाड़ रुई की तरह उड़ जाएंगे. हम रियाया,शासित और प्रजा के पैरों तले, ये धरती धड़-धड़ धड़केगी. और सत्ताधीश के सर ऊपर जब बिजली कड़-कड़ कड़केगी, तब हम भी देखेंगे]

3.
जब अर्ज-ए-ख़ुदा के काबे से
सब बुत उठवाए जाएँगे
हम अहल-ए-सफ़ा, मरदूद-ए-हरम
मसनद पे बिठाए जाएँगे
सब ताज उछाले जाएँगे
सब तख़्त गिराए जाएँगे

[इसका यदि शाब्दिक अर्थ देखें तो होगा कि- जब खुदा के काबे(मक्का में स्थित) से सब मूर्तियां उठवाई जाएंगी. ख़ैर यह सम्भव नहीं है क्योंकि काबा की सारी मूर्तियाँ पैग़म्बर मोहम्मद के ज़माने से ही उठवाई जा चुकी हैं.
चुनाँचे इसका आशय यह है-
यह ज़ालिम तानाशाह झूठ और शक्ति के बल पर अपना राज कायम किए हुए बुत की तरह बैठे हुए हैं और जब यह खत्म हो जाएंगे तब हम शोषित, दबे-कुचले लोगों का राज होगा. हम साफ़-सुथरे लोग और धर्मस्थलों में प्रवेश से वंचित लोग अमीरों के बैठने वाली गद्दी पर बिठाए जाएँगे. सारे ताज उछाले जाएंगे और सारे राजसिंहासन गिराए जाएँगे.]

4.
बस नाम रहेगा अल्लाह का
जो ग़ायब भी है हाज़िर भी
जो मंज़र भी है नाज़िर भी
उट्ठेगा अन-अल-हक़ का नारा
जो मैं भी हूँ और तुम भी हो
और राज करेगी खुल्क-ए-ख़ुदा
जो मैं भी हूँ और तुम भी हो

[अर्थ: केवल नाम रहेगा ईश्वर का, जो प्रत्यक्ष भी है और अप्रत्यक्ष भी. जो दृश्य भी है और द्रष्टा भी. उठेगा ‘ मैं ही सत्य हूँ या मैं ही सर्वस्व हूँ या अहं ब्रह्मास्मि या शिवोअहं ‘ का नारा. जो मैं भी हूँ और तुम भी हो. और राज करेगी आम जनता, जो मैं भी हूँ और तुम भी हो.]

●बस नाम रहेगा अल्लाह का
●सब बुत उठवाये जाएँगे
नज़्म की इन्हीं दो पंक्तियों के कारण सारा बखेड़ा खड़ा हुआ है और इस नज़्म को हिन्दू-विरोधी बताया जा रहा है। चूँकि फ़ैज़ एक मुसलमान थे, इसलिए उन्होंने ‘अल्लाह’ शब्द इस्तेमाल में लिया। मुमकिन है कि यदि वह हिन्दू होते तो यहाँ ‘भगवान’, ‘शंकर’ या ‘श्रीराम’ शब्द इस्तेमाल करते। शायद ये नज़्म तब कुछ ऐसी होती-

“बस नाम रहेगा शंकर का
जो ग़ायब भी है हाज़िर भी”
या फ़िर
“बस नाम रहेगा श्रीराम का
जो ग़ायब भी है हाज़िर भी”

लेकिन इस बदलाव के बाद भी यह नज़्म सत्ताविरोधी ही होती, ‘इस्लामविरोधी’ नहीं! बस यही फ़र्क़ समझने की ज़रूरत है।
जहाँ तक बात ‘बुत’ उठवाए जाने की है तो इसका अर्थ महज़ शाब्दिक न लें! क्योंकि काबा के बुत पैग़म्बर मोहम्मद के ही ज़माने से उठवा दिए गए क्योंकि इस्लाम में मूर्ति पूजन को नहीं माना जाता! यहाँ इसका आशय सीधे तौर पर यह है कि सभी मसीहाओं और सत्ताधीशों के बुत उठवा दिए जाएंगे और जिन लोगों को धर्मस्थलों में प्रवेश से वर्जित किया गया है(यानी पीड़ित,शोषित,उपेक्षित लोग),उन्हें उस मसनद पर बिठाया जाएगा जिसपर अमीर और इज़्ज़तदार लोग बैठते हैं।

जामिया मिलिया इस्लामिया के छात्र-छात्राओं के प्रदर्शन के समर्थन में आईआईटी कानपुर के छात्र-छात्राओं ने फ़ैज़ की यही नज़्म गाते हुए शांतिपूर्ण प्रदर्शन किया। संस्थान के डिप्टी डाइरेक्टर और फैकल्टी मेंबर ने यह सवाल उठाया कि इस नज़्म के कुछ भाग ‘हिन्दू-विरोधी’ है।
पुनः ध्यान दें, ये नज़्म पूर्णतः सत्ताविरोधी और मसीहाई की विरोधी है। जिस प्रकार “अल्लाह” की जगह “राम” कर देने से यह ‘इस्लामविरोधी’ नहीं हो सकती। उसी प्रकार “अल्लाह” शब्द के प्रयोग से यह ‘हिन्दू-विरोधी’ नहीं है!
गाँधीजी सही ही कहते थे–
“ईश्वर-अल्लाह तेरो नाम,
सबको सन्मति दे भगवान!”

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About the author

मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.

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